चंडीगढ़: पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद सोमवार को नए प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व ओलंपियन परगट सिंह लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन से मुलाकात की। कांग्रेस ने 61 साल के परगट सिंह को ऐसे वक्त पर कमान सौंपी है जब पार्टी यह उम्मीद लगाएगी बैठी है कि वह 2027 के चुनाव में फिर से सत्ता हासिल कर सकती है। परगट सिंह के अध्यक्ष बनने से पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी खत्म होने की उम्मीद जताई जा रही है क्योंकि उनके न सिर्फ चरणजीत सिंह चन्नी से अच्छे रिश्ते हैं बल्कि गुरु यानी नवजोत सिंह सिद्धू से अच्छी जमती है।
परगट सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू ने पहले शिरोमणि अकाली दल छोड़ने के बाद मिलकर आवाज़-ए-पंजाब मोर्चे का गठन किया था। बाद में दोनों एक साथ कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। जब सिद्धू पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बने, तब परगट सिंह को पार्टी मेंहमेशा उनके करीबी सहयोगियों में गिना गया और संकट के समय उन्होंने सिद्धू का खुलकर बचाव भी किया। जब चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के मुख्यमंत्री बने, तो उनकी सरकार में परगट सिंह कैबिनेट मंत्री (शिक्षा और खेल विभाग) रहे। सरकार और संगठन के बीच अंदरूनी कलह या संकट के दौरान परगट सिंह ने चन्नी और सिद्धू के बीच सुलह और बातचीत कराने में भी अहम भूमिका निभाई थी। इतना ही नहीं परगट सिंह सिद्धू मूसेवाला के परिवार से भी अच्छे रिश्ते हैं।
पंजाब की राजनीति के नए ‘कैप्टन’
परगट सिंह ने विधायक के रूप में हैट्रिक लगाई है। उन्होंने 2012 में शिरोमणि अकाली दल (SAD) के टिकट पर पहली बार जालंधर कैंट से विधानसभा चुनाव जीता। बाद में 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने इसी सीट से कांग्रेस के टिकट पर लगातार जीत हासिल कर हैट्रिक बनाई। वह चरणजीत सिंह चन्नी की सरकार (2021-2022) में उन्हें पंजाब का उच्च शिक्षा, स्कूल शिक्षा और खेल मंत्री बनाया गया था। 2022 पंजाब विधानसभा चुनावों में आप की तगड़ी लहर के बाद भी परगट सिंह जालंधर कैंट सीट से 5800 वोट से जीतने में सफल रहे थे। उन्होंने अध्यक्ष बनने के बाद सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण सिंह कौर से मुलाकात करके बड़ा संदेश दिया है।
परगट सिंह के नाम का मतलब
परगट सिंह का जन्म 5 मार्च 1965 को मीठापुर, जालंधर (पंजाब) में हुआ था। ‘परगट’ एक पंजाबी और हिंदी शब्द है जिसका मूल संस्कृत के ‘प्रकट’ शब्द से है। इसका मतलब होता है प्रकट होने वाला। प्रसिद्ध, उजागर या जो सबके सामने स्पष्ट रूप से दिखाई दे। पर्थ चैंपियंस ट्रॉफी (1985) में जर्मनी के खिलाफ जब भारतीय टीम 1-5 से पिछड़ रही थी, तब उन्होंने आखिरी 6 मिनटों में फॉरवर्ड आकर 4 गोल दागे और मैच को 5-5 की बराबरी पर ला खड़ा किया। इस चमत्कारिक प्रदर्शन ने उन्हें रातों-रात वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।
परगट सिंह पंजाब में बड़ा नाम
ऐसे वक्त पर जब बीजेपी आप से आए हरभजन सिंह को आगे कर रही है तब राहुल गांधी ने तय रणनीति में परगट सिंह को आगे किया है। वह भारत के इकलौते ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने लगातार दो ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की। इसमें 1992 बार्सिलोना और 1996 अटलांटा ओलंपिक शामिल हैं। इसके अलावा वे 1988 के सियोल ओलंपिक का भी हिस्सा थे। हॉकी से संन्यास लेने के बाद, उन्होंने पंजाब पुलिस में बतौर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस अपनी सेवाएं दीं। वह साल 1998 में भारतीय हॉकी टीम के नेशनल कोच भी नियुक्त किए गए। इसके बाद उन्होंने पंजाब के खेल निदेशक के रूप में भी कार्य किया। परगट सिंह कभी विवादों में नहीं घिरे। वह पंजाब में बाजी पलट सकते हैं।
