Bihar Election 2025: एनडीए की सुनामी, दो तिहाई बहुमत से ऐतिहासिक जीत
Bihar Election 2025: में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने जीत का नया इतिहास रचा है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के घटक दलों ने शानदान प्रदर्शन करते हुए दो तिहाई से अधिक बहुमत हासिल कर लिया। भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड सहित एनडीए के सभी दलों शानदार प्रदर्शन करते हुए बडी जीत हासिल की। एनडीए की सूनामी में महागठबंधन कहीं नहीं टिक पाया। महागठबंधन को बुरी तरह का हार का सामना करना पडा।
राज्य की 243 सीटों के लिए 6 और 11 नवंबर 2025 को दो चरणों में मतदान हुआ था और 14 नंवबर को मतगणना हुई। बिहार की जीत के बाद दिल्ली से लेकर पटना तक भाजपा में जश्न का माहौल है। दिल्ली में भाजपा मुख्यालय पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि ये सिर्फ एनडीए की विजय नहीं है बल्कि लोकतंत्र की विजय है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि बिहार में सुशासन विकास और सामाजिक न्याय की जीत हुई है।एनडीए गठबधन बिहार की 243 बिधान सभा सीटों में से लगभग 200 सीटें जीतकर सरकार बनाने जा रहा है।
बिहार के सभी 6 आंचलों में एनडीने जबरदस्त पदर्शन किया। मगल और भोजपुर एनडीए भारी रहा । भोजपुर की 46 सीटों में 39 सीटो पर एनडीए भारी पडा । मगध में भी 47 में से करीब 39 सीटों पर जीत की हासिल कर ली। तिरूहत मिथलांचल में 49 में से 48 सीटें जीती। सीमांचल में औबेसी की पार्टी ने छह सीटें जीतकर महागठबंधन का गणित बिगाड दिया। एनडीए को जबरदस्त फायदा हुआ।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में भारतीय जनता पार्टी जनता दल यूनाइटेड हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा ने मिलकर चुनाव लडा और महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विकासशील इंसान पार्टी भाकपा माले लिबरेशन सहित वामदल शामिल थे।
2010 में भाजपा को 91 2015 53 और 2020 74 सीटें मिली थी जबकि जदयु को 115, 71 और 43 सीटें मिली।
2025 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को 89 और जदयु को 83 लोक जनशक्ति पार्टी राम विलास पासवान को 22 सीटें पर बढत मिली है।
राजद को 2010 में 22 , 2015 80 और 2020 में 75 सीटे मिली थी जबकि कांग्रेस को 4, 27 और 19 सीटें मिली जबकि 2025 में राजद को 25 और कांग्रेस को 6 सीटों पर बढत हैं।
राज्य में 1951 के बाद इस बार सबसे ज़्यादा 67.13% मतदान हुआ है. यह पिछले विधानसभा चुनाव से 9.6% ज़्यादा है.
इस बार के मतदान की ख़ास बात यह भी रही कि इसमें पुरुषों की हिस्सेदारी 62.98% थी और महिलाओं की 71.78 फ़ीसदी.
