Vande Mataram‘वंदे मातरम्’ को लेकर इन दिनों देशभर में एक नई बहस छिड़ी हुई है. कांग्रेस पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के सिर्फ पहले दो छंद ही गाएगी. बीजेपी इसे ‘वंदे मातरम् का अपमान’ बता रही है, तो कांग्रेस कह रही है कि वह 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) में लिए गए उसी फैसले पर चल रही है, जिसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी माना था. तो क्या था CWC का फैसला, 15 अगस्त 1947 की आधी रात को कितने छंद गाए गए और टैगोर, गांधी, पटेल जैसे महानायक कितने छंद गाते थे…
कांग्रेस का विरोध मुख्य रूप से गीत के पूर्ण संस्करण (सभी 6 छंद) को अनिवार्य बनाने और ऐतिहासिक
समझौते से जुड़ा है। पार्टी पूरे गीत का विरोध नहीं करती, बल्कि 1937 के अपने प्रस्ताव के अनुसार
केवल पहले दो छंद गाने पर जोर देती है।
हालिया घटनाक्रम में (अगस्त 2026 में सीडब्ल्यूसी बैठक) कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि पार्टी
कार्यक्रमों में सिर्फ पहले दो छंद ही गाए जाएंगे।
बीजेपी इसे “तुष्टिकरण” और “राष्ट्रीय गीत का अपमान” बताती है, जबकि कांग्रेस इसे स्वतंत्रता
संग्राम के नेताओं (गांधी, नेहरू, पटेल, बोस, टैगोर आदि) के फैसले का पालन कहती है।
वंदे मातरम पर बढ़ा टकराव: कांग्रेस सिर्फ़ दो ही छंद गाएगी
वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक टकराव अब एक नए दौर में पहुंच गया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने 19 अगस्त को साफ कर दिया कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के पहले दो छंद ही गाए जाएंगे। कांग्रेस ने इसके लिए 1937 में लिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया है।यह फैसला ऐसे समय आया है जब पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के दो कार्यक्रमों ने वंदे मातरम को लेकर राजनीतिक विवाद को खासा गर्म कर दिया। दिल्ली में कांग्रेस के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में पूरा वंदे मातरम गाया गया, जबकि गोवा में कांग्रेस के कार्यक्रम में सिर्फ पहले के दो छंद गाए गए। गोवा के कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे खुद मौजूद थे।
दिल्ली में पूरे वंदे मातरम के दौरान क्या हुआ
दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में हुए स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम का एक वीडियो सामने आने के बाद विवाद शुरू हुआ। वीडियो में वंदे मातरम के गायन के दौरान सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी दिखाई दे रहे थे। बीजेपी ने आरोप लगाया कि जब वंदे मातरम की आगे की पंक्तियां गाई जा रही थीं, तब सोनिया गांधी ने इशारा करके गायन रोकने को कहा और राहुल गांधी भी उस समय असहज दिखाई दिए। इस घटनाक्रम को बीजेपी ने कांग्रेस के राष्ट्रगीत के प्रति कथित अनादर से जोड़कर हमला किया।हालांकि, कांग्रेस ने बीजेपी के इस आरोप को खारिज किया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश का कहना है कि सोनिया गांधी का इशारा वंदे मातरम रोकने के लिए नहीं था, बल्कि वह खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था करने की बात कर रही थीं। इसलिए दिल्ली की घटना की राजनीतिक व्याख्या को लेकर दोनों दलों के दावे अलग-अलग हैं। यानी दिल्ली में एक तरफ पूरा वंदे मातरम गाया गया, लेकिन उसी कार्यक्रम की तस्वीरों और वीडियो ने कांग्रेस के भीतर वंदे मातरम के गायन को लेकर सवाल खड़े कर दिए थे।
गोवा में कांग्रेस का कार्यक्रम हुआ, जिसमें पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे मौजूद थे
इसके दो दिन बाद गोवा में कांग्रेस का कार्यक्रम हुआ, जिसमें पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे मौजूद थे। यहां वंदे मातरम के सिर्फ पहले दो छंद गाए गए। यह उस समय हुआ जब केंद्र की ओर से वंदे मातरम के पूरे गायन को लेकर नया प्रोटोकॉल और कानूनी बहस चल रही थी। गोवा में दो छंदों के गायन को कांग्रेस के अपने पुराने रुख के तौर पर देखा गया। खड़गे ने इस मुद्दे पर बीजेपी के हमलों का जवाब भी दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि स्वतंत्रता आंदोलन में बीजेपी या आरएसएस के कौन से नेता जेल गए और देश के लिए लड़े थे।