संसद के बजट सत्र के दौरान सोमवार को जमकर हंगामा हुआ। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हो रही चर्चा के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बोलने के लिए खड़े हुए। उन्होंने कुछ कागजों के जरिए 2020 के गलवां संघर्ष का जिक्र करते हुए अपना भाषण शुरू किया। इस दौरान सत्ता पक्ष ने उनके भाषण पर आपत्ति जताई। असल में राहुल गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत में कहा कि वे पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब के कुछ अंशों के जरिए चीन से संघर्ष के बारे में बताना चाहते हैं। हालांकि, इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि जो किताब प्रकाशित ही नहीं हुई है, राहुल गांधी उसका जिक्र सदन में कैसे कर सकते हैं? वे इसके सत्यापन के लिए क्या सबूत देंगे? इसके बाद लोकसभा में नियमों और कायदों को लेकर बहस छिड़ गई और सदन की कार्यवाही 3 बजे तक के लिए स्थगित दी गई। 3 बजे जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई तो भी हंगामा जारी रहा। इसके बाद सदन की कार्यवाही को चार बजे तक स्थगित कर दिया गया। आखिरकार चार बजे भी जब मुद्दे की चर्चा पर हल नहीं निकल सका, तो सदन को 3 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दिया गया। हालांकि, इस बीच एक सवाल जो सबके मन में है, वह है पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब को लेकर, जिसके जिक्र की वजह से हंगामा शुरू हुआ। आइये जानते हैं कि जनरल नरवणे की यह किताब क्या है, जिस पर कथित तौर पर आधारित रिपोर्ट्स को लेकर लोकसभा में हंगामा हुआ? इसे लेकर सार्वजनिक तौर पर क्या जानकारी मौजूद है? किन नियमों के तहत और क्यों यह किताब अब तक प्रकाशित नहीं हो पाई?
जिस किताब को लेकर लोकसभा में सत्तापक्ष के नेता और विपक्ष के नेता आमने-सामने आ गए, वह भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की आत्मकथा- ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ है। इस किताब का प्रकाशन पेंगुइन रैंडम हाउस की ओर से किया जाना था और जनरल नरवणे ने इसमें भारत-चीन के बीच जून 2020 से शुरू हुए तनाव और इसके पूरे घटनाक्रम का जिक्र किया है। समाचार एजेंसी पीटीआई ने दिसंबर 2023 में इस किताब के प्रकाशन के लिए तय तारीख से कुछ समय पहले ही इसके अंशों का जिक्र किया था। हालांकि, कुछ दिन बाद ही यह सामने आया कि भारतीय सेना प्रकाशन से पहले इस किताब की समीक्षा कर रही है। दरअसल, किसी भी सैन्य अधिकारी/कर्मी/सेना के मामलों से जुड़ी किसी भी किताब या दस्तावेज के प्रकाशन से पहले सेना की मंजूरी अनिवार्य है। सेना नियम, 1954 की धारा 21 के तहत सेवारत कर्मियों पर कुछ पाबंदियां हैं। ऐसी ही कुछ पाबंदियां सेवानिवृत्त कर्मियों पर भी लागू होती हैं। बिना अनुमति प्रकाशन: कोई भी व्यक्ति केंद्र सरकार की पहले से मंजूरी लिए बिना किसी भी राजनीतिक प्रश्न से जुड़े सेवा विषय या सेवा जानकारी से संबंधित कोई भी पुस्तक, पत्र, लेख या अन्य दस्तावेज प्रकाशित नहीं कर सकता है।मीडिया से संपर्क: वे मीडिया को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी किसी भी जानकारी का खुलासा नहीं कर सकते जो सेवा से संबंधित हो। व्याख्यान और संबोधन: बिना पूर्व अनुमति के वे किसी भी सेवा विषय या राजनीतिक प्रश्न पर व्याख्यान या वायरलेस संबोधन भी नहीं दे सकते। सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए नियम थोड़े अलग हैं और अक्सर इसे एक ‘ग्रे एरिया’ (अस्पष्ट क्षेत्र) माना जाता है, लेकिन उन पर भी कुछ पाबंदियां लागू होती हैं। पेंशन नियम (2021 संशोधन): केंद्रीय नागरिक सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के संशोधित नियमों के अनुसार, खुफिया या सुरक्षा संबंधी संगठनों में काम कर चुके सेवानिवृत्त कर्मचारी बिना पूर्व अनुमति के अपने संगठन से जुड़ी कोई भी जानकारी प्रकाशित नहीं कर सकते। गोपनीयता की अपेक्षा: हालांकि रक्षा सेवाएं सीधे तौर पर इन पेंशन नियमों के दायरे में नहीं आतीं, लेकिन अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उसी तरह के मानकों का पालन करें, क्योंकि वे अपने कार्यकाल के दौरान कई गोपनीय और संवेदनशील जानकारियां रखते होते हैं।सेवा जानकारी’ का दायरा
