राजस्थान के 309 नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर बहुत ज्यादा नहीं रहा, लेकिन वार्ड जीतने में दोनों दलों के बीच बड़ा फासला है। करीब 1.06 करोड़ वोटों में भाजपा को 37.35 लाख और कांग्रेस को 36.35 लाख वोट मिले। यानी भाजपा को कांग्रेस से 99,615 वोट ज्यादा मिले। कुल वोटों में भाजपा की हिस्सेदारी 35.18%, कांग्रेस की 34.24% और निर्दलीयों की 27.38% रही। इस तरह भाजपा और कांग्रेस के वोट शेयर में सिर्फ 0.94 प्रतिशत अंक का अंतर है।निकाय चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी बड़ी संख्या में वोट हासिल किए। उन्हें कुल 29.06 लाख वोट मिले, जो कुल वोटों का 27.38% है। दूसरे दलों में RLP को 1,00,277, आम आदमी पार्टी को 49,829, CPM को 34,170, BSP को 30,179 और BAP को 14,150 वोट मिले। वहीं NOTA को 1.09 लाख वोट मिले।यानी BAP, BSP, CPM और AAP जैसी पार्टियों को मिले वोट NOTA से भी कम रहे।वोट शेयर में दोनों प्रमुख दलों के बीच एक फीसदी से भी कम अंतर रहा, लेकिन वार्डों के नतीजे बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाते हैं। 10,244 वार्डों में से 10,235 के परिणाम घोषित हो चुके हैं। नौ वार्डों में दोबारा मतदान होना है। घोषित परिणामों में भाजपा ने 4,179 वार्ड, कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते हैं। इस तरह भाजपा ने कांग्रेस से 566 वार्ड ज्यादा जीते।यानी राज्यभर में कुल वोटों का अंतर भले ही बहुत कम रहा, लेकिन वार्डवार मुकाबलों में भाजपा ज्यादा जगहों पर जीत दर्ज करने में सफल रही। कई वार्डों में कुछ ही वोटों का अंतर जीत-हार तय करता है। निर्दलीयों की मजबूत मौजूदगी ने भी कई जगह भाजपा और कांग्रेस के वोटों को प्रभावित किया।इन चुनावों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भाजपा और कांग्रेस के वोट शेयर में सिर्फ 0.94 प्रतिशत अंक का अंतर है, तो वार्ड जीत में 566 का फासला कैसे बन गया? दरअसल कई निकायों में मुकाबला त्रिकोणीय रहा। जिनमें थर्ड फ्रंट और निर्दलीय प्रत्याशियों ने कड़ी टक्कर दी। भाजपा को कांग्रेस से करीब एक लाख वोट ज्यादा मिलने का असर वार्डों की संख्या में काफी बड़ा दिखाई दिया। दूसरी तरफ निर्दलीयों का 27.38% वोट शेयर भी बताता है कि स्थानीय उम्मीदवारों ने दोनों प्रमुख दलों के वोट गणित को काफी प्रभावित किया। कुल मिलाकर, वोट शेयर में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला रहा, लेकिन वार्ड जीत ने भाजपा को साफ बढ़त दे दी।
राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजों में कई शहरों में भाजपा की शुरुआती बढ़त के बाद कांग्रेस ने वापसी की। अजमेर, पाली, बीकानेर और झालावाड़ में कांग्रेस का प्रदर्शन मजबूत रहा, जबकि उदयपुर और भीलवाड़ा में भाजपा ने बहुमत हासिल किया। जयपुर और जोधपुर समेत कई जगह निर्दलीयों ने भी चुनावी समीकरण बदले।इन नतीजों का सबसे बड़ा संकेत यह है कि इस बार कई शहरों में चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहा। स्थानीय चेहरे, बागी उम्मीदवार और निर्दलीयों ने कई वार्डों में पूरा चुनावी गणित बदल दिया। यही वजह है कि कई जगह किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता नजर नहीं आया।राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा को कांग्रेस से 99,615 वोट ज्यादा मिले। वोट शेयर अंतर 0.94% रहा, लेकिन भाजपा ने कांग्रेस से 566 वार्ड ज्यादा जीतकर बड़ा फर्क बनाया।चुनाव परिणामों के मुताबिक 60 निकायों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला है। वहीं 11 निकायों में भाजपा और कांग्रेस बराबर सीटों पर हैं। ऐसे निकायों में निर्दलीय और दूसरे दलों के पार्षद बोर्ड बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सबसे बड़ा मुकाबला जोधपुर नगर निगम में है। 