नई दिल्ली। 13 दिसंबर 2001 की सुबह भारत की संप्रभुता के प्रतीक भारतीय संसद पर जो आतंकवादी हमला हुआ उसे देश कभी भूल नहीं सकता। देश अब हर साल संसद पर हमले की बरसी पर उन वीर शहीदों को याद करता है जिन्होंने अपनी कुर्बानी देकर देश की शान लोकतंत्र के मंदिर को किसी भी तरह की खरोंच भी नहीं लगने दी। यह भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना थी जिसने न केवल देश की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी बल्कि यह भारत के स्वाभिमान पर भी चोट की। पांच आतंकवादियों ने संसद परिसर में घुसकर गोलीबारी की जिसमें नौ लोग मारे गए जिनमें सुरक्षा कर्मी और संसद के कर्मचारी शामिल थे। संसद भवन में घुसने की कोशिश कर रहे हमलावरों को मार गिराया गया लेकिन इस घटना ने भारत को गहरा झटका दिया। भारत सरकार ने हमले के लिए पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों लश्कर.ए.तैयबा और जैश ए मोहम्मद को जिम्मेदार ठहराया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए 1971 से भी बड़ी सैन्य कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी। भारत ने ऑपरेशन पराक्रम शुरू किया जिसमें लाखों सैनिकों 5 लाख से 8 लाख तक को सीमा पर तैनात किया गया। उधर पाकिस्तान ने भी करीब 3 लाख सैनिकों को सीमा पर मोबलाइज किया। इस तरह सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद दुनिया में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर दो देशों की सेनाएं आमने सामने खड़ीं थीं लेकिन पाकिस्तान की सीमा पर करीब 9 महीने तक तैनात भारतीय सेना को वापसी करनी पड़ी हालांकि कहने को भारत ने तात्कालिक रूप से कूटनीतिक बढ़त हासिल कर ली थी पाकिस्तान के तत्कालीन प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ के आतंकी गुटों पर एक्शन करने के वादे के बाद ही सेना की वापसी का फैसला लिया गया।
2001 का संसद हमला कोई अलग थलग घटना नहीं था। यह कश्मीर मुद्दे और भारत.पाकिस्तान के लंबे विवाद का हिस्सा था 1999 के कारगिल युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच तनाव पहले से ही था फिर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों ने कंधार हाईजैक को अंजाम दिया था अभी साल भर भी पूरा नहीं हुआ था कि पाकिस्तान ने एक बार फिर नापाक कोशिश की। 13 दिसंबर हमले के दिन आतंकवादी फर्जी आईडी और वाहनों से संसद में घुसे और अंधाधुंध फायरिंग की हमले में उपराष्ट्रपति कृष्णकांत का वाहन भी लक्ष्य था लेकिन सौभाग्य से कोई बड़ा नेता हताहत नहीं हुआ। इस हमले के बाद सरकार की तत्काल प्रतिक्रिया आक्रामक थी गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने संसद में भाषण देते हुए कहा कि यह हमला पाकिस्तान की साजिश है राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने पाकिस्तान से मांग की कि वह लश्कर ए तैयबा और जैश.ए.मोहम्मद के नेताओं को गिरफ्तार करे उनके कार्यालय बंद करे और उनकी संपत्ति जब्त करे जब पाकिस्तान ने इन मांगों को नजरअंदाज किया तो भारत ने 21 दिसंबर 2001 को अपने उच्चायुक्त को वापस बुला लिया। इसके बाद जनवरी 2002 तक भारत ने लगभग आठ लाख सैनिकों को सीमा और नियंत्रण रेखा पर तैनात कर दिया। यह ऑपरेशन पराक्रम का हिस्सा था जो भारत का अब तक का सबसे बड़ा सैन्य मोबिलाइजेशन था लेकिन इस मोबिलाइजेशन के पीछे युद्ध की मंशा कितनी थी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने कई बैठकें की जहां सीमा पार हमले या सीमित युद्ध की चर्चा हुई।