नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के तीस जनवरी मार्ग स्थित गांधी स्मृति (पूर्व बिड़ला हाउस) महज एक संग्रहालय नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास के उस संवेदनशील दौर की पवित्र गवाही है, जब देश आजादी के साथ विभाजन की विभीषिका और सांप्रदायिक हिंसा का दंश झेल रहा था. महात्मा गांधी 9 सितंबर 1947 को दिल्ली लौटने के बाद इसी परिसर में रहे और अपने जीवन के अंतिम 144 दिन शांति, समरसता और मानवता का संदेश फैलाने में बिताए. यहीं 30 जनवरी 1948 की शाम 5 बजकर 17 मिनट पर उनकी शहादत हुई. इतिहास के इस महान अध्याय को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1971 में इस ऐतिहासिक भवन को अधिग्रहित किया और 15 अगस्त 1973 को इसे आम जनता के लिए निःशुल्क खोल दिया.
आज भी मौजूद हैं बापू के आखिरी 144 दिनों के निशान
गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के निदेशक डॉ. संजीत कुमार ने बातचीत में बताया कि संस्था का मुख्य उद्देश्य महात्मा गांधी के जीवन, दर्शन, विचार व उनके उसूलों को विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यक्रमों के माध्यम से देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाना है. उनके मुताबिक गांधी स्मृति वह महत्वपूर्ण स्थान है, जहां गांधी जी ने जीवन के अंतिम 144 दिन बिताए थे. आज परिसर में गांधी जी का कमरा, उनकी स्मृतियों से जुड़ी वस्तुएं, प्रार्थना स्थल एयर वह स्थान संरक्षित है जहां उनकी हत्या हुई थी. यहां मौजूद शहीद स्तंभ यानी मार्टियर्स कॉलम गांधी जी की अंतिम यात्रा व शहादत की सबसे बड़ी निशानी है.
डॉ. संजीत कुमार के मुताबिक देश के विभिन्न हिस्सों से लोग यहां आते हैं, गांधी जी को नमन करते हैं और उनके विचारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं. विदेशों से आने वाले लोग भी इस स्मारक और संग्रहालय के माध्यम से गांधी जी के जीवन और विचारों को समझते हैं. संग्रहालय में डिजिटल व फोटोग्राफिक माध्यमों से गांधी जी के जीवन, उनके दर्शन व स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका को प्रदर्शित किया गया है. यह वही स्थान है जहां गांधी जी 9 सितंबर 1947 से 30 जनवरी 1948 तक रहे थे. उनके अंतिम 144 दिनों की अनेक स्मृतियां यहां संरक्षित हैं.
9 सितंबर 1947: बिड़ला हाउस पहुंचे गांधी
डॉ. संजीत कुमार ने बताया कि महात्मा गांधी के अंतिम 144 दिनों की कहानी 9 सितंबर 1947 से शुरू होती है. आजादी मिले अभी कुछ ही सप्ताह हुए थे. देश विभाजन की त्रासदी से गुजर रहा था. कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा हुई और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए. गांधी जी इस दौर में शांति स्थापित करने के प्रयास में लगे थे. 9 सितंबर 1947 को वह दिल्ली पहुंचे और बिड़ला हाउस में रहने लगे. इसके बाद अगले करीब साढ़े चार महीने तक उनकी गतिविधियों का केंद्र यही परिसर रहा.
इन 144 दिनों के रिकॉर्ड को देखें तो गांधी जी लगातार विभिन्न समुदायों के लोगों से मिलते रहे, प्रार्थना सभाओं में बोलते रहे और सांप्रदायिक सौहार्द की अपील करते रहे. 2 अक्टूबर 1947 को गांधी जी ने अपना 78वां जन्मदिन भी इसी अवधि में मनाया था. उस दिन डॉक्टरों ने उन्हें पेनिसिलिन लेने की सलाह दी, लेकिन गांधी जी ने रामनाम को अपना उपचार बताया. अक्टूबर के दौरान भी वह शरणार्थी शिविरों में स्वच्छता, भोजन में आत्मनिर्भरता, धार्मिक सहिष्णुता व सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मुद्दों पर लगातार बोलते रहे.
दिल्ली में शांति के लिए अंतिम उपवास
जनवरी 1948 में गांधी जी ने दिल्ली में सांप्रदायिक शांति के लिए उपवास किया था. उनके अंतिम दिनों की घटनाओं में यह उपवास बेहद महत्वपूर्ण था. जनवरी 1948 की घटनाओं के साथ दिल्ली में शांति व विभिन्न समुदायों के बीच भरोसा बहाल करने का प्रयास किया. इसी दौरान गांधी जी के लिए सामाजिक समरसता व धार्मिक सौहार्द सबसे महत्वपूर्ण विषय बने रहे. लेकिन इसके कुछ ही दिन बाद बिड़ला हाउस की प्रार्थना सभा में ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिसने गांधी जी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी थी.20 जनवरी 1948 को बिड़ला हाउस की प्रार्थना सभा के दौरान बम विस्फोट हो गया था. गांधी जी ने इसके बावजूद अपनी प्रार्थना सभा जारी रखी थी. गांधी स्मृति के आधिकारिक 144-दिन के रिकॉर्ड में इस घटना को गांधी जी के अंतिम दिनों की प्रमुख घटनाओं में शामिल किया गया है. इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चर्चा हुई, लेकिन गांधी जी की सार्वजनिक प्रार्थना सभा जारी रही. यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ ही दिन बाद इसी परिसर में गांधी जी की हत्या हुई.
