ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई की मौत हो गई है. उनके साथ परिवार के चार और सदस्यों की भी जान गई है. ईरानी मीडिया ने भी इस खबर को कंफर्म किया है. प्रेस टीवी ने बताया कि ख़ामेनेई अब नहीं रहे. उनकी मौत के बाद 40 दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा भी की गई है. मिडिल ईस्ट में तनाव की स्थिति बनी हुई है. इजरायल और अमेरिका के हमले के जवाब में ईरान ने कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. इस बीच रविवार (1 मार्च 2026) को ख़ामेनेई समेत उनकी बेटी, दामाद और पोती की मौत हो गई है.
हमला: अमेरिका-इस्राइल ने शनिवार सुबह ईरान पर हमला कर दिया। ओमान की मध्यस्थता में बातचीत विफल रहने के बाद यह हमला हुआ।
सटीक खुफिया जानकारी: सीआईए महीनों से खामेनेई की गतिविधियों और उनके पैटर्न पर नजर रख रही थी।
अचानक बदला प्लान: हमला पहले रात के अंधेरे में होना था, लेकिन शनिवार सुबह की सीक्रेट मीटिंग की खबर मिलते ही समय बदल दिया गया।
निशाने पर कौन थे: खामेनेई के साथ IRGC के चीफ, रक्षा मंत्री और सैन्य परिषद के प्रमुख भी मुख्य टारगेट थे।
हमले की तीव्रता: इस्राइली लड़ाकू विमानों ने खामेनेई के निवास वाले परिसर पर लगभग 30 बम गिराए।
अंत: 86 वर्षीय अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए। वे धर्मगुरु थे, जो 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता के पद पर काबिज थे।
CIA की इस पूरे ऑपरेशन में क्या भूमिका
सीआईए यानी अमेरिका की केंद्रीय खुफिया एजेंसी ने इस ऑपरेशन में सबसे अहम भूमिका निभाई। एजेंसी कई महीनों से अयातुल्लाह खामेनेई की गतिविधियों पर नजर रख रही थी। इस दौरान उसने खामेनेई के ठिकानों और उनकी दिनचर्या के पैटर्न को समझने में धीरे-धीरे महारत हासिल कर ली। सीआईए को पता चला कि शनिवार की सुबह तेहरान के एक प्रमुख सरकारी परिसर में ईरान के शीर्ष अधिकारियों की बैठक होने वाली है। सबसे महत्वपूर्ण जानकारी यह थी कि खामेनेई खुद भी इस बैठक में मौजूद रहने वाले थे। इस इनपुट को तुरंत इस्राइल के साथ साझा किया गया। सीआईए की नजर में यह जानकारी ‘हाई फिडेलिटी’ (पूरी तरह सटीक) थी।मूल योजना के अनुसार, अमेरिका और इस्राइल रात के अंधेरे में हमला करने वाले थे, लेकिन जैसे ही सीआईए को उस बड़ी बैठक की सूचना मिली, दोनों देशों ने समय बदलने का फैसला किया। ईरान के राष्ट्रपति कार्यालय, सर्वोच्च नेता के दफ्तर और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, तीनों एक ही परिसर में हैं। यहां शीर्ष नेतृत्व एक साथ मौजूद था। इसलिए हमले की टाइमिंग बदलकर शनिवार सुबह कर दी गई, ताकि एक ही झटके में सबसे बड़ी कामयाबी हासिल की जा सके।
हमला कैसे और कब हुआ
द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, इस्राइल में सुबह करीब 6 बजे लड़ाकू विमान अपने ठिकानों से उड़े। हमले में विमानों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी, लेकिन वे लंबी दूरी की और अत्यंत सटीक मिसाइलों से लैस थे। विमानों के उड़ान भरने के ठीक दो घंटे पांच मिनट बाद तेहरान के समयानुसार सुबह करीब 9 बजकर 40 मिनट पर मिसाइलें उस बेहद सुरक्षित सरकारी परिसर पर जा गिरीं। इस्राइली रक्षा अधिकारी ने बाद में बताया कि ईरान ने युद्ध की तैयारी कर रखी थी। इसके बावजूद इस्राइल इस हमले में ‘टैक्टिकल सरप्राइज’ हासिल करने में कामयाब रहा।
क्या खामेनेई उसी इमारत में थे, जहां बाकी अधिकारी
उस परिसर की एक इमारत में ईरान के शीर्ष राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी बैठे थे, जबकि खामेनेई उसी परिसर की एक अलग लेकिन पास की इमारत में थे। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, खामेनेई के ठिकाने की पहचान होते ही इस्राइली लड़ाकू विमानों ने उस परिसर पर 30 बम गिराए।
ईरान के सैन्य और खुफिया तंत्र को कितना नुकसान हुआ
ऑपरेशन के बारे में जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, ईरान की खुफिया एजेंसियों का वरिष्ठ नेतृत्व बड़े पैमाने पर तबाह हो गया। हालांकि, ईरान का शीर्ष खुफिया अधिकारी बच निकलने में कामयाब रहा। शुरुआती हमले के बाद और भी स्थानों पर हमले किए गए, जहां ईरान के खुफिया अधिकारी ठहरे हुए थे। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी IRNA ने रविवार को एडमिरल शमखानी और मेजर जनरल पाकपूर की मौत की पुष्टि की। ये वही दो नाम थे, जिनके मारे जाने का इस्राइल ने दावा किया था।
