संसद का मानसून सत्र अपने अंतिम दौर में है और राजनीतिक गलियारों में FCRA संशोधन से लेकर परिसीमन तक कई अहम मुद्दों पर हलचल तेज है. परिसीमन के बाद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक और वित्तीय बदलाव देखने को मिलेगा. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जनप्रतिनिधियों का कुनबा बढ़ने से सरकारी खजाने पर इसका कितना सीधा असर पड़ेगा. वर्तमान में 543 सीटों वाली लोकसभा का दायरा बढ़कर 816 सीटों तक होने का अनुमान है, जिससे जनहित और प्रशासनिक स्तर पर दूरगामी बदलाव तय माने जा रहे हैं.
परिसीमन के बाद संसद की बदलती तस्वीर
लोकसभा सीटों के पुनर्गठन और महिला आरक्षण कानून (33 फीसदी) के क्रियान्वयन को ध्यान में रखते हुए परिसीमन की योजना बनाई गई है. वर्तमान में देश में कुल 543 लोकसभा सीटें हैं, जिन्हें बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है. इसका सीधा मतलब है कि संसद में 273 नए सांसद जुड़ेंगे, जो कि मौजूदा संख्या में लगभग 50 प्रतिशत का इजाफा है. जनगणना के बाद वर्ष 2029 के आम चुनावों से इस नई व्यवस्था के लागू होने की संभावना जताई जा रही है.
अभी एक सांसद पर कितना खर्चा?
सरकार एक सांसद की जिम्मेदारियों और संसदीय कार्यों के सुचारू संचालन के लिए पर्याप्त व्यवस्था करती है. आंकड़ों पर नजर डालें तो एक सांसद को हर महीने 1.24 लाख रुपये का मूल वेतन मिलता है. इसके साथ ही अपने क्षेत्र के संपर्क और कामकाज के लिए 70,000 रुपये प्रति माह का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और कार्यालय प्रबंधन के लिए 60,000 रुपये प्रति माह का ऑफिस भत्ता आवंटित किया जाता है. जब संसद का सत्र चलता है, तो उन्हें 2,500 रुपये प्रतिदिन का दैनिक भत्ता भी दिया जाता है.
भत्ते और सुविधाएं
वेतन के अलावा जनप्रतिनिधियों को कई अन्य बुनियादी और विशेष सुविधाएं मिलती हैं. इसमें नई दिल्ली में मुफ्त सरकारी आवास, असीमित ट्रेन और हवाई यात्रा का पास, मुफ्त बिजली, पानी और टेलीफोन कनेक्शन शामिल हैं. अगर केवल वेतन, दैनिक भत्ते और अन्य प्रत्यक्ष सुविधाओं का प्रत्यक्ष आकलन किया जाए, तो एक सांसद के भत्तों व सुविधाओं का सालाना औसत खर्च न्यूनतम 30 लाख रुपये बैठता है. हालांकि, अप्रत्यक्ष और समग्र संसदीय सुविधाओं को मिला दें तो यह आंकड़ा 30 लाख से लेकर 4 करोड़ रुपये तक चला जाता है.
परिसीमन के बाद सरकार पर कितना भार?
अगर परिसीमन के बाद 273 नए सांसद जुड़ते हैं, तो वेतन और भत्तों के मद में खर्च होना तय है. यदि एक सांसद पर न्यूनतम प्रत्यक्ष वार्षिक खर्च 30 लाख रुपये भी माना जाए, तो केवल इन 273 अतिरिक्त सांसदों के वेतन और भत्तों का प्रत्यक्ष सालाना बोझ लगभग 81.9 से 85 करोड़ रुपये बढ़ जाएगा. यह वह राशि है जो सीधे तौर पर सांसदों के व्यक्तिगत खातों, कार्यालयों और भत्तों में हस्तांतरित होगी.
विकास निधि का बढ़ता दायरा
प्रत्येक सांसद को अपने संसदीय क्षेत्र में ढांचागत और सामाजिक विकास कार्य कराने के लिए सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLAD) के तहत हर साल 5 करोड़ रुपये का फंड दिया जाता है. जब संसद में 273 नए सदस्य जुड़ेंगे, तो केवल विकास निधि के रूप में सरकार को हर साल 1,365 करोड़ रुपये अतिरिक्त आवंटित करने होंगे. यह राशि सीधे तौर पर नए निर्वाचन क्षेत्रों के स्थानीय विकास कार्यों में लगाई जाएगी.
बुनियादी ढांचे और सुरक्षा की जरूरतें
सांसदों की संख्या बढ़ने का असर केवल कागजी बजट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दिल्ली में इसके लिए नया इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा. नए 273 जनप्रतिनिधियों के रहने के लिए राजधानी में लुटियंस या आसपास के क्षेत्रों में नए आवासों का निर्माण, सुरक्षा व्यवस्था और नए संसद भवन के भीतर तकनीकी इंतजामों को अपडेट करना पड़ेगा. वीआईपी सुरक्षा, अतिरिक्त स्टाफ और परिवहन सुविधाओं को जोड़ने के बाद कुल अतिरिक्त बजट 1,200 करोड़ से 2,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.
क्यों बढ़ाई जा रही सांसदों की संख्या?
सांसदों की संख्या बढ़ाने का मुख्य तर्क आबादी और जनप्रतिनिधियों के अनुपात को संतुलित करना है. वर्तमान में भारत में एक लोकसभा सांसद औसतन 25 लाख से अधिक नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है, जो दुनिया के कई विकसित लोकतंत्रों की तुलना में काफी अधिक है. परिसीमन और महिला आरक्षण से संसद में महिलाओं की 273 आरक्षित सीटें तय होंगी, जिससे नीति निर्माण में समावेशिता आएगी और जनता तक अपने प्रतिनिधियों की पहुंच आसान होगी.
