दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित CJP प्रदर्शन से पहले दिल्ली में मेट्रो और रेलवे सेवाओं पर पाबंदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्देश दिया है. CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि मेट्रो ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जाएगी. अदालत ने अधिकारियों से मेट्रो और रेलवे सेवाओं को उचित नियमन के साथ जारी रखने और इस संबंध में लिए गए फैसले का व्यापक प्रचार-प्रसार करने को कहा है, ताकि आम यात्रियों को परेशानी न हो.
क्या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?
CJI सूर्यकांत ने आदेश में कहा कि अदालत के सामने 8 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर, ट्रांसपोर्ट रेंज के कार्यालय की ओर से DMRC के प्रबंध निदेशक को भेजे गए पत्र और 9 अक्टूबर को रेलवे की ओर से सभी जोनल रेलवे को जारी संचार का जिक्र किया गया. इन पत्रों में जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन के मद्देनजर मेट्रो सेवाओं और नई दिल्ली तथा हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर पहुंचने वाली मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों को लेकर प्रतिबंधों का उल्लेख था.अदालत ने कहा कि संबंधित आदेश 9 अक्टूबर से प्रभावी किए गए हैं. सुनवाई के दौरान प्रदर्शन के आयोजकों को तत्काल याचिका के जरिए अदालत आने की छूट दी गई थी, लेकिन उनके वकीलों ने स्पष्ट किया कि वे प्रदर्शनकारियों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं. आयोजकों की ओर से भी अदालत में कोई याचिका दाखिल नहीं की गई थी. आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि अब समय आ गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के लिए सुविधाओं वाली किसी दूसरी जगह की पहचान की जाए और उसे तय किया जाए… सक्षम अधिकारी इस सुझाव पर विचार करें और उचित निर्णय लें.
पूरी रोक और नियमन में अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके सामने सीमित सवाल यह था कि प्रस्तावित प्रदर्शन को देखते हुए मेट्रो और कुछ रेलवे स्टेशनों से ट्रेनों की आवाजाही पूरी तरह रोकना आनुपातिक प्रतिबंध है या नहीं और क्या इस फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत है. अदालत की ओर से पूरी तरह रोक लगाने और आवाजाही को नियंत्रित करने के बीच अंतर बताए जाने के बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आश्वासन दिया कि वह संबंधित अधिकारियों से प्रतिबंधों पर पुनर्विचार करने को कहेंगे, ताकि मेट्रो और रेलवे सेवाएं उचित नियमन के साथ जारी रह सकें.
यात्रियों को पहले से जानकारी देने का निर्देश
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मेट्रो ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा. साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिया कि मेट्रो और अन्य रेलवे सेवाओं के संचालन को लेकर लिए गए फैसले का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए, ताकि यात्रियों को पहले से जानकारी मिल सके और आम लोगों को होने वाली असुविधा कम से कम हो. सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी व्यवस्था में आनुपातिकता के सिद्धांत का पालन करने पर जोर दिया. यानी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं, लेकिन सुरक्षा के नाम पर सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह रोकने के बजाय सेवाओं को नियंत्रित तरीके से चलाने का विकल्प अपनाया जाए.
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या-क्या हुआ?
CJI सूर्यकांत ने कहा कि संभावित पाबंदियों और यात्रा में होने वाली दिक्कतों की जानकारी लोगों को पहले से दी जानी चाहिए… अगर कुछ खास घंटों के दौरान सुरक्षित यात्रा संभव नहीं है, तो यात्रियों को इसकी अग्रिम सूचना मिलनी चाहिए, ताकि वे वैकल्पिक व्यवस्था कर सकें. उन्होंने कहा कि लोगों को मेट्रो स्टेशन पहुंचने, कतारों में खड़े होने और फिर अनिश्चितता का सामना करने देने के बजाय पहले ही जानकारी देना बेहतर होगा.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह अदालत की चिंताओं से सहमत हैं, लेकिन भविष्य में हालात कैसे होंगे, इसका अनुमान लगाकर अधिकारियों को बांधने वाला आश्वासन देना उनके लिए मुश्किल है. उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों को जमीनी हालात के अनुसार फैसले लेने की कुछ छूट मिलनी चाहिए. मेहता ने यह भी कहा कि परिस्थितियों की मांग होने पर कुछ घंटों के लिए सेवाओं को पूरी तरह रोकना भी आनुपातिक कदम हो सकता है.
इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि रोक कितने समय के लिए है और उस समय परिस्थितियां कैसी हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर सेवाएं केवल रात दो से चार बजे तक खुली रहें और बाकी समय बंद रहें, तो व्यावहारिक रूप से यह प्रतिबंध लगाने जैसा होगा. सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि अधिकारियों को परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना होगा. सुनवाई में अदालत ने एक बार फिर संकेत दिया कि सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है, लेकिन उसके कारण आम नागरिकों की आवाजाही और आवश्यक सेवाओं तक पहुंच पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखना होगा.
मेट्रो नोटिस में विरोधाभास पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे और मेट्रो से जुड़े नोटिसों पर भी संज्ञान लिया. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि मेट्रो के नोटिस में एक तरफ फ्रीक्वेंसी कम करने और दूसरी तरफ स्टेशनों को बंद करने की बात कही गई है. उन्होंने कहा कि मेट्रो की फ्रीक्वेंसी कम करना नियमन है, जबकि स्टेशन बंद करना प्रतिबंध है. दोनों बातों में विरोधाभास है, जिस पर दोबारा विचार करने की जरूरत है. CJI सूर्यकांत ने भी कहा कि बंद करने का मतलब बंद करना ही है. वकीलों ने ध्यान दिलाया कि नोटिस में स्टेशनों को अगले आदेश तक बंद रखने की बात कही गई है.
प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक जगह देने का सुझाव
CJI सूर्यकांत ने कहा कि प्रदर्शन स्थल की भौगोलिक स्थिति के कारण कई समस्याएं पैदा हो रही हैं. अगर किसी दूसरी खुली जगह की पहचान कर वहां प्रदर्शन की अनुमति दी जा सके, तो लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा के साथ जरूरी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं. उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में शामिल किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ सकती है. वहां बच्चे और ऐसे लोग भी हो सकते हैं, जिन्हें विशेष सुरक्षा की जरूरत हो, इसलिए बड़ी जगह उपलब्ध कराने पर विचार किया जा सकता है, जहां किसी आपात स्थिति में स्वास्थ्य और अन्य आपातकालीन सेवाएं आसानी से पहुंच सकें.
कपिल सिब्बल ने इस पर कहा कि रामलीला मैदान को प्रदर्शन स्थल के विकल्प के तौर पर उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है. उन्होंने कहा कि अगर जंतर-मंतर पर अनुमति देने से इनकार किया जा रहा था, तो पुलिस रामलीला मैदान में प्रदर्शन की अनुमति दे सकती थी. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने CJI सूर्यकांत की बेंच को बताया कि सक्षम अधिकारी शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर के अलावा किसी दूसरी जगह को तय करने पर विचार करेंगे.
चुनावी रैलियों और दूसरे प्रदर्शनों का भी उठा सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने सवाल किया कि जब चुनावी रैलियों में बड़ी संख्या में लोग दिल्ली आते हैं, तब क्या इसी तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं? उन्होंने कहा कि राजनीतिक रैलियों में भी सैकड़ों और हजारों लोग जुटते हैं, लेकिन उस समय ऐसे प्रतिबंधों को लेकर सवाल नहीं उठाए जाते. इस पर CJI ने साफ किया कि कपिल सिब्बल उन प्रदर्शनकारियों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे, बल्कि उन नागरिकों की चिंताएं उठा रहे हैं, जिन पर दिल्ली में लगाई गई पाबंदियों का असर पड़ रहा है.
