टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में हाल ही में हुई छंटनी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक कंपनी ने 12,200 कर्मचारियों की छंटनी की है. लेकिन अब इस आंकड़े पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं. मैनेजमेंट एक्सपर्ट और कंसल्टेंट देविका गौतम (Devieka Gautam) ने अपने X अकाउंट पर दावा किया है कि असलियत कहीं ज्यादा भयावह है और वास्तव में लगभग 60,000 कर्मचारी प्रभावित हुए हैं.देविका गौतम ने एक्स पर अपना परिचय BRANDxDASH.com की फाउंडर के तौर पर दिया है. उन्होंने लिखा कि रविवार की सुबह TCS के मैनेजरों को अचानक एक इमरजेंसी निर्देश मिला. संदेश में कहा गया, “अपनी टीम का 10% हिस्सा तुरंत हटाकर रि-डिप्लॉयमेंट पर डाल दो.” यह फैसला न तो परफॉर्मेंस रिव्यू पर आधारित था और न ही अप्रेज़ल चेक पर. बल्कि यह केवल ऊपरी दबाव में बनाई गई नामों की सूची थी, जिसमें कर्मचारियों का भविष्य तय कर दिया गया.देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी TCS में इन दिनों ऐसा माहौल बन गया है कि लोग ऑफिस में डर कर काम कर रहे हैं. जिन लोगों ने 10-15 साल तक कंपनी के लिए काम किया, वही अब एक झटके में बाहर किए जा रहे हैं. कोई कारण नहीं बताया जा रहा, बस अचानक बुलाकर कहा जा रहा है, या तो खुद इस्तीफा दो या फिर टर्मिनेट कर दिए जाओगे. कंपनी ने पहले कहा था कि सिर्फ 2% यानी करीब 12,000 लोगों को हटाया जाएगा, लेकिन हकीकत में ये संख्या 30,000 से भी ज्यादा हो सकती है. ऐसा कहना है कर्मचारियों और आईटी यूनियनों का, जो लगातार विरोध कर रही हैं.
सोशल मीडिया पर डाली गई पोस्ट के अनुसार, टीसीएस के कर्मचारियों के बीच चिंता की एक लहर दौड़ रही है. उनसे जबरियां इस्तीफे लिए जा रहे हैं, जिससे कंपनी के अंदर तनाव और अनिश्चितता का माहौल बढ़ता जा रहा है. कर्मचारी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं. एक कर्मचारी ने सोशल मीडिया पर अपना दुख जताते हुए लिखा कि पहले तो उन पर दबाव डाला गया और फिर टर्मिनेट कर दिया गया. फिलहाल ये कर्मचारी अब बेरोजगार हैं और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.टीसीएस के पूर्व कर्मचारी ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘तीन दिन पहले मुझसे एक मीटिंग रूमें रिजाइन करने के लिए कहा गया. मैंने इनकार कर दिया और डर के मारे रोने लगा. लेकिन, टीसीएस मेरी पहली कंपनी है और मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था. उन्होंने मुझे धमकाया कि अगर खुद से रिजाइन नहीं किया तो वे टर्मिनेट कर देंगे और मेरा रिव्यू भी खराब कर देंगे. मैंने साफ कहा कि आपको जो करना है कर लीजिए, लेकिन मैं रिजाइन करने नहीं जा रहा. इसके साथ ही मीटिंग रूम से बाहर आ गया. मैं डरा हुआ था, रो रहा था लेकिन उस समय मजबूती के साथ अपने फैसले पर अड़ा रहा.’
आईटी कर्मचारियों के संगठन ने टीसीएस के इस कदम की आलोचना की है और देशभर में इसका विरोध किया जा रहा है. संगठन का कहना है कि इस छंटनी का 30 हजार कर्मचारियों पर असर पड़ेगा. इस विरोध को केंद्रीय ट्रेड यूनियन का भी साथ मिल रहा है और सरकार से मामले में दखल देने की अपील की गई है. संगठन ने चिंता जताई है कि कंपनी ने सिर्फ 12 हजार की छंटनी की बात कही थी, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है.
किन वजहों से किया गया बाहर?
छंटनी की प्रक्रिया में सिर्फ कमजोर प्रदर्शन करने वाले ही नहीं, बल्कि कई अन्य श्रेणियों के कर्मचारी भी शिकार बने. जो कर्मचारी नई भूमिकाओं की मांग कर रहे थे, उन्हें उनकी महत्वाकांक्षा की सजा दी गई. जो लीडरशिप से असहमति जताते थे, उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. यहां तक कि सपोर्ट रोल में काम करने वाले कर्मचारियों को भी बेकार समझकर हटा दिया गया.प्रबंधन ने इस छंटनी को सही ठहराने के लिए कई कारण गिनाए, लेकिन देविका गौतम ने उन्हें झूठा बताया. उनका कहना है कि “स्किल गैप” का तर्क बेबुनियाद है, क्योंकि सभी कर्मचारियों को समान ट्रेनिंग, कोर्स और सर्टिफिकेशन दिए गए थे. नो बिलेबल रोल्स (No billable roles) की बात भी सही नहीं है, क्योंकि हज़ारों रेवेन्यू जेनरेट करने वाले पद खाली थे, लेकिन सिस्टम पर आर्टिफिशियल रोक लगाकर कर्मचारियों की अलोकेशन रोक दी गई. फ्यूचर-रेडी ऑर्गनाइजेशन का दावा भी संदिग्ध है, क्योंकि अगर ट्रेनिंग, स्किल और लोग वही हैं, तो फर्क सिर्फ इतना है कि अब लगभग 60,000 कर्मचारी कम हो गए हैं.