अमेरिका के पास खामेनेई की इतनी सटीक जानकारी कहां से आई
इसकी जड़ें पिछले साल के 12 दिनों के युद्ध में हैं। उस दौरान अमेरिका ने यह समझा कि दबाव की स्थिति में खामेनेई और IRGC किस तरह संवाद साधते हैं और कैसे आवाजाही करते हैं। इसका उपयोग करके अमेरिका ने खामेनेई की गतिविधियों की निगरानी और उनके अगले कदम का अनुमान लगाने की क्षमता को और धारदार बनाया। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी के हवाले से बताया कि जून में भी इसी नेटवर्क के आधार पर राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया था कि अमेरिका जानता है खामेनेई कहां छुपे हैं। तब से यह जानकारी और भी पुख्ता होती गई।
ईरान की सबसे बड़ी चूक क्या रही
इस पूरे ऑपरेशन ने एक बात उजागर कर दी कि ईरान के शीर्ष नेताओं ने खुद को बचाने के लिए पर्याप्त सावधानी नहीं बरती, जबकि इस्राइल और अमेरिका दोनों ने पहले से स्पष्ट संकेत दे दिए थे कि वे युद्ध की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे नाजुक दौर में इतने वरिष्ठ अधिकारियों का एक ही जगह इकट्ठा होना और खामेनेई का उसी परिसर में मौजूद रहना एक घातक रणनीतिक भूल साबित हुई।अमेरिकी सूत्र के हवाले से बताया कि मूल योजना यह थी कि खामेनेई शनिवार की शाम तेहरान में यह बैठक करेंगे, लेकिन इस्राइली खुफिया एजेंसी मोसाद ने भी भांप लिया कि बैठक का वक्त बदलकर शनिवार सुबह कर दिया गया है। यही एक सूचना काफी थी। हमले की पूरी टाइमिंग आगे खिसका दी गई और तेहरान को उस बदलाव की भनक तक नहीं लगी। खामेनेई ने शायद सोचा था कि वक्त बदलने से वे महफूज रहेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि 86 वर्षीय आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई एक सैन्य ऑपरेशन में मारे गए हैं. ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा कि ख़ामेनेई इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक थे. उन्होंने उनकी मौत को न्याय बताया. इसके साथ ही ट्रंप ने यह भी कहा कि बमबारी पूरे सप्ताह बिना रुके जारी रहेगी या जब तक मध्य-पूर्व और दुनिया में शांति स्थापित नहीं हो जाती. ट्रंप के इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में तेजी से खबरें फैलने लगीं और हालात को लेकर अटकलें बढ़ गईं.
खामेनेई ने मौत से पहले दी थी आखिरी स्पीच
अयातुल्ला अली खामेनेई ने अपने आखिरी भाषण में ईरान के लोगों को खास संदेश दिया था। खामेनेई ने कहा था, ‘ईरानी देश ने अपने इस्लामी और शिया सबक अच्छी तरह सीख लिए हैं, उन्हें पता है कि क्या करना है।खामेनेई ने आगे कहा था, ‘इमाम हुसैन ने ऐलान किया था कि मेरे जैसा कोई भी यजीद किसी के आगे कभी नहीं झुकेगा।’खामेनेई ने अमेरिका पर हमला करते हुए कहा था, ‘असल में, ईरान के लोग कह रहे हैं, हमारे जैसा देश, इसका कल्चर, इसका इतिहास और इन ऊंची शिक्षाओं के साथ कभी भी उन भ्रष्ट लोगों जैसे नेताओं के आगे झुकेगा जो आज यूनाइटेड स्टेट्स में सत्ता में हैं।’
कौन थे खामेनेई
1989 में जब इस्लामी क्रांति के सूत्रधार अयातुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी का निधन हुआ, तब खामेनेई ने ईरान की बागडोर संभाली। खुमैनी ने पहलवी राजशाही को उखाड़ फेंकने की नींव रखी थी, लेकिन उस क्रांति को एक फौलादी सैन्य और अर्धसैनिक ढांचे में तब्दील करने का काम खामेनेई ने किया। उन्होंने एक ऐसा तंत्र बनाया, जो ईरान की रक्षा भी करता था और उसकी सीमाओं से परे उसका दबदबा भी कायम रखता था। सर्वोच्च नेता बनने से पहले खामेनेई 1980 के दशक में इराक के साथ हुए खूनी युद्ध के दौरान ईरान के राष्ट्रपति थे। उस थका देने वाले संघर्ष में जब पश्चिमी देश सद्दाम हुसैन का साथ दे रहे थे, तो ईरान खुद को अकेला और घिरा हुआ महसूस कर रहा था। इसी दौर ने खामेनेई के मन में खासतौर पर अमेरिका के प्रति गहरा अविश्वास भर दिया।
1981 में क्या हुआ था
यह पहली बार नहीं था जब खामेनेई किसी हमले का निशाना बने। 1981 में तेहरान की एक मस्जिद में एक बड़े हमले में वे बाल-बाल बचे थे। उस वक्त वे सर्वोच्च नेता नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली धर्मगुरु थे जो भाषण दे रहे थे। हमलावर ने एक टेप रिकॉर्डर के अंदर बम छुपाकर उसे उस पोडियम के पास रख दिया था, जहां खामेनेई बोलने वाले थे। जैसे ही उन्होंने अपना संबोधन शुरू किया, कुछ ही पलों में वह फट गया।
