लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमीन विवाद के मामले में एक दीवानी न्यायाधीश को देवीपाटन की मंडलायुक्त द्वारा कथित रूप से प्रभावित करने की कोशिश पर नाराजगी जताई है। मंडलायुक्त करीब तीन दशक पुराने मामले में एक पक्ष हैं। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कोशिश न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है और न्याय देने की प्रक्रिया में बाधा डालती है।
हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने न्यायिक कार्यवाही से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों को धमकी देने या दबाव डालने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले पर आपराधिक अवमानना के मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत को विचार करना चाहिए। न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी ने निर्देश दिया कि मुख्य न्यायाधीश या किसी वरिष्ठ न्यायाधीश से निर्देश लेने के बाद मामले को उचित अदालत के सामने रखा जाए।
लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमीन विवाद के मामले में एक दीवानी न्यायाधीश को देवीपाटन की मंडलायुक्त द्वारा कथित रूप से प्रभावित करने की कोशिश पर नाराजगी जताई है। मंडलायुक्त करीब तीन दशक पुराने मामले में एक पक्ष हैं। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कोशिश न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है और न्याय देने की प्रक्रिया में बाधा डालती है।
हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने न्यायिक कार्यवाही से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों को धमकी देने या दबाव डालने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले पर आपराधिक अवमानना के मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत को विचार करना चाहिए। न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी ने निर्देश दिया कि मुख्य न्यायाधीश या किसी वरिष्ठ न्यायाधीश से निर्देश लेने के बाद मामले को उचित अदालत के सामने रखा जाए।
देवीपाटन मंडल से बाहर स्थानांतरित करने की मांग
विवाद देवीपाटन मंडलायुक्त के नाम दर्ज कई नजूल भूखंड से जुड़ा है। पीठ के सामने रखे गए मंडलायुक्त के पक्ष के अनुसार, इस जमीन को कार्यालय भवन बनाने और अन्य सरकारी कामों के लिए सुरक्षित रखा गया था। राज्य के अधिकारियों ने आरोप लगाया कि इस जमीन पर एक स्कूल की इमारत बनाई गई थी और इसे लेकर विवाद करीब तीन दशक से दीवानी अदालत में लंबित था। मामला सबूत दर्ज किए जाने चरण में था और यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी हो चुका था। आवेदक स्कूल ने मामले को देवीपाटन मंडल से बाहर स्थानांतरित करने की मांग की थी और आरोप लगाया था कि अधिकारी अपने पदों का दुरुपयोग करके अदालत पर अनुचित दबाव डाल रहे हैं।
दुर्गा शक्ति नागपाल की बातचीत के बारे में बताया
विवाद तब और बढ़ गया जब गोंडा की दीवानी न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) शबीना खान ने जिला न्यायाधीश को देवीपाटन की मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ हुई कथित फोन बातचीत के बारे में बताया। न्यायाधीश के अनुसार, बातचीत में उनके अवकाश और अदालत में लंबित एक मामले का जिक्र हुआ था। इसके बाद न्यायिक अधिकारी ने चार अगस्त 2026 को गोंडा के जिला न्यायाधीश से अनुरोध किया कि मामला उनकी अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित किया जाए।
कोर्ट ने कहा- नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं
बाद में जिला न्यायाधीश ने मामले को गोंडा में समान अधिकार क्षेत्र वाली दूसरी अदालत में स्थानांतरित कर दिया। इससे आवेदक स्कूल द्वारा हाई कोर्ट में दायर स्थानांतरण आवेदन का कोई उद्देश्य नहीं रह गया। हालांकि, मामला बंद करने से पहले हाई कोर्ट ने कहा कि वह मंडलायुक्त नागपाल द्वारा दीवानी न्यायाधीश खान को फोन किए जाने से जुड़े आरोपों को नजरअंदाज नहीं कर सकता।
नागपाल ने फोन करने से इनकार नहीं किया
पीठ ने कहा कि न्यायाधीश खान द्वारा बताई गई कथित बातचीत के लहजे और भाषा से सीधा आभास होता है कि पीठासीन अधिकारी और दीवानी न्यायाधीश के रूप में उन्हें प्रभावित करने की कोशिश की गई थी। कोर्ट ने कहा कि नागपाल ने फोन करने से इनकार नहीं किया है और यह चौंकाने वाली बात है कि किसी लंबित मामले में मुकदमे का कोई पक्ष इस तरह के फोन कॉल के जरिए अदालत से संपर्क कर सकता है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि अधीनस्थ अदालतों को अपमान या दबाव से बचाया जाना चाहिए और पीठासीन अधिकारियों को बिना किसी डर के अपने कर्तव्यों का पालन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति, मुकदमे के पक्ष या वकील द्वारा अदालत पर दबाव बनाने की कोई भी कोशिश न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालती है।