30 जनवरी 1948 को आखिरी दिन
30 जनवरी की सुबह गांधी जी हमेशा की तरह करीब 3:30 उठे. उनका अंतिम दिन भी बेहद व्यवस्थित व व्यस्त था. उन्होंने अपने साथ रहने वाले लोगों को जगाया और दिन की गतिविधियां शुरू कीं. दिनभर उनकी मुलाकातें होती रहीं। उन्होंने कांग्रेस के संविधान के मसौदे को संशोधित किया और कई लोगों से बातचीत की. इसके बाद उनकी सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ महत्वपूर्ण बातचीत हुई. बातचीत के दौरान उन्हें याद दिलाया गया कि प्रार्थना का समय हो गया है. इसके बाद गांधी जी मनु गांधी और आभा गांधी के सहारे प्रार्थना सभा की ओर चल पड़े. यही उनका आखिरी सफर था. जब गांधी जी प्रार्थना स्थल की ओर बढ़ रहे थे, तभी उन पर नजदीक से तीन गोलियां चलाई गईं. वह जमीन पर गिर पड़े और शाम 5 बजकर 17 मिनट पर उनका निधन हो गया. उनके मुंह से निकला आखिरी शब्द हे राम. आज उसी स्थान पर शहीद स्तंभ मौजूद है.
एक रास्ता, जो 78 साल बाद भी इतिहास सुनाता है
गांधी स्मृति आने वाले लोगों के लिए ये रास्ता सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है. गांधी जी के कमरे से प्रार्थना स्थल तक जाने वाला रास्ता उस अंतिम यात्रा की याद दिलाता है, जिसे गांधी जी ने 30 जनवरी 1948 की शाम तय किया था. यहां आने वाले दर्शक उस रास्ते को देखकर समझ सकें इसके लिए फुटप्रिंट बनाये गए हैं.एक तरफ गांधी जी का कमरा है, जहां उन्होंने जीवन के आखिरी महीने बिताए. दूसरी तरफ प्रार्थना स्थल है, जहां वह रोजाना लोगों से संवाद करते थे. उसी परिसर में शहीद स्तंभ बनाया गया है, जहां गांधी जी की गोली मारकर हत्या की गई थी. यही वजह है कि गांधी स्मृति का महत्व किसी सामान्य संग्रहालय से अलग है. यहां पर इतिहास को केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि उन स्थानों के जरिए महसूस किया भी जा सकता है जहां वह इतिहास घटित हुआ था.
गांधी जयंती पर फिर गूंजेंगे प्रार्थना के स्वर
यह परिसर 2 अक्टूबर को गांधी जी की 157वीं जयंती के अवसर पर एक बार फिर देश-दुनिया के लोगों की मौजूदगी का गवाह बन रहा है. गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के निदेशक डॉ. संजीत कुमार के मुताबिक इस अवसर पर देश के गणमान्य लोगों का आगमन होगा. दिल्ली के 50 से अधिक विद्यालयों के बच्चे यहां भजन संध्या में प्रस्तुति देंगे. इस बार प्रसिद्ध गायक भाई बलदीप सिंह भी प्रस्तुति देंगे.कार्यक्रम में विभिन्न धर्मों के धर्मगुरु शामिल होंगे और सर्वधर्म प्रार्थना सभा आयोजित की जाएगी. गांधी स्मृति में इस तरह की अंतरधार्मिक प्रार्थना का उद्देश्य गांधी जी के उस संदेश को आगे बढ़ाना है, जिसमें उन्होंने धर्म, जाति व संप्रदाय से ऊपर मानवता को महत्व दिया. गांधी स्मृति में इससे पहले भी बड़े स्तर पर सर्वधर्म प्रार्थना व बच्चों की संगीत प्रस्तुतियां आयोजित होती रही हैं. उदाहरण के तौर पर 2019 में गांधी जी की 150वीं जयंती के कार्यक्रम में विभिन्न संस्थानों के करीब 1000 बच्चों ने हिस्सा लिया था. अलग-अलग धर्मों के धार्मिक नेताओं ने सर्वधर्म प्रार्थना में भाग लिया था.
