कोलकाता। भाजपा ने पश्चिम बंगाल ने स्पष्ट दो तिहाई बहुमत हासिल कर लिया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि रणनीति, वादों और नैरेटिव की लड़ाई का भी था। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस जहां अपनी कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली अस्मिता के मुद्दे पर भरोसा जता रही थी और चुनाव में इसे भुनाने की कोशिश की। वहीं मुख्य विपक्षी भाजपा ने इन दोनों मोर्चों पर आक्रामक और योजनाबद्ध तरीके से जवाबी काट पेश किया।भाजपा सबका काट लेकर सामने आई और हर मोर्चे पर उसकी कारगर रणनीति तृणमूल पर भारी पड़ी और मैदान मार ले गई। सबसे बड़ा दांव भाजपा ने महिलाओं और युवाओं पर खेला। ममता सरकार की लोकप्रिय लक्ष्मी भंडार योजना, जिसके तहत महिलाओं को मासिक 1,500 रुपये की आर्थिक सहायता मिलती है, उसके मुकाबले भाजपा ने अपने चुनावी संकल्प पत्र (भरोसा शपथ) में दोगुना राशि यानी मासिक 3,000 रुपये देने का वादा किया।इसके साथ ही महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त बस यात्रा, सरकारी नौकरियों में 33 प्रतिशत आरक्षण, महिला पुलिस बटालियन का गठन और हर ब्लाक में महिला थाना खोलने जैसे वादों ने महिला मतदाताओं को खासा आकर्षित किया।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में जनता ने भारतीय जनता पार्टी को बहुमत दिया है। बंगाल में पहली बार बीजेपी सरकार बनाने जा रही है। बीजेपी की जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कार्यकर्ताओं को बधाई दी है।विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत पर पीएम मोदी दिल्ली में स्थित पार्टी मुख्यालय पहुंचे। बंगाल में पहली बार बीजेपी सरकार बनाने जा रही है, इस मौके पर पीएम मोदी बंगाली धोती-कुर्ता पहनकर पहुंचे।पीएम मोदी ने बीजेपी की जीत पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ‘2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव हमेशा याद रखे जाएंगे। जनता की शक्ति की जीत हुई है और BJP की सुशासन की राजनीति सफल रही है। मैं पश्चिम बंगाल के हर एक व्यक्ति के सामने नतमस्तक हूं।’प्रधानमंत्री ने आगे लिखा, ‘जनता ने BJP को एक शानदार जनादेश दिया है और मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूं कि हमारी पार्टी पश्चिम बंगाल की जनता के सपनों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। हम एक ऐसी सरकार देंगे जो समाज के सभी वर्गों को अवसर और सम्मान सुनिश्चित करेगी।’
‘गंगोत्री से गंगासागर तक कमल ही कमल’
बीजेपी की जीत पर पीएम मोदी ने कहा, ‘आज का ये दिन ऐतिहासिक है। गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक कमल ही कमल खिल रहा है।’प्रधानमंत्री मोदी ने संबोधन में कहा, गंगोत्री से गंगासागर तक कमल ही कमल खिला है। आज का दिन ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने कमल खिला दिया। आज भरोसे की जीत का दिन है।’पीएम मोदी ने आगे कहा, ‘जीत और हार लोकतंत्र और राजनीति का एक स्वाभाविक हिस्सा हैं। लेकिन, पांच राज्यों की जनता ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि हमारा देश ‘लोकतंत्र की जननी’ क्यों है।’प्रधानमंत्री ने कहा, ‘लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति है। आज न केवल लोकतंत्र की जीत हुई है, बल्कि हमारे संविधान की भी जीत हुई है। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की जीत हुई है।’
चुनाव आयोग और सुरक्षाबलों को दिया धन्यवाद