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा ने कहा था कि कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी में सर्वसम्मति से फैसला हुआ कि आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और जरूरत पड़ी तो सीमा पार किया जाएगा। हालांकि विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने युद्ध की संभावना से इनकार किया और कहा कि फोकस संयम पर था। जनवरी 2002 के पहले सप्ताह में भारतीय सशस्त्र बलों को पाकिस्तान के साथ संभावित युद्ध के लिए तैनात कर दिया गया था युद्ध पूर्व की अंतिम तैयारियां तेजी से चल रही थी समय भी युद्ध के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जा रहा था। इस सैन्य तैयारी को ऑपरेशन पराक्रम का नाम दिया गया था भारत को सैन्य स्तर पर स्पष्ट तौर पर बढ़त हासिल थी दूसरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका में 9 11 हमले के बाद राजनीतिक स्थिति ने पाकिस्तान को असमंजस में डाल रखा था। तीस वर्षों में पहली बार भारतीय सैन्य बल इस तरह पूर्ण रूप से लामबंद हुए थे और केवल राजनीतिक ग्रीन सिग्नल की प्रतीक्षा कर रहे थे। कई रक्षा और कूटनीतिक एक्सपर्ट्स इसे ऐसा अवसर कहते हैं जब भारत अपने पारंपरिक सैन्य प्रभुत्व का उपयोग कर पाकिस्तान को आतंकवाद पर निर्णायक लगान कसने के लिए बाध्य कर सकता था। लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग सेवानिवृत्त लिखते हैं कि संसद हमले के बाद कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक हुई जिसमें तीनों सेनाध्यक्ष भी मौजूद थे पनाग का कहना है कि राजनीतिक नेतृत्व सीमित कार्रवाई सिर्फ जम्मू कश्मीर तक चाहता था। सेनाध्यक्ष का कहना था कि किसी भी संभावित परमाणु तनाव या व्यापक युद्ध की संभावना को देखते हुए पूर्ण सैन्य लामबंदी आवश्यक है। बहुत विचार विमर्श के बाद तय हुआ कि सेना को दो सप्ताह के भीतर आवश्यक तैयारी पूरी कर लेनी चाहिए युद्ध का अंतिम निर्णय सरकार बाद में लेगी।
सीसीएस में परमाणु खतरे पर विस्तार से चर्चा नहीं हुई लेकिन यह माना गया कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और परमाणु जोखिम सामने आने से पहले हमारे पास लगभग दो सप्ताह का समय है साथ ही यह भी तय किया गया कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी युद्ध के लिए पाकिस्तान से गुजर रही अमेरिकी लॉजिस्टिक्स से हमें हर हाल में दूर रहना होगा जिससे भारतीय नौसेना की कराची केंद्रित ऑपरेशनों और वायुसेना की सिंधु के पश्चिम में कार्रवाई पर स्पष्ट प्रतिबंध लग गया। पनाग लिखते हैं कि सीसीएस की बैठक में कुछ भी तय नहीं किया गया जैसे किस क्षेत्र पर कब्जा करना है। दुश्मन की सैन्य क्षमता या अर्थव्यवस्था का कितना विनाश लक्ष्य होगा या युद्ध का एंड स्टेट क्या होगा नौसेना प्रमुख एडमिरल सुशील कुमार के अनुसार उन्होंने विशेष रूप से सरकार से राजनीतिक लक्ष्य मांगे थे ताकि उससे सैन्य टारगेट निकाले जा सकें सीसीएस की मीटिंग में वायुसेना और नौसेना ने बताया था कि वे एक सप्ताह में युद्ध के लिए तैयार हो सकती हैं लेकिन थल सेना के सामने गंभीर चुनौतियां थीं रक्षा मोर्चों पर तैनात इकाइयां 72 96 घंटे में तैयार हो सकती थीं लेकिन तीन स्ट्राइक कोर जो भारत की मुख्य आक्रामक शक्ति हैं सीमा से काफ़ी पीछे तैनात थीं उन्हें पूरी तरह ऑपरेशनल होने में तीन सप्ताह चाहिए थे स्ट्राइक कोर के आंशिक रूप से पहुंचने पर युद्ध शुरू करना अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि इससे असमंजस में