रघुपति राघव राजा राम’ से सामाजिक समरसता का संदेश
2 अक्टूबर के कार्यक्रम में विभिन्न स्कूलों के बच्चों की भजन प्रस्तुति भी खास आकर्षण होगी. गांधी जी से जुड़े कार्यक्रमों में ‘रघुपति राघव राजा राम, ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ जैसे भजनों के जरिए धार्मिक सद्भाव व सामाजिक एकता का संदेश दिया जाता रहा है. डॉ. संजीत कुमार के मुताबिक गांधी जी के लिए धर्म, मजहब, संप्रदाय व जाति से ज्यादा महत्वपूर्ण मानवता थी. उनका कहना है कि समाज को आगे बढ़ाने के लिए लोगों को इन विभाजनों से ऊपर उठकर मानव मात्र की रक्षा व देश के विकास के लिए साथ आना चाहिए. यही कारण है कि गांधी स्मृति में 2 अक्टूबर का कार्यक्रम सिर्फ जन्मदिन का आयोजन नहीं, बल्कि उनके विचारों को वर्तमान समाज से जोड़ने का अवसर भी बनता है.
सोशल मीडिया के दौर में गांधी क्यों जरूरी
डॉ. संजीत कुमार के मुताबिक 21वीं सदी में गांधी के विचारों की प्रासंगिकता कम होने के बजाय और बढ़ी है. खासतौर पर युवाओं के संदर्भ में वह गांधी के सत्य, अहिंसा और नैतिक मूल्यों को महत्वपूर्ण मानते हैं. उनके मुताबिक आज के युवा ऊर्जावान, महत्वाकांक्षी व तकनीक से लैस हैं. भारत के विकास में युवाओं की बड़ी भूमिका है. लेकिन तकनीकी व आर्थिक विकास के साथ नैतिक मूल्यों का होना भी जरूरी है.सोशल मीडिया के दौर में गांधी के सत्य के सिद्धांत को लागू करने का उदाहरण देते हुए डॉ. संजीत कुमार कहते हैं कि किसी गलत या अपुष्ट संदेश को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सत्यता की पुष्टि करनी चाहिए. इसी तरह किसी मुद्दे पर असहमति हो तो सामने वाले के प्रति असम्मान या दुर्भावना पैदा किए बिना अपनी बात शालीनता से रखना भी अहिंसा का एक रूप है. उनके मुताबिक गांधी को केवल इतिहास की किताबों में पढ़ने की जरूरत नहीं है. गांधी एक विचार, एक आचरण व सतत प्रयोग हैं.
विकास के साथ संवेदना व शक्ति के साथ करुणा
डॉ. संजीत कुमार का कहना है कि भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है. इसमें युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी. लेकिन विकास के साथ संवेदना, शक्ति के साथ करुणा व आधुनिकीकरण के साथ मानवतावादी दृष्टिकोण भी जरूरी है. उनके अनुसार युवाओं को सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए समाज निर्माण में अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी चाहिए. गांधी के विचारों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा है. डॉ. संजीत कुमार सादगी को गांधी के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हैं. उनका कहना है कि आज तापमान में असंतुलन और प्राकृतिक आपदाओं जैसी चुनौतियां सामने हैं. ऐसे समय में गांधी की सादगी और सीमित आवश्यकताओं का विचार महत्वपूर्ण हो जाता है. उनके अनुसार गांधी का संदेश था कि धरती हर व्यक्ति की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन लालच को पूरा नहीं कर सकती. इसलिए सेवा, सादगी, आपसी सौहार्द व पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी को जीवन का हिस्सा बनाने की जरूरत है.
गांधीजी का अंतिम संदेश: 30 जनवरी 1948 को जब गोली लगने से गांधीजी शहीद हुए, तब उनके अंतिम शब्द थे “हे राम” उन्होंने कहा था कि यदि उन्हें किसी पागल की गोली भी लगे, तो वे मुस्कुराते हुए मरना चाहेंगे और उनके होंठों पर राम का नाम होगा.
बिड़ला हाउस से राष्ट्रीय स्मारक तक
गांधी स्मृति आज जिस रूप में मौजूद है, उसके पीछे भी एक लंबा इतिहास है. पुराने बिड़ला हाउस को भारत सरकार ने 1971 में अधिग्रहित किया. इसके बाद इसे राष्ट्रीय स्मारक में बदला गया. 15 अगस्त 1973 को इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया. इसके बाद सितंबर 1984 में गांधी दर्शन, राजघाट व गांधी स्मृति, तीस जनवरी मार्ग का विलय कर गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति का गठन किया गया. समिति का उद्देश्य गांधी जी के जीवन, मिशन और विचारों को सामाजिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए आगे बढ़ाना है. आज समिति स्कूलों, कॉलेजों व युवाओं के बीच भी गांधी के विचारों को पहुंचाने के कार्यक्रम करती है. 2026 में भी गांधी स्मृति में स्कूलों व कॉलेजों के विद्यार्थियों के लिए संग्रहालय भ्रमण, गांधीवादी मूल्यों और अहिंसक संवाद से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं.
