बाल विवाह को समाप्त करने के 2030 के वैश्विक लक्ष्य के नजदीक आने के बावजूद, भारत में स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। पूरी दुनिया की कुल बाल दुल्हनों में से एक-तिहाई भारत में हैं, और भारत की हर पांच में से एक बेटी का विवाह 18 वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही किया जा रहा है। हालांकि, बाल विवाह के मामले में पूरी दुनिया का आंकड़ा भी लगभग यही है।
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बाल विवाह की दर में भारी गिरावट आई है। जो 1996 में 50 प्रतिशत से अधिक थी, वह अब घटकर 20 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा बची है। यूनिसेफ के वैश्विक अनुमानों के मुताबिक अभी दुनिया में करीब 65 करोड़ महिलाएं और लड़कियां ऐसी हैं, जिनकी शादी बचपन में कर दी गई थी। वहीं, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 12.2 करोड़ बेटियां अब भी स्कूल की चारदीवारी से बाहर हैं।
बचपन में शादी की चुनौतियां अनेक
बाल विवाह व शिक्षा से दूर होने का असर बेटियों के स्वास्थ्य और भविष्य में रोजगार पाने की संभावनाओं पर पड़ता है। बाल विवाह के बाद बेटियों के सामने शिक्षा जारी रखने की चुनौती बढ़ जाती है। घरेलू जिम्मेदारियां बढ़ने व जल्दी गर्भधारण की स्थिति में उनके स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है। किशोरावस्था में गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं का खतरा अधिक रहता है। इसके अलावा, कम उम्र में शादी अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता को सीमित कर देती है। कई मामलों में बेटियों को घरेलू हिंसा, भेदभाव और आर्थिक निर्भरता का भी सामना करना पड़ता है।
आधे से ज्यादा सिर्फ इन पांच राज्यों में
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में होने वाले कुल बाल विवाहों की संख्या का आधे से अधिक हिस्सा केवल 5 राज्यों में केंद्रित है। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश शामिल है। वहीं, सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में केरल व लक्षद्वीप सबसे ऊपर हैं। भारत में वर्तमान में 20 से 24 वर्ष की उम्र की 22.4 करोड़ महिलाएं ऐसी हैं, जिनका विवाह 17 साल की उम्र से पहले हो चुका था। इसमें से भी 9 करोड़ की शादी 15 साल की उम्र से भी पहले कर दी गई थी।
गरीबी, सामाजिक भेदभाव, लैंगिक असमानता प्रमुख वजह
बाल विवाह और शिक्षा से दूरी की समस्या के पीछे गरीबी, सामाजिक भेदभाव, लैंगिक असमानता और पुरानी परंपराएं प्रमुख कारण हैं। कई परिवार आर्थिक तंगी या सामाजिक दबाव के चलते कम उम्र में बेटियों की शादी कर देते हैं। कुछ क्षेत्रों में इनकी शिक्षा की तुलना में शादी को अधिक प्राथमिकता दी जाती है।
बाल विवाह रोकने के लिए कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है। केवल कानूनी कार्रवाई से समस्या का समाधान संभव नहीं है। परिवारों और समुदायों की सोच बदलना भी आवश्यक है। बेटियों की पढ़ाई जारी रखने के लिए छात्रवृत्ति, आर्थिक सहायता, सुरक्षित स्कूल, स्वच्छ शौचालय स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।
भारत में बाल विवाह एक गंभीर सामाजिक समस्या है जो कानूनी रूप से प्रतिबंधित होने के बावजूद लाखों युवा लड़कियों और लड़कों को प्रभावित करती है। इस प्रथा के गंभीर परिणाम होते हैं, जिनमें शिक्षा में बाधा, कम उम्र में गर्भधारण के कारण स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और व्यक्तिगत एवं आर्थिक विकास के सीमित अवसर शामिल हैं। बाल विवाह निषेध अधिनियम (पीसीएमए), 2006 को 1929 के पूर्व बाल विवाह निवारण अधिनियम की कमियों को दूर करने के लिए अधिनियमित किया गया था।बाल विवाह उन्मूलन के प्रयास युवा लड़कियों के सशक्तिकरण, उनके स्वास्थ्य और कल्याण को सुनिश्चित करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस प्रथा को समाप्त करने और एक ऐसे समाज का निर्माण करने के लिए जहां प्रत्येक बच्चा आगे बढ़ सके, कानूनी ढांचा, जागरूकता अभियान और सामुदायिक भागीदारी आवश्यक हैं।
यह चित्र बाल संरक्षण और जागरूकता अभियान का प्रतीक है।
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (पीसीएमए, 2006) का अधिनियमन
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006, 1 नवंबर 2007 को लागू हुआ, जिसका उद्देश्य केवल बाल विवाहों पर रोक लगाना नहीं बल्कि उन्हें पूरी तरह से प्रतिबंधित करना है। इस अधिनियम का उद्देश्य भारत में बाल विवाह की समस्या से प्रभावी ढंग से निपटना और एक व्यापक तंत्र स्थापित करना है। अधिनियम के तहत ऐसे बाल विवाहों पर रोक है, जिनमें महिला की आयु 18 वर्ष से कम और पुरुष की आयु 21 वर्ष से कम हो।
अधिनियम में राज्य सरकार द्वारा बाल विवाह निषेध अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान है, जिनका कर्तव्य बाल विवाहों को रोकना और इस मुद्दे पर जागरूकता फैलाना है।
भारत ने बाल विवाह को रोकने के लिए वैश्विक ढांचों और समझौतों के अनुरूप कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं की हैं।
संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन (यूएनसीआरसी): भारत यूएनसीआरसी का हस्ताक्षरकर्ता देश है, जो बाल विवाह सहित हानिकारक प्रथाओं से बच्चों की सुरक्षा को अनिवार्य बनाता है।सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी): भारत ने एसडीजी 5 को प्राप्त करने की प्रतिबद्धता जताई है, जिसका उद्देश्य 2030 तक बाल विवाह, कम उम्र में विवाह और जबरन विवाह जैसी सभी हानिकारक प्रथाओं को समाप्त करना है। महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर सम्मेलन (सीईडीAW): भारत ने सीईडीAW की पुष्टि की है और इसके अनुच्छेद 2, 3 और 5 के तहत भारत भेदभावपूर्ण प्रथाओं को समाप्त करने के लिए बाध्य है।