100 वार्ड वाले इस निगम में भाजपा और कांग्रेस ने 44-44 वार्ड जीते हैं, जबकि 10 वार्ड निर्दलीयों के खाते में गए हैं। ऐसे में बोर्ड गठन का फैसला निर्दलीयों के रुख पर निर्भर कर सकता है।भाजपा और कांग्रेस के बराबर सीटों वाले अन्य निकायों में पीसांगन, अंता, कापरेन, राजलदेसर, बसेड़ी, सूरतगढ़, मारवाड़ जंक्शन, धरियावद और खाटूश्यामजी शामिल हैं।
राजस्थान की राजनीति में स्थानीय शासन की दिशा तय करने वाले 309 नगरीय निकायों (Urban Local Bodies) के चुनाव परिणाम सामने आ चुके हैं। 10,244 वार्डों के लिए हुए इस महामुकाबले ने राज्य के शहरी इलाकों के सियासी मानचित्र को पूरी तरह से फिर से सामने ला दिया है। एक तरफ जहां राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपनी मजबूत पकड़ का प्रदर्शन करते हुए कुल वार्डों और प्रमुख नगर निगमों में बढ़त बनाई है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने कई अप्रत्याशित सीटें जीतकर और दिग्गज नेताओं के गृह क्षेत्रों में सेंध लगाकर भाजपा के लिए बड़ी चुनौती पेश की है। इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन किसी भी राष्ट्रीय दल की तुलना में राज्य के 177 निकायों के लिए निर्णायक साबित हुआ है। राजस्थान निकाय चुनाव ने किस तरह शहरी सत्ता का नक्शा बदला है और नतीजों के सियासी मायने क्या हैं, समझने की कोशिश करते हैं।
दिग्गज नेताओं के गढ़ में बड़ा उलटफेर
इन चुनावों की सबसे ज्यादा चर्चा दिग्गज नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में आए चौंकाने वाले नतीजों की हो रही है। अजमेर में भाजपा का 36 साल पुराना किला ध्वस्त हो गया। ऐतिहासिक रूप से अजमेर नगर निगम भाजपा का अजेय गढ़ माना जाता रहा है। पिछले 36 वर्षों से यहां भाजपा जीतती आ रही थी। लेकिन इस बार कांग्रेस ने 37 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जबकि भाजपा 32 सीटों पर सिमट गई।
वसुंधरा राजे का गढ़ (झालावाड़ व झालरापाटन)
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले झालावाड़ नगर परिषद के 45 वार्डों में कांग्रेस ने जबरदस्त सेंधमारी करते हुए 29 वार्डों में जीत दर्ज की और बोर्ड बनाने का रास्ता साफ किया। हालांकि, उनके अपने विधानसभा क्षेत्र झालरापाटन नगरपालिका के 35 वार्डों में भाजपा ने 22 सीटें जीतकर अपना वर्चस्व कायम रखा।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का गृह क्षेत्र (पाली)
पाली नगर निगम में भाजपा प्रदेश प्रमुख मदन राठौड़ का घरेलू मैदान होने के बावजूद पार्टी को निराशा हाथ लगी। यहां कांग्रेस 29 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी और भाजपा 21 सीटों पर अटक गई।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह क्षेत्र (भरतपुर)
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में नगर निगम का फैसला बेहद अजीब रहा। यहां 65 में से 36 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने परचम लहराया, जिसके चलते दोनों प्रमुख दल पीछे छूट गए।
अशोक गहलोत और गजेंद्र सिंह शेखावत का क्षेत्र (जोधपुर)
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के गृह क्षेत्र जोधपुर में मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा, जहां भाजपा और कांग्रेस दोनों ही 44-44 सीटों पर आकर रुक गईं और सत्ता की कुंजी 10 निर्दलीयों के हाथों में आ गई।
बीजेपी और कांग्रेस के दावे
