बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली में 26 सितंबर 2025 को हुए बवाल के मामले में इत्तेहाद ए मिल्लत कौंसिल प्रमुख मौलाना तौकीर रजा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। बरेली पुलिस ने संवाददाता सम्मेलन में बताया कि जुमे की नमाज के बाद पुलिस फोर्स के साथ धक्का मुक्की करने की कोशिश की गई। इस मामले में दस एफआईआर दर्ज की गई और मौलाना तौकीर रजा सहित 23 लोग गिरफ्तार किए गए और मौलाना तौकीर रजा को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा दिया गया। इसके साथ ही पुलिस ने 50 लोगों को हिरासत में लिया। ज्यादातर वो लोग हैं जो मस्जिद के आसपास के इलाकों में रहने वाले युवा हैं। जो तौकीर रजा की वीडियो देखने के बाद जगह जगह इकट्ठा हुए थे। पुलिस ने बताया कि कई दिनों से इसकी साजिश चल रही थी और इस साजिश में बाहरी लोग भी शामिल हो गए। पुलिस ने इस मामले में दस एफआईआर दर्ज की गई जिसमें से सात में मौलाना तौकीर रजा का नाम दर्ज किया गया। बरेली में यह पूरा विवाद आई लव मोहम्मद के पोस्टर को लेकर शुरू हुआ। उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में जुम्मे की नमाज के बाद हुई हिंसा को लेकर पुलिस लगातार जांच में जुटी हुई। लगातार चौकाने वाले खुलासे हो रहे हैं।शहर में अचानक भड़की हिंसा किसी सामान्य वजह से नहीं हुई, बल्कि यह सोची-समझी साजिश का नतीजा थी। पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि इत्तेहाद-ए-मिल्लत कौंसिल (आईएमसी) के पूर्व जिलाध्यक्ष नदीम खां ने इस पूरे घटनाक्रम को रचा। नदीम ने 55 चुनिंदा लोगों को वॉट्सऐप कॉल की थी और इन्हीं के जरिये 1600 लोगों की भीड़ इकट्ठा की गई।पुलिस की पूछताछ में बड़ा खुलासा हुआ है कि हिंसा की साजिश सीएए-एनआरसी विरोध प्रदर्शनों की तर्ज पर रची गई थी। उस दौरान जैसे नाबालिगों को आगे किया गया था, ठीक वैसे ही इस बार भी नाबालिगों को भीड़ का चेहरा बनाने का प्लान था। यही लोग पहले खलील स्कूल तिराहे और फिर श्यामगंज में माहौल बिगाड़ने में सक्रिय दिखे।
मसलन बरेली में उपद्रवियों ने पेट्रोल बम से शहर को जलाने की साजिश रची जिसे पुलिस ने नाकाम कर दिया। मौलाना द्वारा भड़काऊ बयान देकर भीड़ को इकट्ठा किया गया था जिनके हाथों में हथियार और पेट्रोल बम थे। पुलिस ने समय रहते कार्रवाई करते हुए उपद्रवियों को काबू में किया और घटनास्थल से पेट्रोल बम बरामद किए। 2010 के दंगे की तरह मौलाना ने इस बार फिर से शहर को जलवाने की तैयारी कर ली थी। भड़काऊ बयान देकर प्रदर्शन के नाम पर भीड़ को एकत्र करना और उनके हाथों में पत्थरए हथियारए चाकूए लाठी डंडे और पेट्रोल बम इस बात का सबूत थे। पुलिस ने सही समय पर मोर्चा न संभाला होता तो शहर 15 साल पहले हुए दंगे की तरह से सुलग रहा होता। पुलिस को इस बात का अंदाजा बिल्कुल भी नहीं था कि उन्हें प्रदर्शन नहीं करने का पत्र देकर सिर्फ गुमराह किया जा रहा था।हकीकत में तो मौलाना की इस पत्र के पीछे भी एक बड़ी साजिश थी। एक पल को जब पुलिस को पत्र मिला तो कुछ चैन की सांस ली थीए लेकिन अगले ही दिन मौलाना के वीडियो ने सब बदल दिया। 