ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध विराम से पाकिस्तान का जोश हाई है. सीजफायर में मैसेंजर के रूप में सफलता मिलने के बाद शहबाज शरीफ की सरकार ने शुक्रवार (10 अप्रैल) को पूरे मुल्क में थैंक्स गिविंग डे मनाने का ऐलान किया है. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इसे बड़ी कूटनीतिक जीत घोषित की है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर अमेरिका और ईरान के बीच संदेशवाहक बने पाकिस्तान को इस सीजफायर से क्या फायदा होने वाला है?अमेरिकी मीडिया आउटलेट एक्सियोस के मुताबिक सीजफायर कराने में पाकिस्तान का मूल काम अमेरिकी संदेश को ईरान तक भेजना था. जब सीजफायर का ड्राफ्ट फाइनल हो गया, तो उसे पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ही सार्वजनिक किया. इसके बाद इस ड्राफ्ट पर पहले ट्रंप और फिर ईरान के सुप्रीम लीडर की मुहर लगी.
ईरान और अमेरिका के सीजफायर से जहां पूरी दुनिया खुश है. वहीं ईरान के पड़ोसी देश संयुक्त अरब अमीरात इस सीजफायर की घोषणा से नाराज और दुखी है. दिलचस्प बात है कि यूएई की नाराजगी पाकिस्तान को लेकर है. क्योंकि, पाकिस्तान ने ही पूरी प्रक्रिया में मैसेंजर की भूमिका निभाई है. हालांकि, आधिकारिक तौर पर यूएई ने इस युद्ध में खुद को विजेता घोषित किया है. यूएई के राष्ट्रपति के सलाहकार अनवर गरगाश ने एक बयान में अपनी ताकत का बखान किया.मिडिल ईस्ट के इस युद्ध में ईरान ने सबसे ज्यादा हमले यूएई पर ही किए थे. रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने यूएई पर 2 हजार से ज्यादा हमले किए. जंग के दौरान ईरान ने यूएई के दुबई, शारजाह और अबू धाबी पर जमकर हमला किया.यूएई रक्षा मंत्रालय के मुताबिक ईरान ने पिछले एक महीने में यूएई पर 2200 ड्रोन और 500 बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया. ईरानी हमले में 10 अमीराती की मौत हो चुकी है. जंग के दौरान ईरान ने 26 क्रूज मिसाइलों से भी यूएई पर हमला किया.
अमेरिका ने सीजफायर आनन-फानन में किया
- अमेरिका की सूची में अब तक ईरान से समझौते की पहली शर्त संवर्धित यूरेनियम को शिफ्ट करना रहा है, लेकिन अब इसमें बदलाव आ गया है. 2 हफ्ते का जो समझौता हुआ है, उसमें ईरान की तरफ से सिर्फ होर्मुज को खोला जाएगा. वो भी सशर्त. ईरान टोल लेकर होर्मुज से जहाजों को गुजरने देगा. अब तक होर्मुज से जहाजों का गुजरना मुफ्त था.
- अमेरिका ने सीजफायर आनन-फानन में किया है. सीजफायर में सिर्फ खुद का हित देखा है. INSS के सीनियर फेलॉ डेनिस सिट्रिनोविच का कहना था कि जंग की लागत लगातार बढ़ रही थी. अमेरिका इसलिए इससे बाहर निकलना चाह रहा था. आखिर में उसने ईरान के प्रस्ताव को मान लिया. सीजफायर के लिए अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के अपने सहयोगियों से भी कोई बात नहीं की.
- अमेरिकी सीनेटर क्रिस मॉर्फी ने इसे आत्मसमर्पण बताया है. मॉर्फी का कहना है कि ट्रंप ने जिस तरीके से एक दिन पहले आए ईरान के प्रस्ताव को स्वीकार किया है. वो आत्मसमर्पण है. वो भी ऐसे वक्त में जब ईरान काफी कमजोर स्थिति में है. इसके बावजूद पूरी दुनिया को यह संदेश चला गया है कि होर्मुज पर ईरान का कंट्रोल है. इसे अमेरिका वापस नहीं ले पाया.
