टीएमसी के बागी सासंदों की लिस्ट जारी हो गई है, जिसमें कई बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं. बंगाल चुनाव से पहले तक बीजेपी पर आक्रमक होकर निशाना साधने वाले सयानी घोष और शत्रुघ्न सिन्हा का नाम भी शामिल है. बागी 19 सांसदों की लिस्ट सार्वजनिक होने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी के असतित्व पर सवाल उठने लगे हैं. इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को हस्ताक्षर करके एक पत्र भी सौंपा है. बागी 19 सासंदों के बाद अभिषेक बनर्जी, महुआ मोइत्रा और कल्याण बनर्जी समेत 9 सांसद अभी भी ममता बनर्जी के साथ बने हुए हैं.
बागी 19 सांसदों की लिस्ट
काकोली घोष (बारासात)
सयानी घोष (जादवपुर)
शत्रुघ्न सिन्हा (आसनसोल)
यूसुफ पठान (बहरामपुर)
जगदीश चंद्र बसुनिया (कूचबिहार)
खलीलुर रहमान (जंगीपुर)
माला रॉय (कोलकाता दक्षिण)
मिताली बाग (आरामबाग)
दीपक अधिकारी (घाटाल)
अबू ताहिर खान (मुर्शिदाबाद)
असित कुमार माल (बोलपुर)
शताब्दी रॉय (बीरभूम)
रचना बनर्जी (हुगली)
पार्थ भौमिक (बैरकपुर)
बापी हलदार (मथुरापुर)
कालीपद सोरेन (झाड़ग्राम)
जून मालिया (मेदिनीपुर)
अरूप चक्रवर्ती (बांकुड़ा)
डॉ. शर्मिला सरकार (वर्धमान पूर्व)
असित कुमार माल (बोलपुर)
शताब्दी रॉय (बीरभूम)
रचना बनर्जी (हुगली)
ममता बनर्जी के ये सांसद अभी भी वफादार
कल्याण बनर्जी (श्रीरामपुर)
महुआ मोइत्रा (कृष्णानगर)
सुदीप बंदोपाध्याय (कोलकाता उत्तर)
प्रसून बनर्जी (हावड़ा)
सजदा अहमद (उलूबेरिया)
सौगात रॉय (दम-दम)
प्रतिमा मंडल (जयनगर)
अभिषेक बनर्जी (डायमंड हार्बर)
कीर्ति आजाद (बर्धमान-दुर्गापुर)
ममता बनर्जी के लिए खड़ी हुई नई चुनौती
बंगाल चुनाव के बाद टीएमसी के भीतर उठा तूफान अब अस्तित्व और नेतृत्व की लड़ाई में बदल गया है. एक तरफ दिल्ली में ममता बनर्जी नई राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी है. वहीं बागी गुट खुद को असली टीएमसी साबित करने में जुटा है. टीएमसी की राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने बुधवार को पार्टी और संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया.
बीरभूम से बाग सांसद शताब्दी रॉय ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस को दिए इंटरव्यू में संगठन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी नेतृत्व ने आंतरिक शिकायतों को नजरअंदाज किया, चुनावी हार की समीक्षा नहीं की और भ्रष्टाचार व अति-आत्मविश्वास को संगठन को कमजोर करने दिया गया. उन्होंने कहा कि पार्टी छोड़ने या विद्रोह करने वाले नेताओं की बढ़ती संख्या को केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं माना जा सकता, बल्कि यह संगठन के भीतर गहरी समस्याओं का संकेत है.
