नेपाल-तिब्बत सीमा पर भोटेकोशी नदी घाटी में आई विनाशकारी आपदा ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान हिमालयी पारिस्थितिकी और GLOF (ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड) के गंभीर खतरों की ओर खींच दिया है. बर्फ, भारी मलबे, चट्टानों और पानी के इस भीषण सैलाब ने पलक झपकते ही हंसते-खेलते कस्बों, गांवों, सड़कों, पुलों और पनबिजली संयंत्रों को तबाह कर दिया. दर्जनों लोगों की अकाल मृत्यु हो गई और सैकड़ों लोग लापता हो गए.
इस मानवीय और प्राकृतिक त्रासदी के पीछे वैज्ञानिकों और पर्यावरण शोधकर्ताओं को जिस मुख्य कारक का संदेह है, वह है GLOF. आइए जानते हैं क्या होता है ये
क्या होता है GLOF?
जब ऊंचे पर्वतीय इलाकों में ग्लेशियर धीरे-धीरे पिघलते और पीछे हटते हैं, तो वे अपने साथ भारी मात्रा में मिट्टी, बड़े पत्थर और चट्टानी मलबा बहाकर लाते हैं. यह मलबा ग्लेशियर के सबसे निचले सिरे (जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘स्नाउट’ कहा जाता है) पर जमा होता जाता है. प्राकृतिक रूप से जमा हुए इस मलबे और पत्थरों की दीवार को ‘मोरेन’ (Moraine) कहते हैं.यही मोरेन दीवार ग्लेशियर से पिघलकर आने वाले पानी को रोक लेती है, जिससे उसके पीछे एक विशाल ग्लेशियर झील बन जाती है. जब किसी कारणवश यह कमजोर मोरेन दीवार टूट जाती है, तो झील में भरा लाखों-करोड़ों लीटर पानी कुछ ही मिनटों में तीव्र ढलान की ओर बह निकलता है. इसी घटना को GLOF कहा जाता है.GLOF की विनाशकारी क्षमता केवल पानी के आयतन से तय नहीं होती. अपने साथ यह बाढ़ विशालकाय चट्टानें, भारी गाद, बर्फ और कीचड़ का ऐसा घातक मिश्रण लाती है, जो रास्ते में आने वाली हर मानव निर्मित संरचना को ताश के पत्तों की तरह ढहा देता है.
GLOF का आना किसी एक घटना का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह कई प्राकृतिक और मौसमी कारकों के घातक मेल से घटित होता है:
1-झील के अत्यधिक दबाव और पानी के निरंतर रिसाव से मोरेन दीवार अंदर से खोखली व कमजोर होने लगती है और अचानक ढह जाती है.
2-जब ग्लेशियर का कोई बड़ा हिस्सा, बर्फ की चट्टान या पहाड़ का मलबा अचानक झील में गिरता है, तो झील में विशालकाय लहरें उठती हैं जो मोरेन दीवार को लांघकर उसे तोड़ देती हैं.
3-हालांकि अकेली बारिश GLOF का सीधा कारण नहीं बनती, लेकिन यह ढलान पर मलबे को ढीला करती है और झील के जलस्तर को खतरे के निशान से ऊपर पहुंचा देती है.
4-हिमालयी क्षेत्र बेहद संवेदनशील सीस्मोटिक जोन में आता है. हल्के भूकंपीय झटके भी कमजोर मोरेन संरचना को तुरंत ध्वस्त कर सकते हैं.
हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता खतरा: क्लाइमेट चेंज का प्रभाव
हिमालय को धरती का ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग का सबसे तीखा प्रहार भी यही क्षेत्र झेल रहा है.
काठमांडू स्थित ICIMOD (International Centre for Integrated Mountain Development) की रिपोर्टों के अनुसार, 1970 के दशक से ही हिमालय के ग्लेशियरों के पतले होने और पीछे हटने की दर खतरनाक रूप से बढ़ी है. वर्ष 2000 की तुलना में वर्तमान में बर्फ पिघलने की गति दोगुनी से अधिक हो चुकी है.
झीलों का दायरा बढ़ना: पीछे हटता हर ग्लेशियर एक नई अस्थिर झील को जन्म दे रहा है, जबकि पहले से बनी पुरानी झीलों का क्षेत्रफल लगातार बढ़ रहा है.
ISRO का डेटा विश्लेषण: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के उपग्रह आंकड़ों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई थीं. इनमें से 676 झीलें 1984 के बाद से आकार में बेहद विशाल हो चुकी हैं, जिनमें से 130 झीलें सीधे भारत के नदी बेसिनों (सिंधु, ब्रह्मपुत्र और गंगा) में स्थित हैं.
ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी: वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि वैश्विक तापमान में 1.5°C की वृद्धि होती है, तो हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के एक-तिहाई ग्लेशियर पूरी तरह से गायब हो जाएंगे.
बस्तियों पर बढ़ता जोखिम
GLOF के कारण होने वाले नुकसान का दायरा केवल प्राकृतिक कारणों से तय नहीं होता, बल्कि नदी घाटियों में बेतरतीब मानवीय गतिविधियों और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट का भी इसमें बड़ा हाथ है.
हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में लगभग 500 Gigawatt (GW) की विशाल पनबिजली क्षमता मौजूद है. बिजली की बढ़ती जरूरतों और आर्थिक विकास के कारण अधिकांश जलविद्युत परियोजनाएं, सुरंगे, राजमार्ग और बस्तियां उन्हीं संकीर्ण नदी घाटियों में बनाई गई हैं, जो GLOF और आकस्मिक बाढ़ के सीधे बहाव वाले रास्तों पर आती हैं.
सुरक्षा और पूर्व चेतावनी
नेपाल-तिब्बत सीमा की ताजा आपदा इस बात की तकीद करती है कि पर्यावरण संतुलन की अनदेखी करके पहाड़ों पर विकास की योजनाएं नहीं बनाई जा सकतीं.
अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर रीयल-टाइम सेंसर और उपग्रह निगरानी प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए ताकि जलस्तर बढ़ते ही निचले इलाकों को अलर्ट किया जा सके.
Controlled Siphoning: झीलों में जमा अतिरिक्त पानी को साइफन पाइपों या कृत्रिम चैनलों के जरिए धीरे-धीरे बाहर निकालकर झीलों का दबाव कम किया जाए.
सतत अवसंरचना निर्माण: नदी घाटियों और ढलानों पर भारी निर्माण कार्यों पर वैज्ञानिक समीक्षा के बिना रोक लगाई जाए और नो-कंस्ट्रक्शन जोन तय किए जाएं.
नेपाल की इस तबाही ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अगर हमने ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने और हिमालयी पर्यावरण के संरक्षण के लिए कड़े कदम नहीं उठाए, तो ये ‘वाटर बम’ आने वाले समय में और भी भयानक तबाही लाते रहेंगे.