- डेनिस सिट्रिनोविच के मुताबिक आगे की जो वार्ता होगी, उसमें अमेरिका अब जंग की धौंस नहीं दे सकता है. समझौता अब सिर्फ व्यावसायिक हितों के आधार पर हो सकता है. ईरान अब अमेरिकी जंग से नहीं डरने वाला है. उसने जंग में सबसे बुरी स्थिति देख ली है.
- ईरान जंग की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रंप ने तख्तापलट की बात कही थी, लेकिन 40 दिन बाद भी ईरान पर इस्लामिक गणराज्य की मजबूत पकड़ है. ट्रंप ने समझौते के लिए भी इस्लामिक गणराज्य के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई से ही संपर्क साधा. इतना ही नहीं, उन्होंने एक पोस्ट में मुज्तबा को कम कट्टरपंथी नेता बताया है.
ट्रंप ने ईरान की शर्तों को बेहतरीन बताया
स्काई न्यूज से बात करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की शर्तों को बेहतरीन बताया है. ट्रंप ने कहा कि इसमें सब कुछ है. अधिकांश पर हमारी सहमति बन गई है. कुछ पर हम बात कर रहे हैं. जिन लोगों को इसके बारे में पता नहीं है, वही इसे गलत बोल रहे हैं.ट्रंप ने आगे कहा कि अमेरिका का मकसद पूरा हो चुका है. ईरान सैन्य स्तर पर पूरी तरह टूट चुका है. अब ईरान हमारे लिए खतरा नहीं है.
सीजफायर से यूएई नाराज
- यूएई एक्सपर्ट अजमद ताहा के मुताबिक पाकिस्तान ने सीजफायर में यूएई को कन्फिडेंस में नहीं लिया. सिर्फ अमेरिका के इशारों पर सीजफायर की प्रक्रिया को अंजाम दिया. सीजफायर में यह घोषणा नहीं है कि किसी भी इलाके पर ईरान हमला नहीं करेगा. ईरान का हमला अगर जारी रहता है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? सीजफायर के मैसेज में भी पाकिस्तान ने यूएई का जिक्र नहीं किया है, जबकि हमले में सबसे नुकसान यूएई को ही हुआ है.
- मनारा संस्था के चेयरमैन और यूएई एक्सपर्ट अली अल-नुएमी इसे एक धोखा मानते हैं. अल-नुएमी के मुताबिक सीजफायर में यूएई की उपेक्षा की गई है. उससे न तो सलाह-मशवरा लिया गया और न ही उसे बताया गया. अजमद ताहा भी इसे एक धोखा मानते हैं.
- यूएई के पॉलिसी मामलों के जानकार अल-खलीफा के मुताबिक होर्मुज पर जो डील हुई है, वो यूएई के फेवर में नहीं है. होर्मुज पर पाकिस्तान ने यूएन वोटिंग से खुद को अलग रखा. वहीं जब डील की बात आई तो ईरान की शर्तों को मान लिया. यह यूएई के लिए झटका है.
जंग लड़ने की तैयारी कर रहा था यूएई
वॉल स्ट्रीट जनरल ने यूएई की तैयारियों को लेकर एक रिपोर्ट की थी. इसमें कहा गया था कि यूएई जंग लड़ने की तैयारी में है. उसने इस संदर्भ में अमेरिका से बात भी की है. यूएई ने जंग में ईरानी नागरिकों पर प्रतिबंध भी लगा दिया था. यूएई की कोशिश किसी भी तरीके से ईरान के शासन को कमजोर करना था.
यूएई होर्मुज नियंत्रण के लिए एक सैन्य बल बनवाने की पैरवी कर रहा था. इसके लिए बहरीन के साथ मिलकर उसने 2 बार यूएन में प्रस्ताव भी पेश किया, लेकिन यह पास नहीं हो पाया. यूएई और ईरान के बीच 1905 से ही दुश्मनी है. यूएई फारस की खाड़ी में स्थित ईरान के 3 द्वीप पर अपना दावा करता रहा है.