चुनाव परिणाम घोषित होते ही जहां सत्तारूढ़ दल ने इसे सरकार के कामकाज की सराहना बताया, वहीं विपक्ष ने इसे बदलाव का संकेत करार दिया। परिणामों पर खुशी जताते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि प्रदेश की जनता ने राज्य सरकार के सुशासन और ‘विकसित भारत-विकसित राजस्थान’ के संकल्प पर अपनी मुहर लगाई है। उन्होंने कहा कि शहर की जनता ने विकास की निरंतरता को चुना है। उधर, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने आंकड़ों के आधार पर भाजपा के दावों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनावों के समय भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का जो अंतर 8 प्रतिशत के आसपास था, वह इन स्थानीय चुनावों में घटकर महज 1 प्रतिशत के करीब रह गया है। इससे साफ है कि शहरी जनता का भरोसा भाजपा से उठ रहा है और कांग्रेस मजबूती से उभर रही है।
अब आगे क्या? 21 और 22 सितंबर को तय होगी असली ‘सत्ता’
309 नगरीय निकायों में से सिर्फ 132 निकायों में ही पार्टियों को स्पष्ट बहुमत मिल सका है (भाजपा-86, कांग्रेस-46)। बाकी 177 निकायों में त्रिशंकु की स्थिति बनी हुई है। अब असली राजनीतिक शह-मात का खेल इन 177 निकायों में शुरू हो चुका है। दोनों ही दल निर्दलीय पार्षदों को अपने पाले में लाने के लिए जोर-आजमाइश कर रहे हैं। राज्य के सभी निकायों में महापौर, नगर परिषद अध्यक्ष और नगरपालिका अध्यक्ष पद के लिए चुनाव 21 सितंबर को कराए जाएंगे। इसके अगले ही दिन 22 सितंबर को उप-महापौर और उपाध्यक्ष पदों का निर्वाचन होगा।
विधानसभा चुनाव बनाम निकाय चुनाव का गणित
राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के नतीजों को समझने के लिए पिछले विधानसभा चुनाव (2023) के रुझानों से तुलना करना जरूरी है, जो राज्य के राजनीतिक ध्रुवीकरण की एक नई तस्वीर पेश करता है। दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 200 में से 115 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई थी, जबकि तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी 69 सीटों पर सिमट गई थी। उस समय भाजपा को करीब 41.7% और कांग्रेस को 39.5% वोट मिले थे, यानी दोनों पार्टियों के बीच मत प्रतिशत का अंतर लगभग 2.2% था।
शहरी वोट बैंक में भाजपा का दबदबा बरकरार, लेकिन मार्जिन घटा
पारंपरिक रूप से राजस्थान का शहरी मतदाता भाजपा का मजबूत कैडर माना जाता रहा है। निकाय चुनाव 2026 में भाजपा ने कुल 86 निकायों में स्पष्ट बहुमत और 4,179 वार्डों पर जीत हासिल कर अपनी इस साख को बचाए रखा है। हालांकि, विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार कांग्रेस ने शहरी निकायों में बेहद आक्रामक वापसी की है। विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करने वाली कांग्रेस ने निकाय चुनावों में 46 निकायों में पूर्ण बहुमत हासिल किया है और 3,613 वार्ड जीते हैं। पार्टी ने न सिर्फ अजमेर और झालावाड़ जैसे भाजपा के पारंपरिक दुर्ग ढहा दिए हैं, बल्कि कुल वोट शेयर के अंतर को भी बेहद पाट दिया है।
राजस्थान की सियासी परंपरा
राजस्थान में हर पांच साल में राज बदलने की राजनीतिक परंपरा रही है। इसके नजर ये चुनाव परिणाम अहम हैं। निकाय चुनाव 2026 के परिणाम यह संकेत देते हैं कि जहां सरकार बनाने के बाद भाजपा अपनी पकड़ पूरी तरह ढीली नहीं होने देना चाहती, वहीं विपक्षी कांग्रेस ने अपने मजबूत जमीनी कैडर के दम पर अपनी खोई जमीन वापस पाना शुरू कर दिया है। बहरहाल, स्थानीय स्तर पर क्या सियासी तस्वीर उभरकर सामने आती है, ये तो 21 और 22 सितंबर को निर्दलीयों के रुख के साथ ही यह स्पष्ट होगा। तब पचा चलेगा कि प्रदेश के शहरी तंत्र की अंतिम बागडोर किसके हाथ में होगी।
किस पार्टी के खाते में क्या आया?
