बिहार में आज से ‘सम्राट युग’ की शुरुआत हो गई। करीब 20 साल राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ है। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता सम्राट चौधरी राज्य के नए मुख्यमंत्री हैं। भाजपा विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से मंगलवार को नेता चुने जाने के बाद सम्राट चौधरी ने सरकार बनाने का दावा पेश किया था। फिलहाल, शपथ ग्रहण समारोह को संक्षिप्त रखा गया।इस दौरान बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मौजूद थे. इससे पहले सम्राट चौधरी मंदिर गए और वहां पूजा-पाठ भी की थी.मुख्यमंत्री के साथ केवल दो वरिष्ठ नेताओं को कैबिनेट में जगह दी गई। जो जेडीयू कोटे से उपमुख्यमंत्री हैं, विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव हैं।
20 सालों से मुख्यमंत्री पद संभालने वाले नीतीश कुमार का विकल्प देने में पार्टी ने कोई राजनीतिक प्रयोग करने से परहेज किया और जातिगत समीकरणों को साधते हुए कुशवाहा जाति के सम्राट चौधरी पर दांव लगाया. ताकि पिछड़ों, दलितों-महादलितों की सियासत की धुरी बिहार में कोई नया खालीपन पैदा न हो और विपक्षी दल इस मौके को लपक न लें. सम्राट चौधरी के पास लंबा प्रशासनिक अनुभव है और ये बात भी उनके पक्ष में गई. बीजेपी ने इस फैसले में मंडल, कमंडल और लड़ाकू अंदाज को ध्यान में रखा है. इससे पहले मध्य प्रदेश में मोहन यादव, राजस्थान में भजनलाल शर्मा और ओडिशा में मोहन चरण माझी के तौर पर सरप्राइज सीएम देकर सबको चौंकाया था.
दमदार चेहरे की जरूरत
बिहार में बीजेपी दशकों तक नीतीश कुमार की जेडीयू के साझेदार की भूमिका में थी. आरजेडी और जेडीयू में रहे सम्राट चौधरी पर भले ही बाहरी होने का ठप्पा लगाया जाए, लेकिन पार्टी को असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा जैसे ऐसे लड़ाकू चेहरे की जरूरत थी जो लालू यादव के MY समीकरण और नीतीश के लव-कुश वोट बैंक में सीधे सेंध लगा सके. सम्राट उस कोरी समुदाय से आते हैं जो बिहार की सत्ता की चाबी माना जाता है.
नीतीश के बाद राजनीतिक खालीपन को भरना
नीतीश के केंद्र की राजनीति में लौटने के बाद बिहार के सत्तारूढ़ गठबंधन में बड़े नेता के तौर पर बड़ी शून्यता पैदा हुई है।. पहली बार मुख्यमंत्री बनाने के साथ ही बीजेपी कमान अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहती और मजबूती से खंबा गाड़ना चाहती है. राजनीति के धुरंधरों की धरा बिहार में मुख्यमंत्री की पहली पारी में ही किसी अनुभवहीन या सरप्राइज कैंडिडेट का जोखिम भरा कदम मोल लेना उसने मुनासिब नहीं समझा.
नीतीश से अदावत की कहानी
सम्राट चौधरी भले ही पिछले दो साल से मुरैठा बांधकर सीधे नीतीश कुमार और लालू परिवार को चुनौती दे रहे थे.लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी सहजता और उनका आक्रामक तेवर दौड़ में उन्हें सबसे आगे रखने में सफल रहा.उनकी बुलडोजर वाली छवि भी यूपी के योगी मॉडल से मेल खाती है. उनका यह लड़ाकू अंदाज बीजेपी के उस कोर कैडर को पसंद आता है जो सड़क पर उतरकर संघर्ष करना चाहता है.
जातिगत जनगणना और मंडल 2.0 का जवाब
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार की राजनीति मंडल पार्ट 2 के दौर से गुजर रही है. जातीय जनगणना के आंकड़ों से मची उथल-पुथल के बीच भाजपा को एक ऐसे कद्दावर ओबीसी चेहरे की तलाश थी, जिसका कद जातिगत और सियासी पैमानों पर फिट बैठता हो. सम्राट चौधरी के जरिये बिहार में बीजेपी ने सियासी संदेश दिया है कि वो अब केवल सवर्णों की पार्टी नहीं, बल्कि पिछड़ों-दलितों के साथ लेकर चलने वाली समावेशी पार्टी है.
लव-कुश समीकरण में सेंधमारी
बिहार में नीतीश कुमार की ताकत का मुख्य आधार लव-कुश यानी कुर्मी-कोइरी वोट बैंक रहा है. सम्राट चौधरी कुशवाहा (कोइरी) समाज से आते हैं, जिसकी आबादी बिहार में करीब 4.2% से 5% है.बिहार में सोशल इंजीनियरिंग के सहारे पार्टी अभी पैठ और बढ़ाना चाहती है ताकि कभी भविष्य में गठबंधन की बैसाखी के बिना अकेले सियासी मैदान में कूदना पड़े तो वो तैयार रहे. वो महाराष्ट्र के राजनीतिक अनुभव को भी पार्टी ने ध्यान में रखा है.
