नई दिल्लीः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि वे 75 साल की उम्र में रिटायर नहीं होंगे और न ही किसी और को रिटायर होने के लिए कहेंगे। उन्होंने यह बात आरएसएस के सौ साल पूरे होने पर दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में पत्रकारों से बात करते हुए कही। उन्होंने राजनेताओं के 75 साल की उम्र के बाद रिटायर होने के नियम पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ में स्वयंसेवक के तौर पर काम करने की कोई उम्र सीमा नहीं है और वे संघ के आदेश का पालन करते रहेंगे।मोदी इस साल 17 सितंबर को 75 साल के हो जाएंगे और इससे छह दिन पहले 11 सितंबर को मोहन भागवत 75 के हो जाएंगे। पत्रकारों ने मोहन भागवत उनसे पूछा कि क्या वे राजनेताओं की तरह 75 साल की उम्र में रिटायर हो जाएंगे। इस सवाल के जवाब में उन्होंने मोरोपंत पिंगले का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि मोरोपंत पिंगले एक मजाकिया व्यक्ति थे। एक बार जब वे 70 साल के थेए तो सरकार्यवाह एचवी शेषाद्रि ने उन्हें एक शॉल भेंट की और कुछ कहने को कहा।बीजेपी में 75 प्लस फॉर्मूले की चर्चा पहली बार 2018 में हुई थी. इस फॉर्मूले की जद में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, करिया मुंडा, हुकुमदेव नारायण, सुमित्रा महाजन, शांता कुमार, भगत सिंह कोश्यारी जैसे दिग्गज नेता आए. कहा जाता है कि यह फॉर्मूला नए नेताओं को मौका देने और पुराने नेताओं को स्वास्थ्य लाभ देने के मद्देनजर बनाया गया था. हालांकि, बीजेपी ने आधिकारिक तौर पर कभी नहीं कहा कि हम 75 प्लस का फॉर्मूला पार्टी के भीतर लागू कर रहे हैं.
मोहन भागवत ने बताया कि मोरोपंत पिंगले ने तब कहा था आपने यह शॉल दिया है इसका मतलब है कि आपकी उम्र अब हो गई है। आप एक कुर्सी पर बैठिए और देखिए कि क्या हो रहा है। मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि मोरोपंत पिंगले ने कभी यह नहीं कहा कि वे रिटायर हो जाएंगे या किसी को रिटायर हो जाना चाहिए।सरसंघचालक ने कहा कि संघ में सभी स्वयंसेवक हैं। उन्होंने कहा कि अगर वे 80 साल के भी हो जाते हैं और संघ उन्हें शाखा चलाने के लिए कहता हैए तो वे जरूर जाएंगे। उन्होंने कहा कि वे यह नहीं कह सकते कि वे 75 साल से अधिक के हो चुके हैं और अब रिटायरमेंट का आनंद लेना चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ में कोई रिटायरमेंट बेनिफिट नहीं है।उन्होंने कहा कि वे वही करते हैं जो संघ उनसे करने को कहता है। मोहन भागवत ने यह भी पूछा कि क्या किसी को लगता है कि वे ही एकमात्र व्यक्ति हैं जो सरसंघचालक बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि वे जीवन में कभी भी रिटायर होने के लिए तैयार हैं और 75 साल की उम्र के बाद भी काम करने के लिए तैयार हैं।

वैसे रिटायरमेंट की उम्र का राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में कोई बंधन नहीं रहा है। आमतौर पर यह व्यक्तिगत निर्णय है। हां पार्टी या संगठन आवश्यकता अनुसार नेतृत्व को लेकर पफैसला कर सकते रहे हैं और यह हर संगठन में होता रहा है। लेकिन भाजपा और आरएसएस में यह मुददा 2014-19 में तेजी से उभरा। तब भारतीय जनता पार्टी ने वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को संसदीय बोर्ड की जगह मार्गदर्शक मंडल में रखकर विनम्र तरीके संकेत दे दिया गया था। आडवाणी और जोशी को भाजपा के मार्गदर्शक मंडल में भेजना किसी तरह से उन्हें रिटायर करने की कोशिश है। 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले भी इसी तरह के प्रयास हुए थेए लेकिन तब वे इसके लिए राजी नहीं हुए थे।चुनाव नतीजों के बाद नरेंद्र मोदी ने अमित शाह का इस्तेमाल कर भाजपा को पूरी तरह नियंत्रित कर लिया। उस समय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तो वैसे भी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और सक्रिय रूप से सियासत से दूर थे उन्हें भी इसी श्रेणी में शामिल कर इस तिकड़ी को सीधा संदेश दिया गया था। यह तीनों को अलविदा कहने का एक विनम्र तरीका था आपने अच्छा नेतृत्व दिखाया लेकिन अब आपका वक़्त ख़त्म हो गया। इस के बाद हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार, पूर्व केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र और पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष करिया मुंडा जैसे अन्य करीब 23 दिग्गजों नेताओं ने ख्ुाद को सक्रिय राजनीति से अलग करना बेहतर समझा।
इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो इस बार 17 सिंतबर 2025 को 75 साल के हो जाएंगे और 11 सिंतबर 2025 को संघ प्रमुख मोहन भागवत भी 75 के हो जाएंगे जाहिर तौर पर दोनों की उम्र को लेकर रिटायरमेंट की चर्चाएं होने लगी थी लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विज्ञान भवन में यह कह कर कि वे 75 साल की उम्र में रिटायर नहीं होंगे और न ही किसी और को रिटायर होने के लिए कहेंगे।रिटायरमेंट के मुददे पर विराम लगा दिया।
किन-किन नेताओं पर पड़ा असर?
