दिल्ली में संसद की सुरक्षा पहले नहीं होती थी. ब्रिटिश राज में जब लोकसभा चैंबर के सेंट्रल कांस्टीट्यूशन एसेंबली में 08 अप्रैल 1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बम फेंके जाने के बाद इसकी सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर की गई. तब इसकी सुरक्षा को लेकर सुझाव देने के लिए सर जेम्स केएर की अगुवाई में एक समिति बनी. जिसके सुझावों के आधार पर सेना के सार्जेंट कोलिन कैपल को इसकी सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया. तब संसद की सुरक्षा के लिए 21 सेक्युरिटी गार्ड्स तैनात किए गए. हालांकि उनकी मदद के लिए दिल्ली पुलिस के भी 25 जवानों और अधिकारियों की सेवाएं ली गईं. तब दिल्ली पुलिस को द मेट्रोपॉलिटन पुलिस कहा जाता था. ये लोग अमूमन संसद की गैलरी में तैनात रहते थे. संसद की इस सुरक्षा सर्विस को तब वॉच एंड वार्ड कहा जाता था. ये तब पूरी तरह स्पीकर के निर्देशों पर काम करती थी. संसद में हमला होने तक इस संसद की सेक्युरिटी वॉच एंड वार्ड ही कही जाती थी. उसके बाद इसे एक समग्र सुरक्षा एजेंसी में बदल दिया गया और नाम दिया गया – पार्लियामेंट सेक्युरिटी सर्विस. इसे नोडल आर्गनाइजेशन कहते हैं, जो पूरी तरह संसदीय परिसर में सुरक्षा के लिए जवाबदेह होता है और ये वहां तैनात एजेंसियों के साथ तालमेल करके काम करता है.
हर 1.2 सेकेंट पर दिया जाता है सुरक्षा अपडेट – पार्लियामेंट कांपलैक्स में पैरामीटर सिक्योरिटी सिस्टम भी है, जिसमें हर 1.2 सेकेंट में अपडेट भेजना होता है. जैसे कोई भी घटना कहीं होती है. अलार्म बज जाता है और सेकेंडों में संसद की सुरक्षा वहां पहुंच जाती है. इसके अलावा अगर कोई दीवार फांदकर संसद में घुसने की कोशिश करे वो जैसे ही कांटेदार बाड़ के संपर्क में आएगा, तुरंत अलार्म बजने लगेगा. ये फेंस यानी बाड़ 30 जोन में बांटी गई हैं. अब एक चौथा लेयर भी – हालांकि कुछ साल पहले संसद की आंतरिक सुरक्षा के लिए पार्लियामेंट ड्यूटी ग्रुप का भी गठन हुआ था. इसे संसद की सुरक्षा में लगा चौथा लेयर भी कहा जाता है. ये लोग आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं. जिसमें आधुनिक पिस्टल, उपकरण, थर्मल इमेजर्स और इंसास टेलिस्कोप स्नाइपर्स शामिल हैं. पीडीजी में केवल युवा लोगों की ही रखा जाता है. वो चार साल के लिए इस सेवा में आते हैं, फिर वापस सीआरपीएफ में लौट जाते हैं, इसमें लिए जाने वाले जवान आमतौर पर स्पेशल कमांडो कोर्स किए होते हैं.इसके बाद सुरक्षा का एक तीसरा घेरा भी होता है, जहां चेकिंग का काम होता है. ये सब बहुत मुस्तैदी से होता है. संसद परिसर में रोजाना जो भी सामान कैंटीन से लेकर स्टेशनरी या जरूरत के लिए बाहर से आता है, उसकी सघन चेकिंग होती है. ये कहावत यहां सही साबित होती है कि संसद परिसर में कोई परिंदा भी बिना मर्जी के हरकत नहीं कर सकता.
आमतौर पर संसद या संसदीय परिसर में जाने वालों के पास कई घंटे पहले ही उनकी दी गई जानकारियों के बाद सत्यापित होने के बाद ही बनते हैं. मुख्य गेट पर आमतौर दिल्ली पुलिस के साथ अर्धसैन्य बल के जवान सघन चेकिंग करते हैं. खास उपकरणों से गुजरना होता है. सामान की चेकिंग के लिए मशीनें हैं. इसके बाद सुरक्षा का दूसरा घेरा आता है. जहां फिर चेकिंग होती है, वहां तैनात गार्ड्स और अधिकारी आईकार्ड देखकर और पास देखने के बाद पूछताछ करके तस्दीक करते हैं कि आप सही व्यक्ति हैं या धोखा देखकर अंदर आ गए हैं. वहां लगी स्क्रीन पर आपके पास के आधार दी गई जानकारियां फ्लैश होती हैं.
