अयोध्या: राम मंदिर के चढ़ावे में करोड़ों के कथित मामले में सबसे ज्यादा जिस शख्स की चर्चा हो रही है, उसका नाम राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू है। बताया जा रहा है कि वह मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष चंपत राय के सहयोगी हैं। टिन्नू पर आरोप है कि उन्होंने चढ़ावे के पैसे में घोटाला किया और करोड़ों की संपत्ति बना ली। अब पूरे मामले में राम शंकर यादव ने एक वीडियो बनाकर अपनी सफाई पेश की है। उनका कहना है कि ऑटो की कमाई से उन्होंने संपति बनाई है। उनके ऊपर लग रहे आरोप निराधार हैं।
इंटरनेट पर सामने आए वीडियो में राम शंकर यादव पीला कुर्ता और सफेद गमछा लपेटे दिख रहे हैं। उन्होंने कहा- ‘बंधुओं, जय श्रीराम। मेरा नाम राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू है। मैं 1993 में विश्व हिंदू परिषद से जुड़ा। राम मंदिर निर्माण के दौरान मुझे कारसेवा के काम में लगाया गया। सोशल मीडिया के माध्यम से मेरे ऊपर जो आरोप लगाए जा रहे हैं वे सब गलत हैं। पूरी तरह निराधार हैं। हमारे मकान के बारे में जो दिखाया जा रहा है वह भी गलत है। जो हमारे 50 करोड़ की जमीन के बारे में बताया जा रहा है तो उसका हमने 2008 में बैनामा कराया था। 2015 में हमने यहां मकान बनाया।’
‘एल एंड टी कंपनी से मिलता था किराया’
राम शंकर यादव ने आगे कहा- ‘मैं संगठन का कार्य करते हुए ऑटो भी चलाता था। संगठन में काम करते हुए हमको मानदेय मिलता था। ऑटो की कमाई हमने इकट्ठा कर 2008 में जमीन खरीदी थी। 2016 में हमने मकान का निर्माण कराया। 2019 में राम मंदिर का फैसला आने से पहले हमारा मकान बनकर तैयार हो गया था। इस दौरान एल एंड टी कंपनी से हमारी बात हुई। उनको आठ कमरे की आवास की जरूरत थी। हमने उनको रेंट पर दे दिया। यही हमारी आमदनी का जरिया था। आज जो हमारे ऊपर 50 करोड़ की संपत्ति बनाने का आरोप है वह सब निराधार है। आरोप लगाने वालों को भगवान देख रहे हैं।’
44 लोगों से पूछताछ कर चुकी है एसआईटी
आपको बता दें कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने राम मंदिर में चढ़ावे में करोड़ों के घोटाले का मुद्दा सबसे पहले उठाया था। इसके बाद पूरे यूपी में राजनीतिक गहमा-गहमी तेज हो गई। मामला बढ़ता देखकर यूपी सरकार ने जांच के लिए एसआईटी बनाई है। दो दिन पहले एसआईटी की टीम अयोध्या पहुंची और जांच शुरू की। बताया जा रहा है कि अब तक 44 लोगों से पूछताछ की जा चुकी है।
राम मंदिर चंदा; 18 हजार वेतन फिर करोड़ों की संपत्ति कैसे ?
अयोध्या/लखनऊ: अयोध्या राम मंदिर के दानपात्रों से चढ़ावे की राशि में हुए करोड़ों रुपये के कथित गबन की जांच अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि जांच का फोकस अब केवल संदिग्ध कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि चढ़ावे की गिनती और कर्मचारियों की तैनाती की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे मामले में बैंक, आउटसोर्सिंग कंपनी और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, तीनों की भूमिका अब जांच के घेरे में आ गई है।
बैंक ने दिया ठेका, लेकिन कर्मचारी ट्रस्ट ने किए तय
बताया जा रहा है कि जांच में यह सामने आया है कि चढ़ावे की गिनती के के लिए बैंक ने एक आउटसोर्सिंग कंपनी के माध्यम से कर्मचारियों को रखा था, लेकिन इन कर्मचारियों का चयन ट्रस्ट की ओर से किया गया था। दूसरे शब्दों में, जिन लोगों को करोड़ों रुपये के नकद चढ़ावे की गिनती जैसे अत्यंत संवेदनशील कार्य में लगाया गया, वे या तो किसी प्रभावशाली पदाधिकारी के परिचित बताए जा रहे हैं या फिर उनसे जुड़ा कोई सुनियोजित नेटवर्क रखते थे।
न सत्यापन, न तलाशी, न प्रभावी निगरानी
सबसे गंभीर प्रश्न इस व्यवस्थागत लापरवाही पर उठ रहे हैं कि चढ़ावा गिनने वाले इन कर्मचारियों का न तो कभी उचित पुलिस सत्यापन कराया गया, न ही उनकी कोई नियमित तलाशी ली गई और न ही उन पर कोई प्रभावी निगरानी तंत्र लागू किया गया। स्थिति यह थी कि ट्रस्ट का कर्मचारी पहचान पत्र लगाकर ये लोग मंदिर परिसर में बिना किसी रोक-टोक के आसानी से आवाजाही करते थे। मंदिर की सुरक्षा में पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती के बावजूद, ट्रस्ट कर्मियों की गतिविधियों पर वैसी कड़ी निगरानी कभी नहीं दिखी, जैसी अन्य संवेदनशील स्थलों पर अपेक्षित होती है।
दिन-रात मंदिर परिसर में ही रहते थे कर्मचारी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिन संदिग्ध कर्मचारियों के पास से नकद राशि और संपत्ति के दस्तावेज बरामद हुए हैं, वे महज 12 से 18 हजार रुपये प्रतिमाह के वेतन पर कार्यरत थे, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ये सभी दिन-रात मंदिर परिसर में ही रहते थे। अब जांचकर्ता इस पेचीदा सवाल को समझने का प्रयास कर रहे हैं कि इतने कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों के पास अचानक बड़ी नकदी, अचल संपत्ति और अन्य निवेश कैसे पहुंचे।
बेहिसाब रकम ने बढ़ाई जांच की मुश्किल
इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल चढ़ावे के वास्तविक हिसाब-किताब को लेकर है। जानकारी के अनुसार, मंदिर के दानपात्रों में आने वाली नकद राशि शुरू से ही बेहिसाब होती थी। आशंका जताई जा रही है कि गिनती के दौरान ही असली खेल होता था और जो राशि आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हुई, वह पूरी तरह हिसाब से बाहर रह गई। यही कारण है कि गबन की वास्तविक राशि कितने करोड़ रुपये है, इसका सटीक पता लगाना जांच एजेंसियों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