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत पर बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा, ‘मैं चुनाव आयोग और सुरक्षाबलों का अभिनंदन करता हूं।’पीएम मोदी ने कहा, ‘आज मैं चुनाव आयोग को, चुनाव आयोग के सभी कर्मचारी भाई-बहनों को, मतदान प्रक्रिया से जुड़े सभी कर्मियों को और विशेष रूप से सुरक्षा बलों को भी अपनी हार्दिक बधाई देता हूं। भारत के लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखने में आप सभी के योगदान को इतिहास सदैव याद रखेगा।’पीएम मोदी ने एक्स पर आगे लिखा, ‘पीढ़ियों से अनगिनत कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों और संघर्षों के बिना, पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह ऐतिहासिक जीत संभव नहीं हो पाती। मैं उनमें से हर एक को नमन करता हूं।’पीएम ने आगे लिखा, ‘साल-दर-साल, कार्यकर्ताओं ने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया है, जमीन पर कड़ी मेहनत की है और हमारे विकास के एजेंडे के बारे में बात की है। वे ही हमारी पार्टी की असली ताकत हैं।’
असम की जीत पर भी पीएम मोदी ने दी बधाई
पीएम मोदी ने लिखा, ‘असम में BJP-NDA को फिर मिला आशीर्वाद! असम विधानसभा चुनावों में BJP-NDA की जीत, विकास और आम लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने पर हमारे गठबंधन के जोर के प्रति अटूट समर्थन को दर्शाती है।’प्रधानमंत्री ने लिखा, ‘इस विशाल जनादेश के लिए, मैं असम के अपने भाइयों और बहनों को तहे दिल से धन्यवाद देता हूं। मैं उन्हें भरोसा दिलाता हूं कि हम राज्य के कायाकल्प के लिए काम करना जारी रखेंगे।’
महिलाओं और युवाओं को मिला पूरा समर्थन
यही रणनीति युवाओं के मामले में भी अपनाई गई। चुनाव से पहले तृणमूल सरकार द्वारा बेरोजगार युवाओं के लिए शुरू की गई युवा साथी योजना के तहत मिलने वाले 1,500 रुपये के मासिक भत्ते के मुकाबले भाजपा ने इसे भी दोगुना यानी 3,000 रुपये करने का वादा किया।3,000 रुपये मासिक भत्ता और पांच वर्षों में एक करोड़ रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर देने का भाजपा का दावा, बेरोजगार युवाओं के बीच असरदार साबित हुआ। चुनावी नतीजे व भाजपा की जबर्दस्त जीत में इन दोनों वर्गों- महिलाओं और युवाओं का अपेक्षा से अधिक समर्थन साफ प्रतीत हो रहा है, जो पहले तृणमूल को मिलता था।
TMC के बंगाली अस्मिता के कार्ड को किया निष्प्रभावी
सिर्फ वादों तक ही भाजपा सीमित नहीं रही। उसने तृणमूल के सबसे मजबूत हथियार-बंगाली अस्मिता के ट्रंप कार्ड को भी नेस्तनाबूत कर दिया, जिसे सत्तारूढ़ दल ने 2021 के विधानसभा चुनाव में खूब भुनाया था। यह मुद्दा निर्णायक साबित हुआ था, लेकिन इस बार भाजपा ने इसे पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया।
टीएमसी ने इस बार भी चुनाव प्रचार में इस मुद्दे को जोर-शो से उठाया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी प्रत्येक चुनावी रैलियों में बार-बार यह आरोप लगाया कि भाजपा सत्ता में आने पर बंगाल की खान-पान संस्कृति पर असर डालेगी, खासकर बंगालियों के प्रिय मांस- मछली पर प्रतिबंध लगा देगी। पूरे चुनाव में मछली का मुद्दा छाया रहा।भाजपा ने इस आरोप का जवाब प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर दिया। भाजपा के कई उम्मीदवारों ने खुले तौर पर मछली के साथ चुनाव प्रचार किया। वहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं-पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद अनुराग ठाकुर और सांसद मनोज तिवारी- ने कोलकाता में सार्वजनिक तौर पर मछली खाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के खिलाफ नहीं है।
मां काली और दुर्गा का लिया सहारा
