ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर ने बहुप्रतीक्षित ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026’ जारी कर दी है। इस ताज़ा अध्ययन के अनुसार, फिनलैंड ने लगातार नौवें साल दुनिया के सबसे खुशहाल देश का ताज अपने नाम किया है। नॉर्डिक देशों का प्रदर्शन इस बार भी बेहद शानदार रहा है। आइसलैंड, डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे जैसे फिनलैंड के पड़ोसी देश भी विश्व के शीर्ष दस खुशहाल राष्ट्रों में शामिल हैं।यह प्रतिष्ठित रैंकिंग 140 देशों और क्षेत्रों के लगभग एक लाख लोगों की प्रतिक्रियाओं पर गहराई से आधारित है। इस सर्वेक्षण में भाग लेने वाले नागरिकों ने अपने जीवन को शून्य से 10 के पैमाने पर आंका है, जहां शून्य सबसे खराब और 10 सबसे अच्छी स्थिति को दर्शाता है। यह वार्षिक अध्ययन गैलप और संयुक्त राष्ट्र सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क की एक संयुक्त साझेदारी है। इसमें लोगों के व्यक्तिगत जीवन के मूल्यांकन के साथ-साथ व्यापक सामाजिक और आर्थिक कारकों को भी परखा जाता है।बदलती वैश्विक परिस्थितियों और उथल-पुथल के बावजूद फिनलैंड पहले पायदान पर मजबूती से टिका हुआ है। यह देश अब लगभग एक दशक से इस शीर्ष स्थान पर काबिज है।विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत सामाजिक समर्थन, आपसी विश्वास, शानदार कल्याणकारी नीतियां और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा वे मुख्य कारण हैं जिनसे वहां के नागरिक इतनी अधिक जीवन संतुष्टि महसूस करते हैं। नॉर्डिक देशों का बेहतरीन वर्क-लाइफ बैलेंस और समानता का बुनियादी मॉडल उन्हें विश्व स्तर पर सबसे अलग खड़ा करता है।
साल 2026 की इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के दस सबसे खुशहाल देशों की सूची में फिनलैंड के बाद आइसलैंड, डेनमार्क और स्वीडन का नंबर आता है। इसके अलावा कोस्टा रिका, नॉर्वे, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रिया भी इस टॉप टेन सूची का एक अहम हिस्सा हैं।कोस्टा रिका ने इस बार अपनी रैंकिंग में भारी सुधार करते हुए शीर्ष पांच में अपनी जगह पक्की की है। वहां के मजबूत पारिवारिक बंधनों और सक्रिय सामुदायिक जीवन को इस बड़ी सफलता का मुख्य श्रेय दिया गया है। वहीं दूसरी ओर, खुशी के इस पैमाने पर युद्ध और संघर्ष का सामना कर रहे देश सबसे नीचे हैं। इस सूची के निचले 10 देशों में अफगानिस्तान का स्थान सबसे आखिर में है। इसके अलावा सिएरा लियोन, मलावी, रवांडा, जाम्बिया, तंजानिया, लेसोथो, बुरुंडी, जिम्बाब्वे और इराक भी इस सूचकांक में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल हैं।
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 में भारत को 116वां स्थान मिला है
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 में भारत को 116वां स्थान मिला है, जो इसे वैश्विक खुशहाली सूचकांक के निचले आधे हिस्से में रखता है। भले ही देश ने सामाजिक समर्थन और जीवन प्रत्याशा जैसे क्षेत्रों में कुछ सकारात्मक सुधार दिखाया है, लेकिन आर्थिक असमानता, बढ़ता तनाव और सीमित वर्क-लाइफ बैलेंस जैसी गंभीर चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। इन बाधाओं के बावजूद, सामुदायिक कल्याण को बढ़ाने के जमीनी प्रयास धीरे-धीरे बेहतर परिणाम दे रहे हैं। भारत के लिए यह रिपोर्ट मिली-जुली प्रतिक्रिया लेकर आई है. वैश्विक खुशहाली सूचकांक में भारत 116वें स्थान पर रहा है. हालांकि यह रैंकिंग काफी नीचे है, लेकिन राहत की बात यह है कि भारत की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है. साल 2024 में भारत 126वें और 2025 में 118वें नंबर पर था.रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बुजुर्गों के बीच जीवन संतुष्टि के स्तर में बढ़ोतरी देखी गई है, जो रैंकिंग में सुधार का एक बड़ा कारण बना है. फिर भी, दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के बावजूद खुशहाली के मामले में भारत अभी बहुत पीछे है.इस रिपोर्ट का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि आर्थिक तंगहाली और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा पाकिस्तान खुशहाली के मामले में भारत से आगे है. पाकिस्तान को इस सूची में 104वां स्थान मिला है.
युद्ध के हालातों का सामना कर रहे इजरायल ने टॉप-10 में अपनी जगह बनाई है और वह 8वें नंबर पर काबिज है. ईरान भी 97वें पायदान के साथ भारत से बेहतर स्थिति में है. यह आंकड़े बताते हैं कि खुशहाली मापने के पैमाने जैसे सामाजिक सहयोग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, केवल जीडीपी के आंकड़ों पर निर्भर नहीं करते हैं.एक बड़ा बदलाव यह देखा गया है कि कोई भी प्रमुख अंग्रेजी भाषी देश शीर्ष 10 में जगह नहीं बना पाया है. अमेरिका इस बार फिसलकर 23वें स्थान पर पहुंच गया है, जबकि यूके 29वें और कनाडा 25वें नंबर पर है. ऑस्ट्रेलिया 15वें पायदान पर रहा.वहीं दूसरी ओर, दुनिया के सबसे दुखी देशों की बात करें तो गरीबी और गृहयुद्ध झेल रहे अफगानिस्तान और सिएरा लियोन सबसे निचले पायदान पर हैं. यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद दुनिया के कई हिस्सों में लोगों ने अपने जीवन के मूल्यांकन में सुधार दर्ज किया है.
