काठमांडू: नेपाल की सियासत इतिहास की सबसे बड़ी करवट ले रही है. नेपाल में पहली बार ऐसा हो रहा है जब कोई नई नवेली पार्टी सरकार बनाने जा रही है और ये साफ हो गया है कि अब नेपाल में बालेन शाह के राज का जोरदार आगाज होने जा रहा है. नेपाल वो देश जहां दशकों से वही पुराने चेहरे, वही पुरानी पार्टियां सत्ता के शिखर पर काबिज थीं… लेकिन इस साल एक ऐसा मोड़ सामने आया जिसने पूरे नेपाल की सियासत की दिशा और दशा बदलकर रख दी है… एक सिंगर… इंजीनियर और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेंद्र शाह, जिनको पूरा नेपाल ‘बालेन’ कहकर पुकारता है… उन्होंने नेपाल की सियासत में धमाकेदार डेब्यू करते हुए राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को लैंडस्लाइड जीत की ओर ले गया. 35 वर्षीय बालेंद्र शाह के नेतृत्व में आरएसपी लगभग पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है। जेन-जी युवा आंदोलन से प्रेरित यह बदलाव पारंपरिक दलों के वर्चस्व, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता के अंत का संकेत है, जो एक स्थिर और नए नेपाल के निर्माण का जनादेश देता है।
नेपाल में पहली बार Gen-Z सरकार
रैपर से नेता बने बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी लैंडस्लाइड जीत मिली है… Gen-Z के फेवरेट बालेन शाह की सुनामी के आगे केपी शर्मा ओली की पार्टी CPN (UML) और पुष्प कमल दहल प्रचंड की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी टिक नहीं सकी. बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के जीते हुए सांसदों में उत्साह है. उन्होंने साफ किया है कि बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. काठमांडू से जीत हासिल करने के बाद बालेन शाह की पार्टी RSP के गणेश प्रजुली ने NDTV से खास बातचीत में कहा है कि नेपाल ने इतिहास रच दिया है. महज 35 साल के बालेन शाह ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई नागपुर से पूरी की. और वो पढ़ाई के साथ साथ अपनी अलग पहचान रैपर के तौर पर बनाने में कामयाब रहे. बालेन शाह मई 2022 में जब पहली बार नेपाल की राजधानी काठमांडू के मेयर बने तो ये पूरे नेपाल के लिए चौंकाने वाला नतीजा था. बालेन शाह लोकप्रिय रैपर थे और जब उन्होंने काठमांडू के मेयर चुनाव में ख़ुद को उतारा तभी से उनका नाम चर्चा में आ गया. बालेन बचपन से संगीत प्रेमी थे और नेपाली टोपियों के शौकीन. इनकी पहचान स्ट्रक्चरल इंजीनियर, रैपर, एक्टर, म्यूजिक प्रॉड्यूसर, गीतकार और एक कवि की रही है.
Gen-Z मतदाताओं का भारी समर्थन बालेन शाह की जीत का सबसे बड़ा आधार बना
नेपाल की सियासत को करीब से जानने वाले विश्लेषकों का कहना है कि युवाओं और Gen-Z मतदाताओं का भारी समर्थन बालेन शाह की जीत का सबसे बड़ा आधार बना . जिसने दशकों से सत्ता में रहे पारंपरिक दलों की पकड़ को कमजोर कर दिया है. हालांकि ये नतीजे पहले ही तय हो चुके थे, क्योंकि जिस अंदाज में बालेन शाह ने चुनाव प्रचार में तमाम दिग्गज नेताओं के खिलाफ हुंकार भरी थी, उससे ये साफ हो गया था कि अब नेपाल में बालेन की सुनामी आने वाली है. उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में ये भी साफ कर दिया था कि नेपाल की जनता अब परिवर्तन के लिए तैयार है और बालेन खुद नेपाल की सत्ता को संभालने के लिए भी तैयार हैं. बालेन शाह खुद नेपाल की सड़कों पर उतरे और अपने चुनाव चिन्ह घंटी के साथ प्रचार में ताल ठोकते नजर आए.इस चुनावी सुनामी के पीछे दो प्रमुख कारण दिखते हैं। पहला, नए नेपाल की परिकल्पना का मूल आधार एक ऐसे राष्ट्र की स्थापना था, जो भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से मुक्त हो। इस यात्रा की औपचारिक शुरुआत वर्ष 2008 में राजशाही के अंत और लोकतंत्र की स्थापना के साथ हुई। माना गया था कि सैकड़ों वर्षों के राजतंत्र, जिसमें सत्ता दरबार के वफादारों तक सीमित थी और जनता का एक बड़ा वर्ग हाशिये पर था, उसका अंत लोकतांत्रिक व्यवस्था से होगा।
