भारतीय राजनीति में यह कहावत अक्सर सही साबित होती है कि चुनाव केवल पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े जनाधार वाले नेताओं के दम पर जीते जाते हैं. किसी कद्दावर नेता को किनारे करके केवल संगठन के भरोसे चुनावी वैतरणी पार करने का भ्रम कई बार भारी पड़ जाता है. मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने एक बार फिर इस राजनीतिक कड़वी सच्चाई को साबित कर दिया है. दतिया विधानसभा सीट पर हुए हाई-प्रोफाइल उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह ने शानदार जीत दर्ज की है, जबकि भाजपा के उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को करारी हार का सामना करना पड़ा है. इस चुनावी नतीजे के सामने आते ही बुंदेलखंड से लेकर भोपाल तक की राजनीति में एक ही यक्ष प्रश्न गूंज रहा है कि क्या पूर्व गृहमंत्री और तीन बार के विधायक डॉ नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटना भाजपा नेतृत्व की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई. क्या नरोत्तम मिश्रा के उपेक्षा भरे आंसुओं में भाजपा डूब गई?
चुनाव की घोषणा होते ही दतिया के राजनीतिक गलियारों में जिस नाटकीय घटनाक्रम की शुरुआत हुई थी, उसका अंत भाजपा के लिए हार लेकर आया. दतिया क्षेत्र में पिछले डेढ़ दशक से दादा के नाम से अपनी धाक जमाने वाले नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर जब भाजपा हाईकमान ने आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा, तो पूरे दतिया में राजनीतिक भूचाल आ गया था. अपने लोकप्रिय नेता की अनदेखी से भड़के कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किए, नेशनल हाईवे जाम किया और शीर्ष नेतृत्व के फैसले के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के दौरान नेता भले ही पार्टी के कड़े अनुशासन के सामने सिर झुका ले, लेकिन उसका जमीनी कार्यकर्ता और समर्पित वोट बैंक दिल से फैसले को कभी स्वीकार नहीं करता. नामांकन रैली के दौरान जब अपना टिकट कटने के बाद नरोत्तम मिश्रा के आंसू छलक पड़े थे, ठीक उसी पल दतिया के बीजेपी कार्यकर्ताओं ने शायद मन ही मन तय कर लिया था कि वे इस ‘अपमान’ का हिसाब ईवीएम के माध्यम से चुकता करेंगे.
दतिया उपचुनाव के नतीजों के बाद खुद नरोत्तम मिश्रा और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए आत्ममंथन की स्थिति पैदा हो गई है. जीत से ठीक पहले कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने एक बयान देकर इस बात पर अपनी मुहर लगा दी है. उन्होंने साफ कहा कि नरोत्तम मिश्रा ने तो नहीं, लेकिन उनके समर्थकों ने परोक्ष रूप से उनकी मदद की. कांग्रेस उम्मीदवार का यह बयान राजनीति के उस कड़वे सच को उजागर करता है, जिसे राजनीतिक भाषा में भीतरघात कहा जाता है. चूकि नरोत्तम मिश्रा चुनाव के दौरान हमेशा भाजपा प्रत्याशी के साथ खड़े दिखाई दिए, लेकिन दतिया में ब्राह्मण मतदाताओं और नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों के एक बड़े वर्ग ने या तो मतदान से दूरी बना ली, या फिर उन्होंने कांग्रेस के पक्ष में जाकर क्रॉस वोटिंग कर दी.
बता दें कि दतिया की सियासत पिछले पंद्रह सालों से नरोत्तम मिश्रा के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. नरोत्तम के सामने भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी का कोई स्वतंत्र जनाधार नहीं था. जनता के बीच भी यह संदेश गया कि पार्टी ने एक कद्दावर नेता की जगह एक कमजोर विकल्प को चुना है. ऐसे में पूर्व राजघराने से ताल्लुक रखने वाले अनुभवी नेता घनश्याम सिंह के सामने भाजपा उम्मीदवार का राजनीतिक प्रभाव टिक नहीं पाया. दतिया का यह जनादेश मध्य प्रदेश भाजपा और केंद्रीय नेतृत्व के लिए एक बहुत बड़ा सबक लेकर आया है. इस नतीजे ने यह साफ कर दिया है कि किसी भी स्थापित और लोकप्रिय क्षेत्रीय नेता को हाशिए पर धकेल कर चुनाव जीतना संभव नहीं है. नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों के आक्रोश और उपेक्षा के आंसुओं ने भाजपा की पूरी चुनावी रणनीति को ध्वस्त कर दिया.