80 प्रतिशत नमाज पूरी होने के बाद एक साथ ही आई भीड़ ने पुलिस पर जब हमला किया तो पुलिस भी दंग रह गई। एसएसपी ने सभी प्वाइंट्स पर पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई थी। इसलिए उपद्रवियों को मौके पर ही कंट्रोल कर लिया गया था। मौलाना के मंसूबों का पता तब चला जब पुलिस ने घटना स्थल से पेट्रोल बमए कारतूस और तमंचा बरामद किया। पुलिस ने जब इस कड़ी में और चीजें तलाशना शुरू की तो साजिश के कई अहम सबूत पुलिस के हाथ लगे। इस पूरे उपद्रव को इंटरनेट मीडिया के माध्यम से कंट्रोल किया जा रहा था। आइएमसी के ही कई पदाधिकारियों नदीम, अनीस समेत कई लोगों की भूमिका सामने आ गई। इसके बाद पुलिस ने सभी के विरुद्ध प्राथमिकी लिखी। पुलिस ने जब लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की और उनके फोन आदि खंगाले तो स्पष्ट हो गया। पुलिस को नदीम के फोन से उस वक्त के कई संदिग्ध काल मिले जब शहर में उपद्रव हो रहा था। इससे यह स्पष्ट हो गया कि उपद्रवियों को इंटरनेट मीडिया के माध्यम से कंट्रोल किया जा रहा था।
मौलाना तौकीर रजा इस उपद्रव के लिए पिछले सात दिनों से साजिश रच रहे थे। अंदरखाने इसकी तैयारी की जा रही थी अभी तक जो भी घटनाक्रम थेए वह उस पूरी प्लानिंग का एक हिस्सा थे। जिसे समझने में पुलिस से चूक हुई।पुलिस के मुताबिकए उपद्रवियों की भीड़ नारेबाजी करते हुए कह रही थी कि आज मुसलमानों की ताकत दिखानी है। किसी तरह से पुलिस ने अपनी जान पर खेलकर उपद्रवियों को खदेड़ा तो उन्होंने पुलिस से ही लूट शुरू कर दी। पुलिस ने उन्हें पकड़ने का प्रयास किया मगर वह दीवार को गिराने का प्रयास करते हुए फरार हो गए।इस तरह का माहौल देखकर आस.पास के लोगों में भी भगदड़ मच गई। उन्होंने भी अपनी दुकानें बंद करना शुरू कर दिया। आरोप है कि भीड़ में शामिल आरोपित नदीम ने भीड़ को उकसाना शुरू कर दिया। सिर तन से जुदा के नारे लगने लगे। किसी तरह से पुलिस ने हालात पर काबू पाया। जिसमें पुलिसकर्मियों के अलावा भी कई अन्य लोग घायल हुए। असल में तो बरेली हिंसा पर एसएसपी अनुराग आर्या ने खुलासा किया है कि सप्ताह भर से इस हिंसा की साजिश चल रही थी। चाकू, तमंचे, ब्लेड और पेट्रोल की बोतलें बरामद की गई। बरेली हिंसा पर डीएम अविनाश सिंह ने बताया कि हमें उनकी योजना के बारे में पता चला, हमने उन्हें बताया कि शहर में बीएनएसएस धारा 163 लागू कर दी गई है और बिना अनुमति के कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाना चाहिए।
इस संदर्भ में प्रशासन और मौलाना तौकीर रजा,नदीम आदि के साथ कैंप कार्यालय विस्तृत चर्चा की और उन्हें बताया कि बीएनएसएस धारा 163 लागू है और बिना अनुमति के कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाना चाहिए लेकिन इसके बाद मौलाना तौकीर रजा खान ने एक वीडियो संदेश जारी किया जिसमें कहा गया था कि साइन किया कागज और बाकी सब कुछ फर्जी है और वे अपनी शुरुआती योजना के अनुसार ही आगे बढ़ेंगे। जैसे ही जुमे की नमाज़ समाप्त हुई अस्सी नब्बे प्रतिशत लोग अपने घरों को लौट गए क्योंकि हमने पहले ही एक फ्लैग मार्च निकाला था और यह संदेश देने की कोशिश की थी कि बीएनएसएस की धारा 163 लागू है। कुछ लोग नमाज के बाद वहीं रुक गए और इकट्ठा होकर इस्लामिया इंटर कॉलेज की ओर जाने की कोशिश की जब उन्होंने कानून अपने हाथ में लेने और शांति भंग करने की कोशिश की तो पुलिस ने बल प्रयोग किया। पुलिस ने बताया है कि प्रदर्शन के दौरान भीड़ ने पत्थरबाजी के साथ.साथ फायरिंग भी की है। जिसमें करीब 10 पुलिस वालों को छर्रे लगे हैं। जिनको अस्पताल में भर्ती किया गया है। पहले मौलाना को नजरबंद किया गया था फिर उसे हिरासत में लिया गया और इसके बाद गिरफ्तार कर लिया गया यह पूरा विवाद आई लव मोहम्मद के पोस्टर को लेकर शुरू हुआ।