CJP के पहले आंदोलन का जिक्र
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह किसी भी नागरिक की जान, सुरक्षा या संपत्ति को जोखिम में नहीं डालना चाहेंगे. उनके मुताबिक, लोगों से अलग-अलग जगहों से दिल्ली पहुंचने की अपील की जा रही है, इसलिए पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था करनी होगी. उन्होंने पूर्व के प्रदर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि आयोजकों ने 20 जून को अनुमति मांगी थी और उसी दिन एक दिन के प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी. प्रदर्शन को सुबह 10 बजे से शाम 4-5 बजे तक की अनुमति मिली थी, लेकिन वह 17 दिनों तक जारी रहा. मेहता ने आरोप लगाया कि इस दौरान कई शर्तों का उल्लंघन हुआ और संसद के पास प्रतिबंधित क्षेत्र में मार्च निकालने की कोशिश भी की गई.
CJI सूर्यकांत ने कहा कि किसान आंदोलन के मामले में भी अदालत यह स्पष्ट कर चुकी है कि किसी प्रदर्शन स्थल पर स्थायी रूप से कब्जा नहीं किया जा सकता, उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियनों, छात्रों, व्यापारियों और दूसरे नागरिकों को भी प्रदर्शन करने और सड़कों का इस्तेमाल करने का अधिकार है. सॉलिसिटर जनरल ने पिछले प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों और अन्य लोगों के घायल होने का भी हवाला दिया. उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा करना जरूरी है, लेकिन बाकी नागरिकों की सुरक्षा भी सरकार की जिम्मेदारी है. उन्होंने महिला पुलिसकर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और उन पर हमले से जुड़े वीडियो अदालत के सामने रखने की बात कही.
हर नागरिक को इन सुविधाओं का लाभ लेने का अधिकार
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकीलों ने दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद करने के प्रस्ताव और कई ट्रेनों को रद्द किए जाने का मुद्दा उठाया. उन्होंने दलील दी कि प्रदर्शन की आशंका के आधार पर इतने बड़े स्तर पर प्रतिबंध लगाने से आम नागरिक प्रभावित होंगे. CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालत आम नागरिकों के अधिकारों को लेकर चिंतित है. उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि मेट्रो सेवाओं को पूरी तरह बंद करने के बजाय उनकी फ्रीक्वेंसी कम करने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है.
CJI सूर्यकांत ने कहा कि नागरिकों को सार्वजनिक सुविधाओं का इस्तेमाल करने का अधिकार है. उन्होंने सरकार से तत्काल कदम उठाने और यह सुनिश्चित करने को कहा कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर हर सेवा रोक न दी जाए.
CJI ने याद दिलाया प्रोपोर्शनैलिटी का सिद्धांत
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाते समय ‘प्रोपोर्शनैलिटी यानी आनुपातिकता के सिद्धांत’ को ध्यान में रखना होगा. इसका मतलब है कि खतरे को रोकने के लिए उतने ही प्रतिबंध लगाए जाएं, जितने जरूरी हों. उन्होंने कहा, ‘आपको कुछ चीजों को रोकना है, तो उसके लिए उतने ही उपाय कीजिए, जितने जरूरी हैं… लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल किया जाए.’
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस उदाहरण पर कहा कि अदालत की टिप्पणी को इस तरह रिपोर्ट नहीं किया जाना चाहिए कि CJI ने सरकार पर मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है. इस पर CJI सूर्यकांत ने साफ किया कि एहतियात बरतने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन सुरक्षा उपायों का असर आम लोगों पर भी पड़ता है. उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, मगर यह जिम्मेदारी केवल सरकारी संपत्ति की सुरक्षा तक सीमित नहीं है. आम नागरिकों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है.
