नई दिल्ली: पिछले साल 28 जुलाई को दिल्ली में संसद में ‘ ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा चल रही थी। उसी वक्त सैकड़ों किलोमीटर दूर श्रीनगर के पास घने जंगलों में सिक्योरिटी फोर्स देश का बदला लेने में जुटी थी। पहलगाम आतंकी हमले में शामिल आतंकियों के सफाए के लिए चलाया गया ऑपरेशन महादेव सिर्फ सैन्य ऑपरेशन नहीं था बल्कि देश की तरफ से और उन परिवारों की तरफ से जवाब भी था, जिन्होंने 22 अप्रैल को पहलगाम के बैसरन में अपनों को खोया।
हमले के कुछ घंटों के भीतर ही भारतीय सेना के जवान मौके पर पहुंच गए। वहां सिर्फ सबूत नहीं थे, वहां बिखरी हुई कहानियां थीं, डरे हुए गवाह और आंखों में दर्ज खौफ था। इनमें मौके पर मौजूद एक सेना अधिकारी की गवाही भी शामिल थी। इन्हीं टुकड़ों को जोड़ते हुए और ह्यूमन इंटेलिजेंस और तकनीकी इंटेलिजेंस के जरिए एक तस्वीर सामने आई। हमलावरों की पहचान सुलैमान शाह, हमजा अफगानी और जिब्रान के रूप में हुई, जो लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे।इसके बाद शुरू हुआ ऑपरेशन महादेव, जो काउंटर-टेरर ऑपरेशन तो था ही, साथ ही था देश से न्याय का वादा। जंगल, पहाड़, ऊंचाई और मौसम हर चीज चुनौती थी। ये आतंकी लगातार दक्षिण कश्मीर के ऊपरी इलाकों हपटनार, बुगमार और त्राल से होते हुए महादेव रिज के साथ लगने वाले दाचीगाम के घने जंगलों में घुसते जा रहे थे। यह इलाका आतंकियों के लिए छिपने की जगह था।
मई के अंत तक ऑपरेशन की तस्वीर काफी साफ हो चुकी थी। आतंकी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का फायदा उठाकर पकड़ से बचने की कोशिश कर रहे थे, वहीं सालाना यात्रा के करीब आने से किसी संभावित खतरे की आशंका भी बढ़ गई थी। खतरे की गंभीरता को समझते हुए ऑपरेशन का दायरा बढ़ाया गया। तलाशी अभियान को तेज करने के लिए अतिरिक्त बलों के साथ-साथ पैरा (स्पेशल फोर्सेस) की चुनिंदा यूनिट को भी तैनात किया गया।अगले कई हफ्तों तक खुफिया एजेंसियां, भारतीय सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल आपसी तालमेल के साथ काम करते रहे। ऑपरेशन का दायरा जो शुरू में 300 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैला था उसे धीरे-धीरे सीमित कर दिया गया। ड्रोन आसमान से नजर रख रहे थे। इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और अन्य आधुनिक निगरानी उपकरणों का व्यापक इस्तेमाल किया गया।
10 जुलाई को नई खुफिया जानकारी मिलने के साथ ही लिदवास, हरवन और दाचीगाम में एक साथ कार्रवाई शुरू हुई। आतंकियों के भागने के सभी रास्ते बंद किए गए, आतंकियों पर घेरा कसता गया और आतंकी एक छोटे से इलाके में सिमटने लगे। 28 जुलाई को योजना बनाकर और उसे सटीक तरीके से अंजाम देते हुए पैरा (स्पेशल फोर्सेस) की एक टीम ने कठिन और खतरनाक इलाके में गुप्त तरीके से आगे बढ़ते हुए 10 घंटे में 3 किलोमीटर पैदल दूरी तय की। इसके बाद हुई तेज और सटीक कार्रवाई में तीनों आतंकियों को मार गिराया गया। 93 दिन, 250 किलोमीटर का पीछा और अनगिनत मुश्किलों के बाद यह ऑपरेशन पूरा हुआ।