वैसे उत्तर प्रदेश के कानपुर से शुरू हुए हुआ एक मामला देश के कई राज्यों तक फैल चुका है। दरअसल बारावफात के मौके पर मुस्लिम समुदाय की ओर से लगाए गए आई लव मोहम्मद बैनर ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। कानपुर में इसे लेकर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली। इसके बाद मुस्लिम संगठनों और लोगों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बता दिया। देखते ही देखते यह विवाद लखनऊ, बरेली नागपुर काशीपुर और हैदराबाद समेत देश के कई शहरों तक पहुंच गया। इस विवाद को लेकर कई जगह जुलूस निकाले गए। वहीं कई जगह तो इस विवाद को लेकर मुस्लिम महिलाएं सड़कों पर उतरी गई और पुलिस से झड़प की नौबत तक आ गई। आई लव मोहम्मद का यह पूरा मामला कानपुर के रावतपुर इलाके से शुरू हुआ था। सितंबर की शुरुआत में बारावफात के जुलूस के दौरान मुस्लिम युवाओं ने आई लव मोहम्मद लिखे पोस्टर और बैनर लगाए। इसके बाद स्थानीय हिंदू संगठनों ने इसे नई परंपरा बताते हुए आपत्ति जताई और माहौल गरमा गया। इसके बाद मामले में पुलिस ने हस्तक्षेप करते हुए बैनर हटवा दिए और कई लोगों को नामजद तथा 15 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की इसमें सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और धार्मिक भावनाओं को भड़काने जैसी धाराएं लगाई गई। इसको लेकर पुलिस का कहना है कि मामला सिर्फ बैनर का नहीं बल्कि तय जगह से अलग टेंट लगाने और जुलूस के दौरान दूसरे समुदाय के धार्मिक पोस्टर फाड़े जाने को लेकर एफआईआर हुई है। जबकि मुस्लिम समुदाय का आरोप है कि आई लव मोहम्मद नारे को अपराध की तरह पेश किया जा रहा है। उनका कहना है कि यह तो सिर्फ मोहम्मद पैगंबर के प्रति प्यार और सम्मान जताने का तरीका है। इसमें सांप्रदायिक तनाव भड़काने जैसी कोई बात नहीं है।
कानपुर से शुरू हुआ यह विरोध धीरे.धीरे पूरे यूपी और फिर देश के अन्य राज्यों तक फैल गया। आई लव मोहम्मद को लेकर हुए विरोध में उन्नाव में जुलूस के बाद पुलिस ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया। वहीं महाराजगंज और कौशांबी में भी कई मुकदमे दर्ज किए गए। इसके अलावा लखनऊ में इस विरोध को लेकर मुस्लिम महिलाएं विधानसभा के गेट नंबर 4 के सामने हाथों में बैनर लेकर बैठ गई और विरोध जताने लगीं। हालांकि पुलिस में विधानसभा के सामने से महिलाओं को हटायाए लेकिन पुलिस पर कई युवाओं को हिरासत में लेने का आरोप भी लगा। इसके अलावा महाराष्ट्र के नागपुर और बरेली में भी विरोध प्रदर्शन हुए। नागपुर में मस्जिदों पर आई लव मोहम्मद के पोस्टर लगाए गए और जुलूस निकाला गयाण् बरेली में तो एक मुस्लिम नेता का वीडियो वायरल हो गया। जिसमें उन्होंने पुलिस अधिकारी को धमकी दे डाली। इसके अलावा उत्तराखंड के काशीपुर में भी बिना अनुमति निकाले गए जुलूस में स्थिति बिगड़ गई। जुलूस के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई और पथराव की घटनाएं सामने आई। पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया और अतिक्रमण पर भी कार्रवाई की। देशभर में फैल चुका यह विवाद अब सियासी गलियारों में भी पहुंच चुका है। सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस विवाद को लेकर कहा कि आई लव मोहम्मद कहना कोई अपराध नहीं है। अगर है तो वह सजा भुगतने को तैयार हैं इसके अलावा बरेली संगठन के मौलाना तकीर रजा और वर्ल्ड सूफी फोरम के अध्यक्ष हजरत सैयद मोहम्मद अशरफ ने भी पुलिस की कार्रवाई को गलत बताया।