राव राजेंद्र सिंह के प्रभाव वाले इलाके में भाजपा को झटका
जयपुर के नतीजों में भाजपा के लिए एक बड़ा झटका जयपुर ग्रामीण सांसद राव राजेंद्र सिंह के प्रभाव वाले वार्ड में सामने आया है। यहां भाजपा प्रत्याशी को हार मिली है। चुनाव से पहले इस क्षेत्र के परिसीमन को लेकर भी चर्चा रही थी। ऐसे में सांसद के प्रभाव वाले इलाके में भाजपा की हार ने स्थानीय राजनीति में सवाल खड़े कर दिए हैं।
जोधपुर में कांग्रेस जिलाध्यक्ष हारे
जोधपुर में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। पार्टी के शहर जिलाध्यक्ष को भाजपा के मेघराज लोहिया ने हरा दिया। लोहिया पूर्व राज्यमंत्री रह चुके हैं। जोधपुर में 71.95 फीसदी मतदान हुआ था। इसके बावजूद मुकाबला किसी एक दल के पक्ष में जाता नजर नहीं आ रहा। यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर बनी हुई है। ऐसे में बाकी वार्डों के नतीजे बोर्ड गठन के लिए बेहद अहम होंगे।
सुनील कोठारी की जीत से मेयर की रेस तेज
जयपुर में भाजपा के सुनील कोठारी ने वार्ड 112 से जीत दर्ज कर ली है। उन्होंने 905 वोट के अंतर से चुनाव जीता। कोठारी को मेयर पद के प्रमुख दावेदारों में गिना जा रहा है। भाजपा ने उन्हें निवर्तमान मेयर कुसुम यादव का टिकट काटकर मैदान में उतारा था। वार्ड जीतने के बाद अब मेयर पद की दौड़ में कोठारी की दावेदारी और मजबूत मानी जा रही है।
गजनफर अली की रिकॉर्ड जीत
जयपुर के वार्ड 113 में कांग्रेस के गजनफर अली ने बड़े अंतर से जीत हासिल की। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक उन्होंने 10,014 वोट के अंतर से चुनाव जीता। यहां भाजपा प्रत्याशी फरीद्दुदीन जैकी की जमानत भी जब्त हो गई। यह नतीजा जयपुर में कांग्रेस के कुछ इलाकों में मजबूत पकड़ की ओर इशारा करता है।
पांच वोट से कांता देवी ने जीता वार्ड
जयपुर के वार्ड 124 में मुकाबला बेहद करीबी रहा। कांग्रेस की कांता देवी ने महज पांच वोट से जीत दर्ज की। यानी जहां वार्ड 113 में जीत का अंतर 10 हजार से ज्यादा रहा, वहीं वार्ड 124 में फैसला सिर्फ पांच वोट से हुआ।
21 साल के फैज हसन ने मारी बाजी
वार्ड 71 का नतीजा भी खास रहा। कांग्रेस के 21 वर्षीय फैज हसन ने जीत दर्ज की। इस जीत के साथ जयपुर नगर निगम में युवा चेहरे की एंट्री हुई है। यहां निर्दलीय प्रत्याशी दूसरे और भाजपा उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहा। यह नतीजा भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भाजपा के सामने कई वार्डों में कांग्रेस के अलावा निर्दलीयों ने भी मजबूत चुनौती पेश की है।
निर्दलीयों ने बिगाड़ा समीकरण
जयपुर में निर्दलीयों का प्रदर्शन भी भाजपा और कांग्रेस के लिए परेशानी का कारण बना है। वार्ड 35 में निर्दलीय अमरचंद कुमार ने भाजपा प्रत्याशी को 1,461 वोट से हराया। वहीं वार्ड 61 में निर्दलीय मुकेश कुमार मीणा ने भाजपा उम्मीदवार को 606 वोट से शिकस्त दी। इन नतीजों से साफ है कि कई वार्डों में मुकाबला पार्टी के चुनाव चिह्न से ज्यादा स्थानीय समीकरणों पर टिका रहा।
उदयपुर में भाजपा का बहुमत
उदयपुर में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। हालांकि कांग्रेस ने भी कुछ वार्डों में अपनी पकड़ बनाए रखी। वार्ड 17 से कांग्रेस शहर अध्यक्ष फतेह सिंह राठौड़ की पत्नी पूनम कंवर ने जीत दर्ज की। वहीं वार्ड 5 से पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के दामाद के भाई आकाश वागरेचा चुनाव जीत गए हैं।
अजमेर में कांग्रेस का बड़ा उलटफेर
अजमेर का नतीजा कांग्रेस के लिए सबसे अहम माना जा रहा है। शुरुआती रुझानों में भाजपा के आगे रहने के बाद कांग्रेस ने वापसी की और अब वह सबसे बड़ी पार्टी की स्थिति में है। अजमेर को भाजपा के मजबूत शहरी क्षेत्रों में माना जाता रहा है। ऐसे में कांग्रेस का यहां सबसे बड़ी पार्टी बनना स्थानीय राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। 36 साल बाद कांग्रेस के बहुमत में आने का दावा भी किया जा रहा है, हालांकि अंतिम बोर्ड गठन की तस्वीर सभी परिणाम आने के बाद ही साफ होगी।
पाली में पहली बार निगम चुनाव
पाली में नगर निगम बनने के बाद पहली बार निगम चुनाव हुए हैं। यहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है। भाजपा बहुमत से दूर है। ऐसे में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बोर्ड गठन में महत्वपूर्ण हो सकती है।
भरतपुर में निर्दलीयों का दबदबा