विडंबना यह रही कि 2008 के बाद जो भी राजनीतिक दल उभरे, उनकी कार्यशैली और जड़ें पुरानी व्यवस्था से ही प्रभावित थीं। यद्यपि माओवादी दलों पर भी सत्ता की लोलुपता हावी रही। परिणामस्वरूप लोकतंत्र आने के बावजूद आम जनता को कोई वास्तविक राहत नहीं मिल सकी। नेपाल के पिछले 18 वर्षों के लोकतांत्रिक यात्रा में चार आम चुनावों के दौरान देश ने एक दर्जन से अधिक प्रधानमंत्री और दर्जनों उप-प्रधानमंत्री बदलते देखे हैं।राजनीतिक उठापटक के कारण कोई भी सरकार अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। इस अनिश्चितता के बीच जनता ने आरएसपी को पूर्ण बहुमत देकर न केवल राजनीतिक अस्थिरता को समाप्त किया है, बल्कि गठबंधन की मजबूरियों वाली राजनीति का भी अंत कर दिया है। चूंकि आरएसपी का कोई विवादास्पद पुराना इतिहास नहीं था, इसलिए जनता ने बालेन शाह के नेतृत्व पर अटूट भरोसा जताया।आरएसपी की जीत का श्रेय नेपाल के युवाओं को भी जाता है, जिन्होंने बालेन शाह को एक नए नेपाल के उद्भव का महत्वपूर्ण कारक माना। बालेन पेशे से इंजीनियर रहे हैं और बाद में रैप संगीत की दुनिया में उतरे। अपने संगीत के माध्यम से उन्होंने ऐसे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को उठाया, जिनसे न केवल युवा, बल्कि आम जनता भी जुड़ पाई। यही कारण था कि जब उन्होंने 2022 में काठमांडू के मेयर का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा तो उन्हें भारी जीत मिली। देश को बालेन के रूप में एक नया नेता तो मिल गया था, लेकिन किसी राजनीतिक दल के समर्थन के बिना राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष तक पहुंचना आसान नहीं था।
पुराने दलों को कमजोर किए बिना यह संभव भी नहीं था और यही काम जेन जी आंदोलन ने किया। हालांकि युवाओं ने बालेन को अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने का न्योता दिया था, लेकिन उसकी अवधि केवल छह महीने की थी, जबकि बालेन का सपना पांच वर्षों और उससे आगे की राजनीति का था। ऐसे में उन्होंने अंतरिम नेतृत्व स्वीकार करने के बजाय चुनावी रास्ता चुना और उसमें विजयी हुए। आरएसपी पत्रकार से राजनेता बने रबी लामिछाने के नेतृत्व में तेजी से आगे बढ़ी, जो अपने पहले ही चुनाव में 2022 में 20 सीटों के साथ एक वैकल्पिक राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरी थी। आरएसपी के पास युवाओं की मजबूत अपील है, लेकिन बालेन जैसे लोकप्रिय नेता के जुड़ जाने से पार्टी को और अधिक मजबूती मिली और अब उसके परिणाम भी सामने हैं।अब जब आरएसपी के पास जनमत है और बालेन शाह जैसे लोकप्रिय युवा नेता तो सवाल उठता है कि क्या वे देश चलाने में मजबूत साबित होंगे? क्योंकि लोकप्रिय होना एक बात है, लेकिन देश के विकास और हितों को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण करना, मजबूत विदेश नीति बनाना और सत्ता की शक्ति से परे देश का शांतिपूर्ण संचालन करना बिल्कुल अलग बात है। बालेन शाह लोकप्रिय नेता हैं। काठमांडू के मेयर के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान उन पर कई बार नियमों की अनदेखी के आरोप भी लगते रहे हैं। ऐसे में यदि प्रधानमंत्री के पद पर भी उनकी कार्यशैली वैसी ही रही तो इससे देश में नीतिगत स्थिरता प्रभावित हो सकती है और जनता की शिकायतों का कारण भी बन सकती है। आने वाले सौ दिनों में सरकार की कार्यप्रणाली काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी। हालांकि संभावनाओं और आशंकाओं से परे नेपाली जनादेश प्रशंसनीय है। अपने मताधिकार का प्रयोग कर जनता ने लोकतंत्र को नया आयाम दिया है। लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन की खींचतान की समाप्ति के संकेत दिए हैं। देश में समय-समय पर उठने वाले राजशाही की वापसी जैसे मुद्दों को भी यह जनादेश काफी हद तक विराम देता दिखाई देता है। नेपाल के इतिहास में 36 सालों के बाद किसी एक पार्टी को न सिर्फ पूर्ण बहुमत बल्कि प्रचंड बहुमत मिल चुका है. नेपाली अवाम को राजनीतिक स्थायित्व की उम्मीद है और बालेन शाह से युवाओं समेत पूरी जनता को भरपूर अपेक्षा भी है.
नेपाल में यूं हुआ चुनाव
नेपाल में 2 तरीकों से सांसदों का चुनाव होता है. पहला है सीधा चुनाव. इसमें संसद की 275 में से 165 सीटों पर सीधे चुनाव होता है. हर इलाके में लोग अपने उम्मीदवार को वोट देते हैं. जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वही जीतता है. दूसरा है वोट % के आधार पर सीटें. बाकी बची 110 सीटें पार्टियों को मिले कुल वोट प्रतिशत के आधार पर मिलती हैं. इसमें वोटर किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि किसी पार्टी को वोट देती है. पूरे देश में पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी हिसाब से उन्हें संसद में सीटें मिलती हैं. इन दोनों ही सिस्टम में बालेन शाह की सुनामी चली. बालेन शाह के पास भले ही जनता का भरपूर समर्थन है…लेकिन उनके सामने चुनौतियों का भी अंबार लगा है लेकिन जिस अंदाज में उन्हें बंपर वोट मिले हैं. उससे तो ये साफ हो गया है कि नेपाल की जनता का भरोसा जीतने में बालेन शाह कामयाब हो चुके हैं, लिहाजा अब उन्हें युवाओं की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा.