एनडीए की एकजुटता मोदी फैक्टर और नीतीश पर भरोसा
एनडीए ने संगठित चेहरे के साथ चुनाव लड़ा।
मोदी की रैलियां निर्णायक साबित हुईं और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया कि अगले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे।
मतदाताओं को स्थिरता और भरोसे का संकेत मिला।
महागठबंधन की तुलना में एनडीए का बूथ मैनेजमेंट भी अधिक प्रभावी रहा। कुल मिलाकर बिहार के मतदाताओं ने इस बार अनुभव स्थिरता और भरोसे को तरजीह दी है।
एनडीए की बढ़त महागठबंधन की रणनीतिक गलतियों का भी परिणाम है।
यह चुनाव बताता है कि बिहार में राजनीतिक संदेश और प्रबंधन उतना ही महत्वपूर्ण है जितना नेतृत्व और गठबंधन की विश्वसनीयता।
2025 में ध्वस्त हुआ राजद का 35 साल पुराना एमवाई समीकरण।
आरजेडी की हार का सबसे बड़ा कारण मुस्लिमों की आरजेडी से दूरी है। सीमांचल के जिलों में जहां किशनगंज कटिहार अररिया और पूर्णिया जिले की 12 मुस्लिम बहुल सीटों पर आरजेडी की बुरी तरह हार हुई। हैदराबाद वाले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने साल 2020 के मुकाबले इस बार ज्यादा नुकसान पहुंचाया
ओवैसी ने दो प्रतिशत वोट वाले मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम बनाने की घोषणा को लेकर भी महागठबंधन पर निशाना साधा और कहा कि दो प्रतिशत वोट वाले को डिप्टी सीएम की कुर्सी दी जा रही है जबकि 18 प्रतिशत मुस्लिमों को दरी बिछाने के लिए रखा जा रहा है।
राहुल गांधी ने बार.बार चुनाव आयोग और बीजेपी पर वोट चुराने और लोकतंत्र की हत्या जैसे आरोप लगाए। लेकिन ये आरोप ज़्यादातर वोटरों पर असर नहीं कर पाए। लोग अपने रोज़मर्रा के मुद्दों जैसे योजनाओं का लाभ रोजगार और विकास पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे जहां एनडीए को बढ़त मिलती दिखी।
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर नौ बार सीएम बनने वाला अनोखा रिकॉर्ड रखता है। सुशासन महिलाओं के लिए योजनाएं और गठबंधन बदलने की रणनीति उन्हें हमेशा केंद्र में रखती रही।
कहां चूका महागठबंधन वो गलतियां जिनसे बिगड़ी बाजी महागठबंधन की रणनीतिक भूलों का कड़वा सच
हवा हवाई वादों पर जनता ने नहीं किया भरोसा
तेजस्वी यादव ने सरकारी नौकरी पेंशन और सामाजिक सुरक्षा जैसे बड़े.बड़े वादे किए लेकिन उनका फंडिंग मॉडल या ठोस समय.सीमा सामने नहीं रख पाए। करोड़ों नौकरियां और तेजस्वी प्रण जैसे नारों ने शुरुआत में उत्साह जरूर पैदा किया लेकिन ब्लूप्रिंट न आने से विश्वसनीयता कमजोर हुई। दूसरी ओर एनडीए ने इन वादों को अवास्तविक बता कर माहौल बनाया और इसमें सफल भी रहे।
सीट बंटवारे में देरी और भरोसे की कमी
जंगलराज और मुस्लिमपरस्त नैरेटिव का प्रभाव
यादव केंद्रित टिकट वितरण
144 सीटों में 52 यादव उम्मीदवार उतारकर राजद ने जातीय समीकरण को अत्यधिक तवज्जो दी। इससे गैर.यादव ओबीसी अत्यंत पिछड़े और सवर्ण समुदाय महागठबंधन से दूर हुए। बीजेपी ने इसे यादव राज कहा और शहरी तथा मध्यम वर्ग में इसका असर दिखा।
यह चुनाव बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो रहा है। एनडीए ने न केवल सत्ता बरकरार रखी है, बल्कि अपने जनादेश को और मजबूत किया है। बीजेपी और जेडीयू के नेतृत्व वाले गठबंधन ने राज्य के लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत की है। महागठबंधन को उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। खासकर आरजेडी को कई सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा है। इसमें आरजेडी और कांग्रेस प्रमुख दल हैं।
क्षेत्रवार विश्लेषण से पता चलता है कि एनडीए ने मगध–भोजपुर जैसे पारंपरिक रूप से महागठबंधन के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में भी सेंध लगाई है। तिरहुत–सरन क्षेत्र में बीजेपी का प्रदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहां उसने अपनी सीटों की संख्या बढ़ाई है। भागलपुर–मुंगेर क्षेत्र में भी एनडीए का दबदबा साफ दिख रहा है। दरभंगा–कोसी–पूर्णिया क्षेत्र में भी एनडीए की स्थिति मजबूत है। हालांकि, एआईएमआईएम ने सीमांचल में कुछ सीटें जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
यह परिणाम कई फैक्टर्स का मिलाजुला असर है। इसमें एनडीए के नेतृत्व का करिश्मा, गठबंधन की एकजुटता, स्थानीय मुद्दों पर फोकस करना और मतदाताओं का विश्वास जीतना शामिल है। दूसरी ओर, महागठबंधन को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत हो सकती है। तेजस्वी यादव का मुख्यमंत्री चेहरा होने के बावजूद महागठबंधन उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया है।