दुनिया के टॉप-10 नाखुश देश
वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स 2026 में दुनिया के 10 देश ऐसे भी हैं जिन्हें खुशहाली के मामले में सबसे नीचे रखा गया है. लिस्ट में सबसे नीचे 10 देशों में 147वें नम्बर पर अफगानिस्तान है. वहीं इसके बाद सिएरा लियाेन (146), मलावी (145), जिम्बाब्वे (144), बोत्सवाना (143), यमन (142), लेबनान (141), डीआर कांगो (140), मिस्र (139) और तंजानिया (138) हैं.
कैसे तैयार होती है खुशहाल देशों की रैंकिंग
खुशहाल देशों की कहानी कहने वाली वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स 2026 कैसे बनती है, अब इसे समझ लेते हैं. हैप्पीनेस इंडेक्स कई फैक्टर्स के आधार पर तय होती है. जैसे- किसी देश में जीडीपी, वहां कितने साल की उम्र तक लोग जीते हैं, जीवन से जुड़े निर्णय लेने की आजादी कितनी है और भ्रष्टाचार का स्तर कैसा है.इन बातों के आधार पर उन देशों को रैंक दी जाती है. इन मामलों में बेहतर साबित होने वाले देशों को टॉप रैंकिंग में रखा जाता है और इनमें पिछड़ने वाले देशों को सबसे नीचे यानी सबसे नाखुश देशों की कैटेगरी में रखते हैं.
सबसे बुरा असर टीनएर्स पर……
इस साल की रिपोर्ट का एक सबसे चौंकाने वाला पहलू युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर अत्यधिक सोशल मीडिया के उपयोग का नकारात्मक प्रभाव है। पिछले एक दशक में अंग्रेजी बोलने वाले और पश्चिमी यूरोपीय देशों में 25 वर्ष से कम उम्र के युवाओं के जीवन संतुष्टि स्कोर में लगभग एक अंक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। शोधकर्ताओं ने इस चिंताजनक ट्रेंड को एल्गोरिदम-संचालित और इन्फ्लुएंसर-आधारित प्लेटफार्मों पर बिताए जाने वाले अत्यधिक समय से जोड़ा है।अन्य आयु समूहों की तुलना में किशोर लड़कियां इस अत्यधिक सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग से कहीं ज्यादा प्रभावित नजर आ रही हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब बेहतर और सुरक्षित डिजिटल आदतों की मांग कर रहे हैं। यह मुद्दा अब विश्व स्तर पर नीति निर्माताओं के बीच भी जोर पकड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप कई देश अब नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया नियमों की समीक्षा करने या उन्हें कड़ा करने पर विचार कर रहे हैं।वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट केवल रैंकिंग की एक साधारण सूची भर नहीं है। यह रिपोर्ट स्पष्ट रूप से दिखाती है कि आर्थिक स्थितियां, स्वास्थ्य, सामाजिक ढांचा और जीवन में चुनाव की स्वतंत्रता किस तरह हमारी खुशी को आकार देते हैं। इन पारंपरिक कारकों के साथ नई डिजिटल चुनौतियां भी अब लोगों के रोजमर्रा के जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित कर रही हैं। यही कारण है कि ये खुशी के आंकड़े कल्याणकारी नीतियों से लेकर डिजिटल मीडिया सुरक्षा तक की चर्चाओं को एक नई दिशा दे रहे हैं।
कई देशों में युवाओं की गिरती मानसिक शांति को देखते हुए विशेषज्ञ अब एक संतुलित डिजिटल जीवन की वकालत कर रहे हैं। उनका स्पष्ट सुझाव है कि वास्तविक दुनिया की सामाजिक बातचीत और समझदारी भरे ऑनलाइन उपयोग का सही तालमेल युवा पीढ़ियों के लिए जीवन संतुष्टि को काफी हद तक बेहतर बना सकता है।फिलहाल, शीर्ष पर फिनलैंड की लगातार मौजूदगी यह साबित करती है कि तेजी से बदलती दुनिया में मजबूत सामाजिक नींव और जीवन की गुणवत्ता ही सच्ची खुशी के सबसे बड़े चालक हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि खुशहाली और सोशल मीडिया के इस्तेमाल के बीच सबसे बुरा असर टीनएर्स पर पड़ रहा है. यह चिंताजनक है. 15 साल की लड़कियां जो पांच घंटे या उससे अधिक समय तक सोशल मीडिया का उपयोग करती हैं, उनमें अपने जीवन से संतुष्टि में गिरावट आई है. जबकि सोशल मीडिया का कम इस्तेमाल करने वाली लड़कियों में यह गिरावट नहीं देखी गई.शोधकर्ताओं का कहना है, जो युवा रोजाना एक घंटे से कम समय तक सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, उनमें खुशहाली का स्तर सबसे अधिक होता है. रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने से खुशहाली पर नकारात्मक असर पड़ता है.रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के निष्कर्ष ऐसे समय पर आए हैं जब ईरान और इज़राइल के बीच तनाव है. इसका असर मिडिल ईस्ट तक दिखाई दे रहा है.इसके बावजूद, कई देशों ने पिछले वर्षों की तुलना में जीवन स्तर के मूल्यांकन में सुधार हासिल किया है. कोस्टा रिका की छलांग इसका उदाहरण है जो यह साबित करती है कि जटिल वैश्विक परिवेश में भी खुशहाली बढ़ सकती है.
