आज हम बात करेंगे नेपाल में बाढ़ से मची तबाही की। इस मुद्दे पर बात इसलिए क्योंकि नेपाल में भीषण बाढ़ और भू स्खलन ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। इस त्रासदी में मरने वालों की संख्या सैकड़ों में हैं वहीं बडी संख्या में लोगों के लापता होने की खबर है। जान माल का भारी नुकसान हुआ है। भारत सहित 30 से अधिक देशों के पर्यटक लापता हैं। बाढ़ ने कई कस्बों और गांवों को तबाह कर दिया है। यह हाल के वर्षों में नेपाल की सबसे भीषण आपदाओं में से एक है। इस बीच फर्स्ट रिस्पांडर की अपनी भूमिका को आगे बढ़ाते हुए भारत नेपाल की हर संभव मदद कर रहा है। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नेपाल में आई आपदा को लेकर गहरी संवेदना प्रकट की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से फोन पर बात की और नेपाल को हर संभव मानवीय सहायता देने का भरोसा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत के लोग इस कठिन घड़ी में नेपाल के अपने भाई.बहनों के साथ एकजुटता से खड़े हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि इस संकट की घडी में भारत नेपाल के अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में है। बचाव और लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए भारतीय वायुसेना ने हेलीकॉप्टर तैनात किए हैं। भारतीय वायुसेना ने कहा कि सी17 और सी 130 विमानों के जरिए नेपाल राहत सामग्री पहुंचाई गई हैं। काठमांडु स्थित भारतीय दूतावास ने कहा है कि भारत हमेशा नेपाल के साथ है और हर संभव मदद देने के लिए प्रतिबद्ध है। इस बीच यह भी खबर है कि नेपाल की बाढ़ में भारत के नागरिक भी बढी संख्या में लापता हैंे। भारतीय दूतावास समेत कई राज्यों ने इमरजेंसी हेल्पलाइन शुरू की हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने नेपाल में आई बाढ़ के मद्देनजर बिहार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों से बात की है। सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन और राहत एवं बचाव दल के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा बल हाई अलर्ट पर है। इस लिए मुद्दा आपका में आज बात नेपाल में बाढ़ से मची तबाही की। नेपाल बाढ़ का विस्तृत विश्लेषण करेंगे कारण, प्रभाव, और बिहार यूपी पर असर और भारत की मदद पर चर्चा करेंगे।
नेपाल में विनाशकारी सैलाब के बाद अब फिर खतरा मंडरा रहा है। नेपाल सरकार ने भोटेकोशी नदी के आसपास पहने वालों को ऊपर के स्थानों पर जाने को कहा है क्योंकि नदी का जलस्तर बढ़ रहा है और तिब्बत में ग्लेशियर के फिर फट कर गिरने का खतरा है। बुधवार को भोटेकोशी नदी में आई अचाक बाढ़ ने नेपाल के 8 ज़िलों को पूरी तरह तबाह कर दिया है। इस प्राकृतिक प्रकोप में मृतकों की संख्या लगातार बढती जा रही है। करीब डेढ़ हजार लोग लापता हैं, इनमें 290 भारतीय भी हैं। सवाल ये है कि अचानक बाढ़ क्यों आई? ग्लेशियर कितनी ऊंचाई पर, कहां पर टूटा? उसके बाद नदी में इतना पानी कैसे आया, क्यों आया? उसकी रफ्तार इतनी ज्यादा क्यों थी? क्या इसके पीछे चीन की कोई लापरवाही है? क्या चीन ने वाकई नेपाल को अलर्ट करने में देरी की? क्या चीन ने सीमा पर जो बांध बनाए हैं, वो भविष्य में नेपाल और भारत के लिए खतरनाक हो सकते हैं?