पड़ने की आशंका थी अतः युद्ध शुरू होने की सबसे जल्दी संभावित तारीख तीन सप्ताह बाद ही हो सकती थी एक सेना कमांडर ने कहा कि उन्हें युद्ध हेतु अतिरिक्त प्रशिक्षण का समय चाहिए। उन्होंने फील्ड मार्शल मानेकशॉ 1971 का उदाहरण दिया कि कैसे उस समय मानेक शॉ ने अपनी बात रखी थी जाहिर है कि यह तत्कालीन सेनाध्यक्ष के लिए दुविधा का विषय बन गया। क्या परमाणु युद्ध का खतरा था 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद दोनों देश परमाणु शक्ति बन चुके थे।
स्टैंड ऑफ के दौरान पाकिस्तान ने परमाणु धमकी दी जिसने भारत को सतर्क किया। तो क्या परमाणु युद्ध की छाया ने जंग को रोका। किताब में 2001.2002 क्राइसिस का न्यूक्लियर युद्ध की छाया के तहत एनालिसिस किया गया है जहां दोनों पक्ष जानते थे कि एस्केलेशन परमाणु स्तर तक पहुंच सकता है वीके सूद की किताब में उल्लेख है कि युद्ध सीमित रह सकता है लेकिन परमाणु खतरा 50 प्रतिशत से ज्यादा था सूद लिखते हैं कि हमने मोबिलाइजेशन किया ताकि पाकिस्तान डरे लेकिन जब कालुचक के बाद भी हमने हमला नहीं किया तो स्पष्ट था कि परमाणु जोखिम हमें रोक रहा है हालांकि बहुत से लोगों का मानना है कि उस समय परमाणु हथियारों की डिलीवरी क्षमता काफी प्रारंभिक अवस्था में थी सामरिक टैक्टिकल परमाणु हथियार विकसित नहीं हुए थे परमाणु सीमा रेखा न्यूक्लियर थ्रेशहोल्ड अस्पष्ट थी इसलिए परमाणु युद्ध का खतरा नहीं था इसके साथ ही बढ़ते तनाव के बावजूद भारत और पाकिस्तान ने परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमले की मनाही वाली संधि के तहत अपने.अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची का आदान प्रदान कर रहे थे शायद एक कारण यह भी था कि उस समय किसी भी किसी तरह के परमाणु युद्ध की संभावना नहीं लग रही थी पाकिस्तान भी जानता था कि परमाणु हथियार का उपयोग उसके अपने अस्तित्व को समाप्त कर देगा 16 अक्टूबर तक यानि कि कुल नौ महीनों तक सेना को कभी आगे बढ़ने का आदेश नहीं दिया गया इस लामबंदी की लागत लगभग 2 बिलियन डॉलर और 800 सैनिकों की दुर्घटनावश मौत के रूप में सामने आई द टेलीग्राफ में 30 मई 2003 को छपी एक खबर की मानें तो ऑपरेशन पराक्रम के दौरान बिना युद्ध लड़े ही 1874 सैनिकों को हमने खो दिया था टेलिग्राफ इस लेख में लिखता है कि संसद में दिए गए एक जवाब में सैन्य तैनाती रद्द किए जाने के छह महीने बाद यह खुलासा हुआ कि 300 दिनों से कुछ अधिक समय तक चले सैन्य अभ्यास में 1ए847 लोग हताहत हुए थे जो 1999 के कारगिल युद्ध में हताहतों की संख्या 600 से कहीं बहुत अधिक थे।
दिसंबर का महीना धूप से भरा और गर्म था। नई दिल्ली में हमेशा की तरह चहल.पहल रहती थी अचानक सुबह लगभग 11.30 बजे एक जोरदार धमाका हुआ और गोलियों की आवाज सुनाई दी। नई दिल्ली के उच्च सुरक्षा क्षेत्र में आमतौर पर ऐसी आवाजें नहीं सुनाई देतींए इसलिए मैं तुरंत बाहर भागा और सड़क पर चल रहे लोगों से इस शोर के बारे में पूछा। बाहर सड़क पर अफरा.तफरी मची हुई थी। एक राहगीर ने बताया कि संसद भवन में गोलीबारी हो रही है। मैं जहां था वहां से मुश्किल से एक किलोमीटर दूर था तभी मैंने देखा कि जैतून के रंग की वर्दी पहने हुए सैनिकों का एक बड़ा दल लुटियंस भवन को घेरे हुए है।एक बंदूकधारी पुलिसकर्मी ने मुझे बताया कि यह एक आतंकवादी हमला था। भारत की संसद घेराबंदी में थी। यह भयावह था।आर एंड एडब्ल्यूएस के पूर्व प्रमुख ए एस दुलत ने बाद में अपनी पुस्तक कश्मीर.वाजपेयी वर्ष में लिखा कि कैसे प्रधानमंत्री कार्यालय का एक सुरक्षा गार्ड उनके कमरे में आया और उन्हें बताया कि संसद में गोलीबारी हो रही है। दुलत ने इस बात पर विश्वास न करते हुए उसे फटकारा और दोबारा जांच करने का आदेश दिया।
