नई दिल्ली: असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति की तस्वीर लगभग साफ कर दी है. 126 सीटों पर हुई मतगणना के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) स्पष्ट बढ़त बनाए हुए है और लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की ओर बढ़ता दिख रहा है.9 अप्रैल को सभी 126 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान हुआ था, जिसमें राज्य में लगभग 85.5% मतदान दर्ज किया गया. राज्य में सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 64 सीटों का है.चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई है. भाजपा अब तक 79 सीटें जीत चुकी और तीन पर बढ़त बनाए हुए है. उसके सहयोगी – असम गण परिषद छह सीटें जीत चुकी और चार पर बढ़त बनाए हुए है. वहीं, बोडो लैंड पीपुल्स फ्रंट नौ सीटें जीती है और एक पर आगे चल रही है.
इस बार के चुनाव में विपक्षी कांग्रेस का प्रदर्शन पिछले चुनावों से भी खराब रहा. सीटों के लिहाज से दूसरे स्थान पर रही. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, अब तक कांग्रेस 12 सीटों में जीत दर्ज की और 8 सीटों में बढ़त बनाए हुए है.वहीं, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) केवल दो सीटें जीती. पिछले चुनाव में एआईयूडीएफ 15 सीटें जीती थी. वहीं, अखिल गोगोई की रायजोर दल ने दो सीटें जीती. तृणमूल कांग्रेस एक सीट जीती. कांग्रेस के नेतृत्व में छह दलों के विपक्षी गठबंधन ने भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करने में नाकाम रही. जहां भाजपा पांच वर्षों तक चुनावी तैयारी में जुटी रही, वहीं कांग्रेस कमजोर स्थिति में मैदान में उतरी – दल-बदल के कारण संगठन कमजोर हुआ और रणनीतिक रूप से भी वह सीमित रही. गठबंधन भी मतदान से कुछ सप्ताह पहले ही अंतिम रूप ले पाया. पिछले विधानसभा में भाजपा ने 64 सीटें जीती थी, जबकि उसके सहयोगियों में एजीपी 9, यूपीपीएल 7 और बीपीएफ 3 सीटें जीती थीं. विपक्ष में कांग्रेस 26, एआईयूडीएफ 15, माकपा 1 और एक निर्दलीय चुनाव जीते थे.
कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रहे गौरव गोगोई हार गए
असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख गौरव गोगोई जोरहाट सीट से भाजपा प्रत्याशी से भारी मतों के अंतर से हार गए. गोगोई 23,182 वोटों से भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी से हार गए. गोस्वामी को 69,439 मत मिले, जबकि गोगोई को 47,257 वोट मिले. गोस्वामी दो बार विधायक रह चुके हैं और उन्होंने 2016 और 2021 में यह सीट जीती थी.गोगोई जोरहाट लोकसभा क्षेत्र से सासंद हैं. गोगोई लगातार तीन बार संसद सदस्य रहे हैं; वे पहली बार 2014 में कलियाबोर से लोकसभा के लिए चुने गए, फिर 2019 में दोबारा और अंत में 2024 में जोरहाट से चुने गए.गौरव गोगोई पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे हैं. तरुण गोगोई 2001 से 2016 तक असम के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को लगातार तीन विधानसभा चुनावों में जीत दिलाई थी.कांग्रेस वापसी की कोशिश में गोगोई को अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश कर रही थी.
अन्य हाई-प्रोफाइल सीट
जालुकबारी – इस सीट से मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा 89,434 मतों के अंतर से जीत दर्ज की. शर्मा 1,27,151 वोटों के साथ पहले स्थान पर रहे और कांग्रेस प्रत्याशी बिदिशा नियोग 37,717 मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं.
बिनाकांडी – ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे. अजमल 1,19,721 वोटों से जीते और असम जातीय परिषद के राहुल कुमार चौधरी 84,341 दूसरे स्थान पर रहे.
दिसपुर – ठीक चुनावों से पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए प्रद्युत बोरदोलोई 1,03,337 वोटों से जीत दर्ज की. वहीं, कांग्रेस की मीरा बोरठाकुर गोस्वामी 53670 मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं.
तामुलपुर – विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा प्रत्याशी बिस्वजीत दैमारी 89,308 वोटों से जीत दर्ज की. यूनाइटेड पीपल्स पार्टी, लिबरल के उम्मीदवार प्रमोद बोरो 62,565 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे.
नज़ीरा – विधानसभा में विपक्ष नेता देबब्रत सैकिया 46,701 मतों से चुनाव हार गए. भाजपा के मयूर बोर्गोहेन इस सीट से 98,198 वोटों से जीत गए.
चुनावी रणनीति
भाजपा का चुनाव अभियान विकास और पहचान की राजनीति पर आधारित रहा. एक ओर उसने बुनियादी ढांचे के विस्तार, कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक सुधारों को प्रमुखता दी, वहीं दूसरी ओर अवैध घुसपैठ और भूमि अतिक्रमण के मुद्दे को तेज किया. खासकर बांग्ला-भाषी मुसलमानों, जिन्हें अक्सर ‘मिया’ कहा जाता है, को लेकर आशंकाओं को उभारा गया. पार्टी ने बार-बार चेतावनी दी कि यदि वह सत्ता से बाहर होती है, तो जनसंख्या और भूमि से जुड़े दबाव फिर बढ़ सकते हैं.इस रणनीति के केंद्र में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा रहे, जिनकी राजनीतिक लाइन पिछले पांच वर्षों से अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर केंद्रित रही है. उनकी बयानबाजी को कई बार ध्रुवीकरण करने वाला माना गया. इस रुख को चुनाव के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी मजबूत किया. उन्होंने पूर्व कांग्रेस सरकारों पर ‘घुसपैठ को सामान्य बनाने’ का आरोप लगाया और एनडीए की वापसी पर सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया.
2023 के परिसीमन (delimitation) ने भी चुनावी परिदृश्य को बदला. इससे कई सीटों पर विपक्ष की बढ़त कमजोर हुई और मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव, जो पहले 30 से अधिक सीटों पर निर्णायक था, सीमित दायरे में सिमट गया.इसके विपरीत कांग्रेस कोई ठोस वैकल्पिक नैरेटिव पेश करने में संघर्ष करती रही. उसके अभियान में भ्रष्टाचार के आरोपों और कुछ भावनात्मक मुद्दों को उठाया गया. कांग्रेस का ‘नया बोर-असम’ जैसे वादे व्यापक असर नहीं छोड़ सके.नेतृत्व में असमानता भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती रही. गौरव गोगोई राज्य स्तर पर पहचान रखने वाले नेताओं में से एक हैं, लेकिन उनका प्रभाव हिमंता बिस्वा शर्मा की तुलना में सीमित रहा. 2016 की हार के बाद से कांग्रेस असम में कोई बड़ा चुनावी पुनरुत्थान नहीं कर सकी है, और ताजा नतीजे इस गिरावट को और स्पष्ट करते हैं.
