ईरान में स्थिति काफ़ी तनावपूर्ण हो गई है. मुख्यतः आर्थिक मुद्दों को लेकर लोगों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू किया था, मगर आंदोलन का दायरा बढ़ते ही सरकार ने दमन का रास्ता अपनाया. वहां इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है, इसलिए जल्द सूचनाएं नहीं आ रहीं, लेकिन रिस-रिसकर जो खबरें पहुंच रही हैं, उनके मुताबिक, सैन्य कार्रवाई में सैकड़ों लोगों की जान गई है. तेहरान में पहले भी विरोध-प्रदर्शन हुए हैं और हमेशा ईरानी हुकूमत उसे दबाने में सफल रही है. इस बार भी ऐसा ही जान पड़ रहा है. माना जाता है कि जब तक प्रदर्शनकारियों को ‘बाहर’ से समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक ईरान में शायद ही कोई बदलाव आ सकेगा. निर्वासित नेता रज़ा पहलवी ईरानी सेना से जनता के पक्ष में खड़े होने की अपील ज़रूर कर रहे हैं, लेकिन किसी एक नेता के हाथ में कमान न होना इस आंदोलन की बड़ी कमजोरी साबित हुई है.
अमेरिका की भूमिका
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी विदेश नीति से इसे एक नया मोड़ देना चाहते हैं. उन्होंने साफ़ लफ़्ज़ों में कहा है कि प्रदर्शनकारी आंदोलन जारी रखें, अमेरिका से मदद आ रही है. उन्होंने चेतावनी भी दी है कि यदि तेहरान प्रदर्शनकारियों को फांसी देता है, तो फिर वाशिंगटन ‘बहुत सख़्त कार्रवाई’ करेगा.
ईरान में इरफ़ान सुल्तानी की फांसी एक बड़ा मुद्दा बन चुका है. हालांकि, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन आंदोलनकारियों की चिंताओं पर ध्यान देने की बात कह रहे हैं, पर स्थिति संभलती नहीं दिख रही. वैसे, ईरान में एक बड़ा तबका आज भी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई और उनकी शासन-व्यवस्था में विश्वास करता है. ट्रंप के बयान पर रूस की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है. रूस के विदेश मंत्री के मुताबिक, “जो लोग बाहर से उकसाई गई अशांति का बहाना बनाकर ईरान पर हमला करना चाहते हैं, उन्हें मध्य-पूर्व की स्थिति और वैश्विक सुरक्षा पर इसके पड़ने वाले ख़तरनाक नतीजों के बारे में भी पता होना चाहिए.” वेनेज़ुएला के ताज़ा घटनाक्रम ने रूस को ट्रंप के बयान पर तत्काल पलटवार करने के लिए प्रेरित किया है. वेनेज़ुएला की तरह ईरान भी रूस का करीबी सहयोगी देश है.
रूस की भूमिका
वास्तव में, मॉस्को और वॉशिंगटन का यह टकराव मध्य-पूर्व के ‘शक्ति संतुलन’ से जुड़ा है. मध्य-पूर्व के सुन्नी बहुल और शिया बहुलता वाले देशों के बीच तनातनी पुरानी है. इज़रायल और ईरान के बीच तनाव की भी यही मूल वजह है. इज़रायल व सुन्नी बहुल अरब देश, शिया बहुलता वाले ईरान के सामने खड़े रहते हैं. अमेरिका इसमें सुन्नी बहुल देशों का साथ देता है. ऐसे में, यदि वह तेहरान में सत्ता-परिवर्तन करने में सफल रहा, तो मध्य-पूर्व में उसका दबदबा बढ़ जाएगा. इससे शक्ति-संतुलन सुन्नियों के पक्ष में झुक सकता है. मॉस्को इसी बात से चिंतित है. वास्तव में, रूस, ईरान और चीन ऐसे देश हैं, जो अमेरिका के साथ सीधा मुकाबला करते रहते हैं. अपनी हैसियत को मज़बूत बनाए रखने के लिए मॉस्को के लिए ईरान को बचाना अनिवार्य हो जाएगा. इसका अर्थ है कि यदि ईरान में अमेरिकी कार्रवाई होती है, तो अमेरिका और रूस भी आमने-सामने आ सकते हैं. इससे विश्व-व्यवस्था में और अव्यवस्था फैल सकती है.
भारत का रुख़
भारत की चिंता यही है. अगर ईरान में जल्द स्थिरता नहीं आती और मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है, तो नई दिल्ली को लंबे समय तक परेशानी हो सकती है. यह सही है कि ईरान के साथ हमारा व्यापार बहुत ज़्यादा नहीं है. ख़ास तौर से अमेरिकी प्रतिबंध के बाद से हमने तेहरान के साथ कारोबार काफ़ी कम कर दिया है. अब हम उससे तेल भी ज़्यादा नहीं खरीदते, पर आर्थिक रिश्तों में यह सुस्ती हमारी तरफ़ से है. ईरान के लिए तो हम अब भी उसके शीर्ष पांच कारोबारी देशों में से एक हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब उन देशों पर भी अतिरिक्त 25 फ़ीसदी सीमा शुल्क लगाने की घोषणा की है, जो ईरान के साथ व्यापार कर रहे हैं. मुमकिन है कि इसका नुक़सान हमें हो.
ज़ाहिर है, यदि ईरान में ‘बाहरी मदद’ से सत्ता बदलती है, तो मध्य-पूर्व में शक्ति-संतुलन बिगड़ सकता है. इसका असर क्षेत्र पर ही नहीं, महाशक्तियों के समीकरणों पर भी पड़ेगा. लिहाज़ा ईरान में जल्द शांति अनिवार्य है. वहां की अस्थिरता किसी के लिए ठीक नहीं.
