बांकीपुर सीट से विधानसभा उप चुनाव लड़ने के पीछे प्रशांत किशोर की क्या रणनीति हो सकती है, यह सवाल कई लोगों के मन में उत्सुकता पैदा कर सकता है.क्या बिहार की सियासत से नीतीश कुमार की विदाई और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रशांत किशोर कोई नया सियासी समीकरण तलाशने की कोशिश में हैं. प्रशांत किशोर ने बांकीपुर के लोगों से कहा, “मोदी जी तो आपसे बात करने आएंगे नहीं. आज भी नहीं आएंगे, पांच बरस बाद भी नहीं आएंगे. कैसे मोदी जी को पता चलेगा कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने से आप ख़ुश नहीं हैं. भाजपा को बांकीपुर से हराइए. उन तक अपने आप ख़बर पहुंच जाएगी कि उन्होंने जिस व्यक्ति का चुनाव किया है, उससे आप सहमत नहीं हैं.”
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद खाली हुई बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव साधारण नहीं रहने वाला है। सरकार के बहुमत पर इसके नतीजों का कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश बिहार की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
इसका प्रभाव सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष की राजनीति पर भी पड़ेगा, क्योंकि अबतक दूसरों के लिए रणनीति तैयार करने वाले जनसुराज के प्रशांत किशोर (पीके) पहली बार स्वयं मैदान में हैं। राजद ने भी अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष के भीतर दिखाई दे रही है। लोकसभा चुनाव में जनसुराज की शिकस्त के बावजूद पीके ने मैदान नहीं छोड़ा है और स्वयं को मुखर विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
बीजेपी का गढ़ और चुनौती
बांकीपुर सीट को बीजेपी का सबसे मजबूत किला माना जाता है. 1995 से लगातार इस क्षेत्र पर पार्टी का कब्जा रहा है. पहले पटना पश्चिम सीट के नाम से जानी जाने वाली इस सीट पर नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और बाद में उनके बेटे नितिन नवीन ने लगातार जीत दर्ज की. नितिन नवीन पांच बार विधायक रहे और 2025 में उन्होंने भारी मतों से जीत हासिल की थी.
विपक्ष की कोशिशें
कांग्रेस और आरजेडी ने कई बार इस सीट पर बीजेपी को चुनौती देने की कोशिश की लेकिन हर बार नाकाम रहे. 2020 में शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे यश सिन्हा को उतारा गया जिन्हें महागठबंधन का समर्थन मिला था फिर भी जीत नहीं मिली. 2015 में भी आरजेडी-जेडीयू और कांग्रेस मिलकर बीजेपी को नहीं हरा सके. यही वजह है कि इस उपचुनाव पर सबकी नजरें टिकी हैं.
सियासी समीकरण
बांकीपुर में करीब 3.91 लाख मतदाता हैं. इनमें सबसे ज्यादा कायस्थ समुदाय के वोटर हैं जो बीजेपी का कोर वोटबैंक माने जाते हैं. इनके अलावा वैश्य, ब्राह्मण और राजपूत भी बीजेपी के साथ खड़े रहते हैं. दूसरी ओर यादव और मुस्लिम वोटर आरजेडी के पक्ष में जाते हैं. चंद्रवंशी, दलित और अन्य समुदाय भी यहां निर्णायक भूमिका निभाते हैं. आरजेडी किसी नए समीकरण की तलाश में है जबकि प्रशांत किशोर के उतरने से बीजेपी के वोटबैंक में सेंध लगने की आशंका जताई जा रही है.
सम्राट चौधरी की परीक्षा
बीजेपी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी के लिए यह पहला बड़ा चुनाव है. बांकीपुर उपचुनाव को उनके नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज का जनमत संग्रह माना जा रहा है. पार्टी के लिए सिर्फ जीतना ही नहीं बल्कि जीत का अंतर बनाए रखना भी चुनौती है. खासकर तब जब ब्राह्मण वोटरों में नाराजगी की चर्चा है और पीके के मैदान में उतरने से सवर्ण वोट खिसक सकते हैं.
प्रशांत किशोर की एंट्री
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बांकीपुर से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि वह उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारेगी. इससे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है. पीके ने हाल के दिनों में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, नीट छात्र मामला और भोजपुर मुठभेड़ जैसे मुद्दों को उठाकर माहौल बनाया है. उनके लिए यह चुनाव पार्टी की ताकत दिखाने का पहला मौका है.
मुद्दों पर टकराव
बांकीपुर उपचुनाव में स्थानीय से ज्यादा राज्य स्तरीय मुद्दे हावी रहेंगे. बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और सरकार के अधूरे वादे चुनावी प्रचार का हिस्सा बन चुके हैं. बीजेपी इसे अपनी उपलब्धियों का समर्थन मान रही है जबकि आरजेडी इसे सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा बता रही है.
बीजेपी और आरजेडी का दावा
बीजेपी प्रवक्ता नीरज कुमार का कहना है कि बांकीपुर में पार्टी का वोट कोई नहीं काट सकता और सम्राट चौधरी के नेतृत्व में जीत पक्की है. वहीं आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि जनता का गुस्सा इस चुनाव में साफ दिखेगा और सरकार को करारा झटका मिलेगा.
उपचुनाव का महत्व
बांकीपुर उपचुनाव अब सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है. यह एनडीए सरकार के प्रदर्शन, विपक्ष के जन मुद्दों और प्रशांत किशोर की नई राजनीतिक ताकत की परीक्षा बन गया है. नतीजे से तय होगा कि बिहार की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी.