गोवा में दो छंदों का वंदे मातरम गाए जाने के बाद विवाद और बढ़ गया। बीजेपी युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ प्रदर्शन किया। बीजेपी युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेतृत्व ने राष्ट्रगीत का पूरा सम्मान नहीं किया। प्रदर्शन के दौरान बीजेपी युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने खड़गे के काफिले को रोकने की कोशिश भी की। बाद में गोवा कांग्रेस ने इस प्रदर्शन को लेकर बीजेपी युवा कार्यकर्ताओं के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की। इस तरह महज दो दिनों के भीतर वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस के दो कार्यक्रमों की तस्वीरें बिल्कुल अलग नजर आईं- दिल्ली में पूरा गीत और गोवा में सिर्फ दो छंद।
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी ने अब अपनी स्थिति औपचारिक रूप से स्पष्ट कर दी
इन घटनाओं के बीच कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी ने अब अपनी स्थिति औपचारिक रूप से स्पष्ट कर दी है। CWC ने फैसला किया कि कांग्रेस के आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के पहले दो छंद ही गाए जाएंगे। पार्टी ने इसे 1937 के कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले से जोड़ते हुए कहा है कि यह कांग्रेस की पुरानी और स्थापित नीति है। कांग्रेस का कहना है कि 1937 में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस और दूसरे वरिष्ठ नेताओं के दौर में यह फैसला लिया गया था। पार्टी के मुताबिक उस समय वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों को सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए स्वीकार किया गया था। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी कहा कि पार्टी अपने 1937 के प्रस्ताव का पालन करेगी। यानी अब दिल्ली की घटना को लेकर उठे सवाल और गोवा में दो छंद गाए जाने की घटना के बाद कांग्रेस ने अपनी आधिकारिक स्थिति को एक बार फिर दोहरा दिया है।
वंदे मातरम पर विवाद नया नहीं है
वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों और बाद के छंदों को लेकर विवाद नया नहीं है। कांग्रेस का तर्क है कि बाद के हिस्सों में धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं के संदर्भ आते हैं, इसलिए 1937 में सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए पहले दो छंदों को स्वीकार किया गया था। बीजेपी इस फैसले को कांग्रेस की राष्ट्रवादी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रही है। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने कांग्रेस के फैसले की आलोचना करते हुए इसे राष्ट्रगीत के प्रति अनादर बताया है।
‘वंदे मातरम्’ के कुल कितने छंद हैं
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ की रचना 1875 में की थी. उन्होंने इसे अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में शामिल किया. मूल रूप से यह गीत संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण में लिखा गया है. ‘वंदे मातरम्’ में कुल छह छंद हैं. पहले दो छंद मातृभूमि की सुंदरता, नदियों, फलों, हरी-भरी फसलों और ठंडी हवाओं का वर्णन करते हैं. बाकी के चार छंदों में देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख है.1950 में जब ‘वंदे मातरम्’ को भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया, तब सिर्फ पहले दो छंदों को ही आधिकारिक रूप से मान्यता दी गई.
कांग्रेस ने 1937 में क्या फैसला लिया था
द नेहरू आर्काइव में रिकॉर्ड के मुताबिक, अक्टूबर 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने वंदे मातरम् पर बैठक हुई. इसमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे दिग्गज नेता मौजूद थे.इस बैठक में यह फैसला लिया गया कि राष्ट्रीय और सार्वजनिक सभाओं में ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे. दरअसल, बाकी के चार छंदों में धार्मिक चित्रण था. इससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती थीं. कांग्रेस ने देश के सांप्रदायिक सौहार्द और सभी धर्मों के लोगों को साथ लेकर चलने के लिए यह फैसला किया.यह फैसला करीब 80 सालों से कांग्रेस की परंपरा रही है. यानी कांग्रेस ने यह नहीं कहा था कि वंदे मातरम् खराब गीत है, न यह कहा था कि इसे राष्ट्रीय आंदोलन से हटा दिया जाए.