दरअसल 13 दिसंबर 2001 का दिन भारतीयों के लिए कभी भुलाया नहीं जा सकता। सुबह करीब 11 बजे का समय था जब लाल बत्ती वाली और गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए स्टिकर विंडस्क्रीन पर चिपके हुए एक सफेद एम्बेसडर कार ने संसद स्ट्रीट और टॉकटोरा रोड के चौराहे पर बने गेट से सुरक्षा घेरा पार किया।सीआरपीएफ की ब्रावो कंपनी की महिला कांस्टेबल कमलेश कुमारी महत्वपूर्ण गेट नंबर 11 पर तैनात थीं। उन्होंने कार को आगे जाने का इशारा किया लेकिन अंदर पांच लोगों को बैठे देखकर उनका मन बदल गया। संदेह होने पर वह कार को रोकने के लिए अगले गेट की ओर दौड़ीं।अंदर बैठे लोगों ने कलाश्निकोव राइफल से अंधाधुंध गोलियां बरसाईं जिनमें कुमारी को सोलह गोलियां लगीं और उनकी मौत हो गई। लेकिन उनके पास एकमात्र हथियार एक वायरलेस सेट था जिसका इस्तेमाल उन्होंने मरने से पहले उस दुर्भाग्यपूर्ण कार के बारे में सूचना देने के लिए किया। उस समयए संसद का निचला सदन स्थगित हो गया था और सांसद संसद भवन के अंदर परिसर में इधर.उधर फैले हुए थे। चूंकि शीतकालीन सत्र चल रहा था इसलिए कर्मचारी सुरक्षाकर्मी मार्शल खानपान कर्मी मीडियाकर्मी ड्राइवर क्लर्क और राजनेता उस चमकीले सर्द दिन में व्यस्त थे। इसी बीच प्रांगण में गोलीबारी शुरू हो गई जिसमें चार भारतीय सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। गोलीबारी में चारों आतंकवादी मारे गए और एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को बचा लिया। खेल तीस मिनट में समाप्त हो गया।
महज दो दिनों में एसीपी राजबीर सिंह के नेतृत्व में दिल्ली क्राइम ब्रांच ने जांच में बड़ी सफलता हासिल की। उन्होंने हाल ही में हुए हमले के स्थल से मिले मोबाइल नंबर 98100.81228 का पता लगाया जो दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज के प्रोफेसर एसएआर गिलानी का था। गिलानी को मुखर्जी नगर स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया गया।इसी बीच अफजल गुरु और शौकत हुसैन को कश्मीर के श्रीनगर जाते समय गिरफ्तार कर लिया गया।जांच में पता चला कि गिलानी के फोन से जम्मू.कश्मीर में कई कॉल किए गए थे। पूछताछ के दौरान गिलानी ने कबूल किया कि फोन उसके दोस्त अफजल गुरु का था जो शौकत हुसैन के साथ था। हुसैन के घर पर छापा मारने के बाद पुलिस ने अगले दिन गुरु और हुसैन को श्रीनगर जाते समय गिरफ्तार कर लिया।तीनों आरोपियों पर अब निरस्त हो चुके आतंकवाद निवारण अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे। पुलिस का दावा था कि गुरु और हुसैन मुख्य साजिशकर्ता गाजी बाबा को महत्वपूर्ण जानकारी से भरा लैपटॉप पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे। इसके अलावा 10 लाख रुपये और सिम कार्ड जब्त किए गए जिससे दोनों की साजिश में संलिप्तता साबित होती है।सीमित सबूतों के बावजूद जिनमें मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यए फोरेंसिक निष्कर्ष और पुलिस पूछताछ शामिल थी मामला मुकदमे तक पहुंचा। गिलानी को बरी कर दिया गया लेकिन शौकत को 10 साल की सजा सुनाई गई और अफजल गुरु को मौत की सजा दी गई। गुरु एक विवादास्पद व्यक्ति बन गए कश्मीर में कुछ लोगों द्वारा उन्हें नायक के रूप में सराहा गया हालांकि प्रतिबंधित संगठन से उनके संबंध को साबित करने वाले प्रत्यक्ष सबूतों का अभाव था।