MY के जवाब में मंडल कार्ड
आरजेडी का आधार मुस्लिम-यादव वोटबैंक रहा है. बीजेपी ने ओबीसी सीएम सम्राट को तेजस्वी यादव को सियासी मौका नहीं दिया. हरियाणा, उत्तर प्रदेस की तरह यादव के मुकाबले अन्य पिछड़ी जातियों (EBC/OBC) को सत्ता का शीर्ष नेतृत्व दे सकती है. गैर यादव वोट बैंक का ये दांव बीजेपी हरियाणा और महाराष्ट्र में सफल आजमा चुकी है. प्रखर हिंदुत्व की नीतियों के साथ उसने मंडल और कमंडल दोनों को साथा है.बिहार में यादव 14 फीसदी हैं, लेकिन गैर यादव ओबीसी और ईबीसी मिलकर करीब 50% से ज्यादा हैं.
प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक विरासत
सम्राट चौधरी के पास एक लंबी राजनीतिक विरासत है. वो शकुनी चौधरी के पुत्र हैं, जो खुद बिहार की राजनीति के दिग्गज रहे हैं।. सम्राट ने पहले भी कई सरकारों में मंत्री के तौर पर काम किया है. उनके पास शासन चलाने का अनुभव है, जो ट्रांजीशन पीरियड में अहम भूमिका अदा करेगा.
सवर्ण और पिछड़े वोटों का संतुलन
बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक सवर्ण राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण, कायस्थ) रहा है. लेकिन सम्राट चौधरी एक ऐसे ओबीसी नेता हैं, जिनको बिहार के सवर्ण समाज में पसंद किया जाता है.सवर्णों के मुद्दों पर भी वो मुखर रहे हैं, जितने पिछड़ों के मामले में.
शपथग्रहण के बाद क्या बोले विजय कुमार चौधरी
JDU नेता विजय कुमार चौधरी ने आज बिहार के उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ही। इस अवसर पर उन्होंने कहा, मैंने जो आज शपथ ली है, इसके लिए मैं नीतीश कुमार के प्रति आभार प्रकट करता हूं। ये उन्हीं के विश्वास का नतीजा है कि मुझे ये जिम्मेदारी मिली है… जो उनके रास्ते हैं, उनकी नीतियां हैं, उनके तरीके हैं, उनके कार्यक्रम हैं, उनकी कार्यशैली है उसी पर चलने का काम हम करेंगे।’विजय कुमार चौधरी ने आगे कहा, ‘अब तक नीतीश कुमार का जो मॉडल था उसमें भाजपा भी थी। अभी तुलना वाली कोई बात नहीं है। बिहार के मॉडल में नीतीश कुमार भी हैं, भाजपा भी है और अन्य तीन दल भी हैं… नीतीश कुमार कोई दूसरा नहीं हो सकता। नीतीश कुमार की जो सोच है, उनके काम करने का तरीका अद्भुत है। हमने उनके साथ बहुत कुछ सीखा है और उसी आधार पर हम आगे बढ़ रहे हैं। यही बात हमारे नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी कही है कि नीतीश कुमार ने बिहार के विकास के लिए जो रास्ता, जो नीतियां व कार्यक्रम बनाए हैं, हम उसी को आगे बढ़ाएंगे। इसलिए न कहीं कोई कंफ्यूजन है और न समझदारी का अभाव है।’ इससे पहले कल यानी मंगलवार 14 अप्रैल को जब सम्राट चौधरी को NDA विधायक दल का नेता चुना गया तो इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यभ नितिन नवीन ने उन्हें बधाई दी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उन्होंने एक पोस्ट में कहा, ‘मुझे पूर्ण विश्वास है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और आपके सक्षम नेतृत्व में बिहार प्रगति, समृद्धि और आत्मनिर्भरता के मार्ग पर आगे बढ़ेगा तथा ’विकसित बिहार 2047’ के संकल्प को नयी ऊर्जा और गति मिलेगी।’
बिजेंद्र प्रसाद यादव बिहार के सुपौल जिले के मुरली गांव के निवासी हैं और भारतीय राजनीति में एक प्रमुख समाजवादी नेता के रूप में पहचाने जाते हैं। बता दें कि 79 वर्षीय बिजेंद्र यादव के चयन से कोसी और मिथिलांचल के लोगों में उत्साह की लहर है।उन्होंने 1990 और 1995 में जनता दल के टिकट पर बिहार के सुपौल विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल की और ऊर्जा विभाग के राज्य मंत्री बने। बिजेंद्र यादव ने 1990 में पहली बार जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस के प्रमोद कुमार सिंह को हराकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद 1991 में लालू प्रसाद यादव की सरकार में उन्हें ऊर्जा राज्य मंत्री बनाया गया। राबड़ी देवी की सरकार में भी वे मंत्री रहे। 1995 में उन्होंने फिर जीत दर्ज की। फिर साल 2000 में जेडीयू के टिकट पर आरजेडी प्रत्याशी विनायक प्रसाद यादव को हराया। फिर 2005 (फरवरी और अक्टूबर) दोनों चुनावों में आरजेडी प्रत्याशी को हराया। 2010 में उन्होंने आरजेडी के रविंद्र कुमार रमण को हराया। 2015 में महागठबंधन के दौर में बीजेपी के किशोर कुमार मुन्ना को मात दी। 2020 में एनडीए के साथ चुनाव लड़ते हुए कांग्रेस के मिन्नतुल्लाह रहमानी को हराया और 2025 में भी उन्होंने अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा।