हर चीज ठप न हो, बैरिकेडिंग की भी समीक्षा करें
CJI सूर्यकांत ने कहा कि महिलाएं, छोटे बच्चे, बुजुर्ग और मरीज भी इन रास्तों से यात्रा करते हैं. उनकी सुरक्षा और सुविधाओं का ध्यान रखना भी जरूरी है. अदालत को सुरक्षा उपायों पर आपत्ति नहीं है, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी गतिविधियां ठप न हो जाएं. उन्होंने बैरिकेडिंग की भी समीक्षा करने का सुझाव दिया. CJI ने कहा कि अगर किसी स्थान पर बैरिकेड लगाया जाता है, तो प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उसके कारण कौन-से रास्ते बंद होंगे और कौन-से वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध रहेंगे. ऐसी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराने पर भी विचार किया जाना चाहिए.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वासन दिया कि वह इन चिंताओं को सरकार के सामने रखेंगे. उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों की समय-समय पर समीक्षा कर उनमें बदलाव किया जा सकता है.
ट्रेनों को रद्द करने पर भी अदालत की चिंता
सुनवाई में दिल्ली के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर ट्रेनों के संचालन को प्रभावित करने का मुद्दा भी उठा. CJI ने कहा कि अदालत के सामने एक अन्य संचार का भी जिक्र किया गया है, जिसमें हजरत निजामुद्दीन समेत कुछ इलाकों में ट्रैफिक जाम की आशंका के आधार पर कदम उठाने की बात है. अदालत को बताया गया कि नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन पहुंचने वाली कई ट्रेनें उनके मूल स्टेशन से ही रद्द की गई हैं.
कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि यदि कोई ट्रेन केरल से दिल्ली आ रही है, तो उसे भी इस तरह के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है. वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने कहा कि वकीलों के पास अपनी कारें हो सकती हैं, लेकिन सड़कें ही बैरिकेडिंग से बाधित हों तो आवाजाही कैसे होगी? CJI ने कहा कि प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा के इंतजाम आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को अनावश्यक रूप से प्रभावित न करें.
मस्जिदों में पुलिस के जाने का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस मस्जिदों में जाकर लोगों को आंदोलन में शामिल न होने की हिदायत दे रही है. उन्होंने इससे जुड़े वीडियो और तस्वीरों का भी जिक्र किया. इस पर CJI ने कहा कि जब तक कोई मामला या सामग्री अदालत के सामने नहीं आती, तब तक वह इस बारे में टिप्पणी नहीं कर सकती. उन्होंने कहा कि पुलिस क्यों गई, उसका उद्देश्य क्या था और कार्रवाई उचित थी या नहीं- इन सवालों पर संबंधित तथ्यों के आधार पर ही विचार किया जा सकता है.
कपिल सिब्बल ने कहा कि नागरिकों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए और प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए लक्षित उपाय किए जा सकते हैं. वृंदा ग्रोवर ने भी प्रदर्शन के सिलसिले में युवतियों को रात में ट्रेनों से उतारे जाने का आरोप लगाया और मामले की सुनवाई के लिए सोमवार का विकल्प सुझाया.
प्रदर्शन की अनुमति पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सवाल उठाया कि प्रदर्शन के आयोजक अदालत के सामने क्यों नहीं हैं. कपिल सिब्बल ने स्वीकार किया कि आयोजक उस समय मौजूद नहीं थे. इससे पहले अदालत ने कहा था कि प्रदर्शन की अनुमति से इनकार किए जाने के फैसले को चुनौती देने का सवाल भी महत्वपूर्ण है. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पहले की सुनवाई में कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार मौलिक है, लेकिन उसका इस्तेमाल कानून और निर्धारित प्रक्रिया के तहत होना चाहिए. अदालत के सामने प्रदर्शन की अनुमति, आयोजकों की भूमिका और सार्वजनिक सुविधाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच संतुलन का सवाल है.
सरकार से तत्काल समीक्षा की अपेक्षा
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में फिलहाल जोर इस बात पर रहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन जरूरी कदम उठाए, लेकिन उनका दायरा जरूरत से ज्यादा व्यापक न हो. CJI सूर्यकांत ने सरकार से प्रतिबंधों, मेट्रो सेवाओं, रेल संचालन और बैरिकेडिंग की समीक्षा करने को कहा. सॉलिसिटर जनरल ने अदालत की चिंताओं को सरकार तक पहुंचाने की बात कही.