लालकृष्ण आडवाणी- 2019 में 91 साल की उम्र में लालकृष्ण आडवाणी सक्रिय राजनीति से बाहर हो गए. आडवाणी तब गुजरात के गांधीनगर सीट से सांसद थे. उनकी सीट बीजेपी ने तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह को सौंप दी. आडवाणी इसके बाद दिल्ली में अपने घर पर स्वास्थ्य लाभ लेने लगे.
मुरली मनोहर जोशी- आडवाणी के साथ 75 प्लस फॉर्मूले की जद में मुरली मनोहर जोशी भी आए. 2019 में 85 साल की उम्र में जोशी सक्रिय राजनीति से विदा हो गए. जोशी उस वक्त उत्तर प्रदेश की कानपुर लोकसभा सीट से सांसद थे. जोशी की जगह पार्टी ने 2019 के चुनाव में सत्यदेव पचौरी को उम्मीदवार बनाया.
करिया मुंडा- लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष करिया मुंडा भी 75 प्लस फॉर्मूले की चपेट में आ चुके हैं. 2019 में उनके खूंटी सीट से चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन करिया मुंडा इस फॉर्मूले की वजह से रेस से बाहर हो गए. करिया मुंडा की जगह 2019 में झारखंड की खूंटी सीट से बीजेपी ने अर्जुन मुंडा को उम्मीदवार बनाया
सुमित्रा महाजन- ताई के नाम से मशहूर पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन भी 75 प्लस फॉर्मूले की जद में आ चुकी हैं. 2019 में इंदौर लोकसभा सीट से उनके चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन 76 साल होने की वजह से महाजन पिछड़ गईं. उनकी जगह पर बीजेपी ने शंकर लालवानी को उम्मीदवार बनाया. 2019 और 2024 में लालवानी यहां से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे.
बाबूलाल गौर- मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल गौर भी इस फॉर्मूले की वजह से सक्रिय राजनीति से अलग-थलग हो चुके हैं. 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने गोविंदपुरा से गौर का टिकट काट दिया. उनकी जगह उनकी बहू कृष्णा गौर को टिकट दिया गया. कृष्णा गौर वर्तमान में मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री हैं.
कुसुम महदेले- 75 प्लस फॉर्मूले की जद में मध्य प्रदेश की कद्दावर नेता कुसुम महदेले भी आ चुकी हैं. 2018 के विधानसभा चुनाव में 75 साल होने की वजह से महदेले को टिकट नहीं मिल पाया. उस वक्त महदेले पन्ना से विधायक थीं. बीजेपी ने महदेले की जगह बिजेंद्र प्रताप सिंह को पन्ना से उम्मीदवार बनाया था.
भगत सिंह कोश्यारी- उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी पर भी 75 प्लस फॉर्मूले का असर हो चुका है. 2019 में कोश्यारी नैनीताल सीट से सांसद थे, लेकिन 76 साल उम्र होने की वजह से उन्हें टिकट नहीं मिला. कोश्यारी की सीट को बीजेपी ने अजय भट्ट को सौंप दिया. 2019 और 2024 में अजय चुनाव जीते और केंद्र में मंत्री भी बने. वहीं कोश्यारी इसके बाद राज्यपाल बनाए गए.
हुकुमदेव नारायण- मधुबनी से सांसद रहे फायरब्रांड नेता हुकुमदेव नारायण यादव भी इसकी जद में आ चुके हैं. हालांकि, खुद की जगह वे अपने बेटे को टिकट दिलाने में कामयाब रहे थे. मधुबनी सीट से अशोक दो बार से सांसदी जीत रहे हैं.
शांता कुमार- 75 प्लस फॉर्मूले की वजह से शांता कुमार भी सक्रिय राजनीति से अलग हो चुके हैं. हिमाचल की कांगरा सीट से सांसद रहे शांता कुमार को 2019 में उम्र की वजह से टिकट नहीं मिला था. बीजेपी ने उनकी जगह किशन कपूर को टिकट दिया था. 2019 में किशन चुनाव जीते और संसद पहुंचे.