नेपाल की नेशनल डिजास्टर मैंनेजमेंट अथॉरिटी ने एक नया अलर्ट जारी किया है। उसने कहा है कि रसुआगढ़ी बॉर्डर से करीब 18 किलोमीटर ऊपर ल्हेंडे नदी का रास्ता अब भी रुका हुआ है। इसकी वजह से एक कृत्रिम झील बन गई है। ये कृत्रिम झील कभी भी टूट सकती है। चीन कह रहा है कि ग्लेशियर भूकंप की वजह से टूटा, लेकिन अमेरिकन जिओलॉजिकल सर्वे ने कहा कि नेपाल में अचानक आई बाढ़ का कारण 4.4 तीव्रता वाला भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियर का ढहना था। USGS ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पहले ग्लेशियर टूटा, ग्लेशियर का टुकड़ा 5,200 मीटर की ऊंचाई से 1200 मीटर नीचे गिरा। इसके गिरने से जो कंपन पैदा हुआ, उसे भूकंप कहा जा रहा है। हकीकत ये है कि भूकंप की वजह से ग्लेशियर नहीं टूटा, बल्कि ग्लेशियर टूटकर गिरने से 4.4 की तीव्रता का भूकंप महसूस हुआ।
साफ है चीन ने न सिर्फ ग्लेशियर टूटने की वजह को लेकर दुनिया को गुमराह करने की कोशिश की, बल्कि नेपाल को इस खतरे की जानकारी देने में भी देरी की। चीन ने रीयल टाइम इंफोर्मेशन शेयर नहीं की, बल्कि नेपाल को 45 मिनट बाद इसकी जानकारी दी। इसकी वजह से नेपाल अपने नागरिकों को अलर्ट नहीं कर पाया। चीन की दूसरी बड़ी गलती ये भी है कि उसने तिब्बत की eco-senstive zone में अवैध निर्माण कर रखा है। चीन ने ऊंचाई वाले ग्लेशियर के इलाकों में ‘श्याओकांग मॉडल’ पर गांव और बस्तियां बसा दी है। श्याओकांग मॉडल का अर्थ बॉर्डर इलाकों में आधुनिक सुविधाओं से लैस गांव बसाना है। चीन इसे एक सामरिक कदम के तौर पर देखता है। इसके ज़रिए वो सरहदी इलाकों में अपनी भौगोलिक और रणनीतिक पकड़ मज़बूत बनाता है।
ग्लेशियर टूटने की दूसरी वजह ये बताई जा रही है कि चीन ने तिब्बत के केरुंग शहर में पहाड़ियों को बेतरतीब खनन किया है। त्रिशूली नदी के नेचुरल रूट को बदल दिया है। इसके अलावा चीन ने केरुंग में पोर्ट भी बनाया है। आरोप है कि इस बनावट के कारण चीन की तरफ से नेपाल जाने वाले पानी की रफ्तार बहुत तेज़ हो जाती है। नेपाल में कितने लोग मारे गए हैं, कितने लापता हैं, इसका अभी तक सही अंदाज़ा नहीं है। सबसे बड़ी समस्या ये है कि जिन लोगों के अपने लोग लापता हैं, उनके परिवार वालों को कोई सूचना नहीं मिल रही। वो सिर्फ TV पर टकटकी लगाए बैठे हैं, Helpline पर फोन करते हैं। पर जहां ये हादसा हुआ वहां कोई संचार नेटवर्क नहीं है। इसीलिए किसी को कुछ नहीं पता।
किसी को ये भी नहीं मालूम कि ये हादसा कैसे हुआ? परसों से ये कहा जा रहा है कि चीन ने अगर आधे घंटे पहले अलर्ट कर दिया होता तो हजारों लोगों की जान बच सकती थी। चीन कह रहा है कि उसकी तरफ से कोई लापरवाही नहीं हुई। दूसरी तरफ भारत ने जिस तरह आगे बढ़ कर नेपाल की मदद की, उसकी तारीफ पूरी दुनिया में हो रही है। भारतीय वायु सेना लोगों को बचाने और जरूरी सामान पहुंचाने में पूरी ताकत से लगी है। रेस्क्यू टीम्स घटनास्थल पर मौजूद हैं, helpline active हैं, भारत के दूतावास पूरी दुनिया में अपने लोगों के संपर्क में हैं। असल में ये नरेंद्र मोदी की खासियत है। प्राकृतिक आपदा चाहे नेपाल में हो या टर्की में, भारत की टीम्स, डाक्टर्स और राहत सामग्री सबसे पहले पहुंचती है।