जैसे ही कोई वाहन संसद भवन में प्रवेश करता है, स्वचालित आईडेंटी व्यवस्था सक्रिय हो जाती है और इसकी सूचना भी देती है. (संसद का अपना इंटीग्रेटेड सिक्योरिटी सिस्टम है, जिसका अपना कंट्रोल रूम है. इसके जरिए संसद परिसर में लगे करीब 500 सीसीटीवी कैमरों पर नजर रखी जाती है. साथ ही साफ्टवेयर आधारित सुरक्षा सिस्टम पर यही कंट्रोल रूम नजर रखता है. एक तरह से कहा जा सकता है कि इंटीग्रेटेड सिक्योरिटी सिस्टम संसद की सुरक्षा की आंख-नाक और कान है. जिससे सुरक्षा के सभी लेयर जुड़े होते हैं. उसके जरिए दिशा-निर्देश जारी होते रहते हैं.संसद का अपना इंटीग्रेटेड सिक्योरिटी सिस्टम है, जिसका अपना कंट्रोल रूम है. इसके जरिए संसद परिसर में लगे करीब 500 सीसीटीवी कैमरों पर नजर रखी जाती है. साथ ही साफ्टवेयर आधारित सुरक्षा सिस्टम पर यही कंट्रोल रूम नजर रखता है. एक तरह से कहा जा सकता है कि इंटीग्रेटेड सिक्योरिटी सिस्टम संसद की सुरक्षा की आंख-नाक और कान है. जिससे सुरक्षा के सभी लेयर जुड़े होते हैं. उसके जरिए दिशा-निर्देश जारी होते रहते हैं.संसद पर आतंकी हमले के बाद संसद के समूचे सुरक्षा उपायों को कंप्युटरीकृत करके नई तकनीक से जोड़ दिया गया है, जो हर आने जाने वालों के साथ उनके वाहन की भी जानकारी देते हैं. गेट पर अब ऐसे बैरियर भी बना दिए गए हैं, जो जमीन से नीचे तुरंत उठकर इसे पुख्ता तरीके से बंद करने का काम करते हैं. सांसदों, मंत्रियों और अफसरों की गाड़ियों पर ऐसे स्टिकर होते हैं, जिससे उन्हें कैमरों के जरिए खुद-ब-खुद गेट से अंदर प्रवेश मिल जाता है.
संसद पर 21 साल पहले हुए हमले के बाद से कई सुरक्षा उपाय किए गए हैं. पूरे परिसर संसद की मुख्य इमारत के साथ पार्लियामेंट एनेक्सी और लाइब्रेरी भवन के अलावा परिसर के चारदीवारी के अंदर के इलाके में चप्पे चप्पे पर कैमरे की नजर रहती है. एक कंट्रोल रूम कैमरों पर नजर रखता है. संसद के सभी 12 गेट्स पर सुरक्षा तैनात रहती है, हालांकि इसके कुछ गेट ही आने जाने के लिए खुले रहते हैं. बाकी गेट को सुरक्षा कारणों से बंद रखा जाता है लेकिन इसके बावजूद उनके पास सुरक्षा होती है और गेट के पास स्थित मचान से भी बाहर आने जाने वालों पर नजर रहती है.संसद की सुरक्षा के लिए यहां पर दिल्ली पुलिस, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, इंडो तिब्बतन सुरक्षा बल और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के साथ नेशनल सुरक्षा गार्ड्स, एनएसजी, खुफिया ब्यूरो, एसपीजी आदि तैनात किए जाते हैं. जब ये यहां तैनात होते हैं तो संसद के सुरक्षा नियंत्रण विभाग के तहत काम करते हैं. इस पूरी सुरक्षा के लिए सबसे बड़े अधिकारी होते हैं लोकसभा के संयुक्त सचिव (सुरक्षा). वह पूरे संसदीय परिसर की सुरक्षा करने वाली पार्लियामेंट्री सेक्युरिटी सर्विस के प्रमुख होते हैं. उनके नीचे दो और शीर्ष अधिकारी होते हैं, ये हैं राज्यसभा के सुरक्षा निदेशक और लोकसभा के सुरक्षा निदेशक. दरअसल पार्लियामेंट सेक्युरिटी सर्विस तमाम सुरक्षा बलों के साथ तालमेल से ही काम करती है. ये जवान समय समय पर बदलते रहते हैं. पार्लियामेंट सेक्युरिटी सर्विस का गठन 15 अप्रैल 2009 से हुआ था. दरअसल इसके तहत संसदीय परिसर के चप्पे की सुरक्षा के साथ हर आने जाने वाले नजर रखी जाती है, जांच की जाती है और किसी भी खतरे से निपटने के लिए आधुनिक हथियारों के साथ जवान तैनात रहते हैं. मोटे तौर पर संसदीय परिसर में 1500 से ऊपर जवान दिन-रात यानि 24 घंटे भारतीय संसद और इससे जुड़ी इमारतों और यहां लगातार चलने वाले कामकाज को सुरक्षा और निगरानी देते हैं.
13 दिसंबर 2001 में जैश ए मोहम्मद और लश्करे तैयबा के 05 आतंकवादियों ने संसद परिसर में घुसकर संसद की मुख्य इमारत पर हमले की कोशिश की, जिसमें 15 लोग मारे गए, जिसमें सभी 05 आतंकी भी शामिल थे. 08 सुरक्षाकर्मी और एक माली भी इसमें शहीद हुए. निश्चित तौर पर तब से लेकर अब तक संसद की सुरक्षा में व्यापक बदलाव हुए हैं. अब संसद की सुरक्षा बाहर से लेकर अंदर कई घेरों और कई प्वाइंट्स पर होती है. इसमें तकनीक की व्यापक मदद ली जाने लगी है. वैसे भारतीय संसद की सुरक्षा और वहां आने वाले विशिष्ट शख्सियतों की सुरक्षा के लिए पार्लियामेंट सेक्युरिटी सर्विस जिम्मेदार है. ये क्या है कैसे काम करती है. ये हम आपको आगे बताएंगे