15 अगस्त 1947 की आधी रात को कितने छंद गाए गए
राज्यसभा के रिकॉर्ड के मुताबिक, 14 अगस्त 1947 की रात 11 बजे संविधान सभा का पांचवां सत्र संविधान हॉल, नई दिल्ली में शुरू हुआ. अध्यक्ष की कुर्सी पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे. देश आजादी की दहलीज पर था. इस सत्र का पहला एजेंडा कोई भाषण नहीं, बल्कि वंदे मातरम् का पहला छंद गाना था.आधिकारिक कार्यवाही में अध्यक्ष के शब्द हैं, ‘पहला कार्यक्रम वंदे मातरम् के पहले छंद का गायन है और सभी लोग इसे खड़े होकर सुनेंगे.’ इसके बाद सुचेता कृपलानी ने पहला छंद गाया. वह पहला पद था:
वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्।
वन्दे मातरम्॥
इसका मतलब बिल्कुल साफ है कि आजादी की उस आधी रात को संविधान सभा में वंदे मातरम् के दो नहीं, सिर्फ एक छंद का गायन हुआ था. इसके बाद कार्यक्रम में ‘सारे जहां से अच्छा’ की शुरुआती पंक्तियां और ‘जन गण मन’ का पहला पद भी सुचेता कृपलानी ने गाया.कई जगह यह लिखा मिलता है कि 15 अगस्त की आधी रात को पूरा ‘वंदे मातरम्’ गाया गया था, लेकिन संविधान सभा की आधिकारिक कार्यवाही इसका समर्थन नहीं करती. रिकॉर्ड में स्पष्ट शब्द हैं, ‘the first verse of VANDE MATARAM’.
टैगोर, गांधी और पटेल कितने छंद गाते थे
राज्यसभा के डेटा के मुताबिक,
रवींद्रनाथ टैगोर: टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार ‘वंदे मातरम’ गाया था. टैगोर ने महात्मा गांधी के साथ मिलकर सुझाव दिया था कि राष्ट्रीय गीत के सिर्फ पहले दो छंद ही अपनाए जाने चाहिए.
महात्मा गांधी: गांधीजी ने 1927 में ‘वंदे मातरम’ को ‘पूरे राष्ट्र का गीत’ कहा था. लेकिन उन्होंने धार्मिक आपत्तियों के कारण सिर्फ पहले दो छंदों का समर्थन किया. वे चाहते थे कि यह गीत सभी धर्मों के लोगों को एकजुट करे.
सरदार वल्लभभाई पटेल: पटेल 1937 के CWC फैसले में शामिल थे. उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के उस प्रस्ताव का समर्थन किया था, जिसमें ‘वंदे मातरम’ के सिर्फ पहले दो छंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाने की बात थी.
जवाहरलाल नेहरू: पंडित नेहरू ने भी गांधीजी और टैगोर के साथ मिलकर सिर्फ दो छंदों के पक्ष में रुख अपनाया.
यानी, ये सभी महानायक ‘वंदे मातरम’ के सिर्फ पहले दो छंद ही गाते थे.
तो फिर अब विवाद क्या है
19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने फिर से 1937 के फैसले को दोहराते हुए साफ किया कि कांग्रेस सिर्फ दो छंद ही गाएगी. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, ‘मैंने वही ‘वंदे मातरम’ गाया, जो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अटल बिहारी वाजपेयी ने गाया. अगर यह अपराध है, तो गांधीजी, नेहरू और पटेल के खिलाफ मामला दर्ज करें.’
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने कांग्रेस के इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि पार्टी का यह रुख वंदे मातरम् का अपमान है. नितिन ने इसे वोट की राजनीति से जोड़ते हुए कांग्रेस की तुलना ‘नई मुस्लिम लीग’ से की.
एक तरफ यह बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की मूल छह-छंद वाली रचना है. दूसरी तरफ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसके शुरुआती दो छंदों ने अलग राष्ट्रीय पहचान हासिल की. 1937 में कांग्रेस ने राष्ट्रीय सभाओं के लिए इन्हीं दो छंदों को स्वीकार किया. 1947 की आजादी की आधी रात को संविधान सभा ने इससे भी छोटा, यानी सिर्फ पहला छंद आधिकारिक रूप से गाया. 1950 में वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के बराबर सम्मान देने की घोषणा हुई.
2026 में केंद्र सरकार ने आधिकारिक आयोजनों में पूरे छह छंदों वाले संस्करण के इस्तेमाल का नया प्रोटोकॉल लागू किया, जबकि कांग्रेस ने अपने पार्टी कार्यक्रमों के लिए दो छंद वाली 1937 की परंपरा को फिर दोहराया. यानी ‘वंदे मातरम् के दो छंद’ कोई 2026 में बनाया गया राजनीतिक तर्क नहीं है. इसकी जड़ 1937 में है, लेकिन ’15 अगस्त 1947 की आधी रात को दो छंद गाए गए थे’ कहना भी सही नहीं है. उस ऐतिहासिक रात के संविधान सभा रिकॉर्ड में सिर्फ एक छंद दर्ज है.