विवाद के बाद सोशल मीडिया पर भी आई लव मोहम्मद ट्रेंड करने लगा और हजारों लोग इसे अपनी प्रोफाइल तस्वीर बना रहे हैं। वहीं इस विरोध के बाद भाजपा सरकार पर भेदभाव के आप भी लगाए गए हैं। भाजपा ने सरकार पर लगाए गए भेदभाव के आरोपी को खारिज किया है। इस विरोध को लेकर बीजेपी के प्रवक्ताओं का कहना है की कार्रवाई धर्म देखकर नहीं बल्कि कानून तोड़ने वालों पर की जा रही है। उनका कहना है की पोस्टर और बैनर लगाने के लिए जगह तय है। अगर बिना अनुमति ऐसा किया जाता है तो कार्रवाई होगी। दूसरी ओर मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि जो पैगंबरे इस्लाम से मोहब्बत करने का तरीका अपनाया जाया रहा है वह बिल्कुल सही नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि लोग सड़कों पर निकल रहे हैं और पोस्टर फ्लैक्स को चिपका रहे हैं। इस पोस्टर पर मोहम्मद स.अ का नाम लिखा हुआ है। ये फ्लेक्स नालियों में जाता है। जिससे हुज़ूर के नाम की तौहीन हो रही है। उन्होंने आगे कहा कि जिस तरह से त्योहार चल रहे हैं। उसको ध्यान में रखते हुए कोई भी घरना प्रदर्शन न करें और साथ ही ये पोस्टर कहीं पर न लगाए। कुरान में लिखा है कि काम करने के तरीके हिकमत के जरिए होते हैं न कि शोर शराबे और हुड़दंग करके। ज्ञात हो कि बरेली में जुमा के दिन आई लव मुहम्मद कैंपेन के तहत जुलूस निकाला गया था।
पुलिस ने खोला मौलाना तौकीर रजा खां का राज
हिंसा के बाद पुलिस ने कार्रवाई तेज की। आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और उनसे पूछताछ में पूरी साजिश का खुलासा हुआ। पुलिस का कहना है कि मौलाना तौकीर रजा खां की असली मंशा केवल ज्ञापन देने की नहीं थी, बल्कि इस्लामिया मैदान में अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर शक्ति प्रदर्शन करना था।
मौलाना तौकीर की फाइलें गायब
हिंसा के बाद जब पुलिस ने मौलाना तौकीर रजा खां का आपराधिक इतिहास खंगालना शुरू किया तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। पता चला कि 1982 से लेकर 2000 तक उनके खिलाफ दर्ज पांच मुकदमों से संबंधित फाइलें अदालत से ही गायब हो गई हैं।
पहला मुकदमा 1982 में
रिकॉर्ड के मुताबिक, मौलाना तौकीर पर पहला मुकदमा वर्ष 1982 में कोतवाली थाने में दर्ज हुआ था। उस पर दंगे सहित कई गंभीर धाराओं में केस बना। इसके बाद 1987 से 2000 तक अलग-अलग मामलों में चार मुकदमे और दर्ज हुए। इनमें आपराधिक विश्वासघात, महिला से दुष्कर्म की नीयत से हमला, दंगा और मारपीट जैसे गंभीर आरोप शामिल थे।
फाइलें कैसे गायब हुईं, सवाल बड़ा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अदालत से इतनी अहम पत्रावलियां कैसे और क्यों गायब हुईं? पुलिस और प्रशासन की संयुक्त जांच से यह राज खुल सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि फाइलों का गायब होना किसी प्रभाव या दबाव का नतीजा हो सकता है।
2019 का केस भी अधूरा
इतना ही नहीं, वर्ष 2019 में भी मौलाना तौकीर पर कोतवाली थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोप था कि उन्होंने लोकसेवक का आदेश नहीं माना और आपराधिक धमकी दी। लेकिन छह साल बीत जाने के बावजूद इस केस की विवेचना अब तक पूरी नहीं हो सकी। इससे प्रशासनिक लापरवाही भी उजागर होती है।