नियमों के अनुसार, पाबंदियां केवल युद्ध या हथियारों तक सीमित नहीं हैं। इसमें कुछ और मानक भी शामिल हैं…देश के बाहरी संबंध: देश के दूसरे देशों के साथ संबंधों को प्रभावित करने वाली जानकारी। सुरक्षा और बल: सेना या देश की सुरक्षा से संबंधित कोई भी विषय ‘सेवा विषय’ के तहत आती है।संवेदनशील चर्चाएं: इसमें सैन्य रणनीतियों के अलावा उच्च स्तरीय बैठकें और सरकारी योजनाओं (जैसे अग्निपथ) पर होने वाली आंतरिक चर्चाएं भी शामिल हैं।अधिकारियों को कुछ विशेष स्थितियों में लिखने की स्वतंत्रता भी है। अगर कोई पुस्तक या लेख उनके काम से संबंधित नहीं है, तो उस पर ये कड़े नियम लागू नहीं होते। इसके अलावा साहित्यिक या कलात्मक प्रकृति की रचनाओं (जैसे कविता या कथा साहित्य) के लिए आमतौर पर इन प्रतिबंधों में ढील दी जाती है। जनरल नरवणे की एक अन्य किताब- द कैंटोनमेंट कॉन्सपिरेसी’ बिक्री के लिए उपलब्ध भी है। यह एक काल्पनिक उपन्यास है। इसमें एक सैनिक की कहानी को बताया गया है
न्यूज एजेंसी पीटीआई ने जनरल नरवणे की किताब के जिन अंशों को प्रकाशित किया था, उनमें पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर रेचिन ला पर्वत दर्रे पर चीन की सेना और टैंकों का जिक्र था। इन अंशों में बताया गया कि जब चीन की ओर से यह नापाक हरकत की जा रही थी, उस दौरान एमएम नरवणे ने चीन-भारत की सेना के बीच हुई तनाव की स्थिति पर रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और रक्षा कर्मचारियों के प्रमुख से बातचीत की थी। इन प्रकाशित अंशों में जनरल नरवणे के हवाले से लिखा गया था कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ फोन पर बातचीत के बाद दिमाग में कई अलग-अलग विचार दौड़ रहे थे। नरवणे ने लिखा कि मैंने रक्षा मंत्री को स्थिति की गंभीरता की जानकारी दी। साथ ही उन्होंने कहा कि उस दौरान पीएम से भी बात की थी। उन्होंने कहा था कि यह पूरी तरह से एक सैन्य निर्णय है, ‘जो उचित समझो वो करो’। साथ ही उन्होंने कहा कि मुझे अपनी इच्छानुसार कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता के साथ एक कड़ा फैसला लेने की जिम्मेदारी दी गई थी। उस दिन को याद करते हुए उन्होंने लिखा कि इसके बाद मैंने एक गहरी सांस ली और कुछ मिनटों के लिए चुपचाप बैठा रहा। दीवार घड़ी की टिक-टिक को छोड़कर सब कुछ शांत था।उन्होंने लिखा कि मैं आर्मी हाउस में था, एक दीवार पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का नक्शा था, दूसरी दीवार पर पूर्वी कमान का। वे अचिह्नित नक्शे थे, लेकिन जैसे ही मैंने उन्हें देखा, मैं प्रत्येक इकाई के स्थान की कल्पना कर सकता था। हम हर तरह से तैयार थे, लेकिन क्या मैं वास्तव में युद्ध शुरू करना चाहता था? ये सवाल मन में था। बता दें ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ में जनरल नरवणे उस रात की घटना को लेकर मन में आए विचारों का जिक्र किया। गौरतलब है कि जनरल नरवणे से पहले कई सैन्य अधिकारियों की किताबें आ चुकी हैं। इनमें पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रि.) वीपी मलिक की किताब- करगिल- फ्रॉम सरप्राइज टू विक्ट्री और पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रि.) वीके सिंह की आत्मकथा- करेज एंड कन्विक्शन, एन ऑटोबायोग्राफी शामिल हैं।इसके अलावा पूर्व सेना प्रमुख जनरल के सुंदरजी की किताब- ब्लाइंड मेन ऑफ हिंदुस्तान: इंडो-पाक न्यूक्लियर वॉर; और ऑफ सम कॉन्सिक्वेंस: अ सोल्जर रिमेम्बर्स भी सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखी गई कुछ किताबों में शामिल हैं। इसके अलावा खुद पूर्व सेना प्रमुख नरवणे का एक उपन्यास भी आया है।