नैरेटिव की लड़ाई में भाजपा ने अपने पारंपरिक जय श्रीराम के नारे की जगह बंगाल में लोकप्रिय जय मां काली और जय मां दुर्गा जैसे स्थानीय और भावनात्मक रूप से जुड़े नारों को आगे बढ़ाया। इसके साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित पार्टी के सभी बड़े नेताओं ने अपनी प्रत्येक चुनावी रैलियों में स्थान विशेष के अनुसार स्थानीय मंदिरों, धार्मिक स्थलों व मनीषियों का नाम लेकर ही अपना भाषण शुरू किया और इसके जरिए क्षेत्रीय जुड़ाव को मजबूत करने की कोशिश की।इस तरह भाजपा ने चुनाव को केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं रहने दिया, बल्कि इसे योजनाओं की प्रतिस्पर्धा और सांस्कृतिक भरोसे की लड़ाई में बदल दिया। नतीजों से साफ हो गया कि इस बार बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत की सबसे बड़ी वजह भाजपा की आक्रामक और बहुस्तरीय रणनीति रही।
उदय की कहानी: 2000 से 2011 तक
ममता बनर्जी का उभार 2000 के दशक में शुरू हुआ, जब उन्होंने पश्चिम मिदनापुर के केशपुर और गढ़बेटा में CPI(M) के खिलाफ आंदोलन छेड़ा। “केशपुर होबे CPM-एर शेषपुर” का नारा दिया। हालांकि, असली मोड़ नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलनों से आया, जहां जमीन अधिग्रहण के खिलाफ उनकी लड़ाई ने वाम मोर्चा के खिलाफ जनाक्रोश को हवा दी। 2011 में उन्होंने 34 साल पुरानी वाम सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया।
सत्ता और चुनौतियां
सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं। महिलाओं, छात्रों, किसानों और बुजुर्गों के लिए आर्थिक सहायता। लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार के आरोप बढ़ते गए। शिक्षक भर्ती घोटाले में 25,000 से ज्यादा नियुक्तियां रद्द हुईं। सारदा चिटफंड और नारदा स्टिंग जैसे मामलों ने भी सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया।
ध्रुवीकरण और राजनीतिक बदलाव
2012 के बाद BJP ने बंगाल में तेजी से विस्तार शुरू किया। ममता सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगे, जैसे इमामों और मुअज्जिनों को भत्ता देने का फैसला, जिसे बाद में अदालत ने असंवैधानिक करार दिया। इसके बाद राज्य की राजनीति में ध्रुवीकरण बढ़ता गया।
सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दे
ममता बनर्जी ने दुर्गा पूजा समितियों को आर्थिक सहायता दी, जो 2025 तक बढ़कर 1.10 लाख रुपये प्रति समिति हो गई। BJP ने इस पर सवाल उठाए। वहीं ममता ने दिगा में जगन्नाथ मंदिर और सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर प्रोजेक्ट शुरू कर धार्मिक संतुलन साधने की कोशिश की, लेकिन इसका खास फायदा नहीं मिला।
रोजगार और प्रवासन
विशेषज्ञों के मुताबिक, रोजगार की कमी और उद्योगों का अभाव TMC के खिलाफ गया। बड़ी संख्या में युवा और खासकर मुस्लिम समुदाय के लोग काम की तलाश में दूसरे राज्यों में गए। बताया जाता है कि BJP ने करीब 22 लाख प्रवासी मजदूरों को वापस लाने में मदद की, जिससे वोटिंग पैटर्न प्रभावित हुआ।
महिलाओं का बदला रुख
ममता बनर्जी की सबसे मजबूत वोटबैंक मानी जाने वाली महिलाएं भी इस बार उनसे दूर जाती दिखीं।
लक्ष्मी भंडार योजना के बावजूद BJP के 3000 रुपये प्रति माह के वादे ने असर डाला।
‘स्ट्रीट फाइटर’ को सियासी झटका
ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर में कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन 2026 का चुनाव उनके लिए सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि 2011 में वाम मोर्चा के खिलाफ जो एंटी-इनकंबेंसी थी, वही अब TMC के खिलाफ दिखी, जिसमें बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और बदलाव की मांग ने बड़ी भूमिका निभाई।