सबसे बड़ा विरोधाभास कंपनी के CEO के बयानों में सामने आया है. पिछली तिमाही में CEO ने स्पष्ट कहा था, “हम छंटनी नहीं करेंगे. हम नेशन बिल्डर्स हैं. हम सामाजिक रूप से जिम्मेदार हैं.” लेकिन मौजूदा तिमाही की हकीकत में हजारों परिवार इस वादे से असहमत नज़र आ रहे हैं.देविका गौतम का कहना है कि यह न तो पुनर्गठन है, न ऑप्टिमाइजेशन और न ही भविष्य की तैयारी. यह केवल एक नंबर्स गेम है, जिसमें इंसान सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं. उन्होंने बताया कि कंपनियां ऐसी स्थितियां बनाने के लिए एक तयशुदा प्लेबुक का इस्तेमाल करती हैं. पहले झूठा आपातकाल पैदा किया जाता है, फिर जिम्मेदारी मैनेजरों में बांटी जाती है, उसके बाद PR के जरिए नैरेटिव कंट्रोल किया जाता है और अंत में बाहरी कारकों जैसे युद्ध या बाज़ार की परिस्थितियों को दोष दिया जाता है.इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि TCS ने मुनाफे को इंसानों से ऊपर रखा. और यह सिर्फ TCS तक सीमित नहीं है. आज कई कंपनियों में यही फॉर्मूला अपनाया जा रहा है. असली सवाल यह है कि अगली बारी किसकी होगी?देविका गौतम की पोस्ट पर किसी ने ग्रोक से पूछा कि क्या ये सही बात है? इस पर ग्रोक ने रिप्लाई किया और कहा कि आधिकारिक तौर पर 12,000 लोगों की छंटनी किए जाने की खबर सामने आई है. ग्रोक ने कहा- हालांकि कई यूनियन और रिपोर्ट्स छंटनियों का नंबर 30,000 तक होने का दावा कर रही हैं. चर्चाएं है कि 50,000 से 60,000 कर्मचारियों की छंटनी हुई हो सकती है, लेकिन इसमें आधिकारिक पुष्टि नहीं है.
मनी कंट्रोल की एक खबर के मुताबिक, पुणे के एक TCS कर्मचारी, जिन्होंने नाम ना बताने की शर्त पर अपनी कहानी बताई, उन्होंने बताया कि कैसे 13 साल तक TCS में काम करने के बाद भी उन्हें बाहर कर दिया गया. उन्होंने कहा, मेरे प्रोजेक्ट खत्म हो गया था, फिर नया काम नहीं मिल रहा था. मैंने अलग-अलग टीमों से बात की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. HR और RMG बार-बार फोन करके पूछताछ करते थे. यहां तक कि मुझ पर झूठा आरोप लगाया गया कि मैं दूसरी कंपनी में भी काम कर रहा हूं. आखिर में उन्हें जबरन इस्तीफा देने को कहा गया. जब मैने मना किया, तो उन्हें सीधे टर्मिनेट कर दिया गया. ऊपर से 6-8 लाख रुपये की रिकवरी भी मांगी गई, जिसमें से आधा मैने खुद चुकाया. आज मैं अपने दोस्त के घर पर रह रहा हूं. पत्नी और बच्चे गांव में हैं. उन्हें सच तक नहीं बता पाया.’ इनसे जैसे हजारो कर्मचारी भी अपनी नौकरी को लेकर डर कर काम कर रहे हैं. कब किसी नंबर आ जाए किसी को नहीं पता.कई कर्मचारियों ने बताया कि कंपनी के मैनेजरों के पास एक ‘फ्लूइडिटी लिस्ट’ होती है, जिसमें उन लोगों के नाम होते हैं जिन्हें हटाना है. ये लिस्ट ना तो स्किल के आधार पर बनती है, ना अनुभव के. कई ऐसे लोग भी इस लिस्ट में हैं जिनके पास जरूरी स्किल हैं, जिन्होंने इंटरव्यू पास किया, फिर भी उन्हें प्रोजेक्ट नहीं दिया जा रहा. एक अन्य कर्मचारी ने बताया अगर आपका नाम उस लिस्ट में आ गया, तो फिर आप चाहें जितना मेहनत कर लें, कोई काम नहीं मिलेगा. HR पीछे लग जाती है और कहती है , खुद से इस्तीफा दो वरना टर्मिनेट कर देंगे.
कहीं और नौकरी नहीं मिलने का है डर
कई लोग सामने आकर अपनी बात इसलिए नहीं कह पा रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि कंपनी के खिलाफ जाने पर कोई और नौकरी नहीं मिलेगी. और अगर कोर्ट में केस करें, तो सालों तक लड़ाई चलेगी पैसा, समय और मानसिक तनाव सब अलग. एक दूसरे कर्मचारी ने बताया , कंपनी क्लाइंट्स से झूठ बोल देती है कि ये कर्मचारी बीमार है या फैमिली इश्यू है, जबकि सच में वो उसे प्रोजेक्ट से हटा रही होती है.
यूनियन ने कहा कंपनी ने भरोसा तोड़ा
वहीं IT सेक्टर की कई यूनियनें जैसे FITE, UNITE, AIITEU खुलकर कह रही हैं कि TCS गलत तरीके से लोगों को निकाल रही है. FITE के सेक्रेटरी प्रशांत पंडित ने कहा, 30-35 साल पुराने कर्मचारी जो रिटायरमेंट के करीब थे, उन्हें सिर्फ 30 मिनट में बाहर कर दिया गया. UNITE के महासचिव अलगुनांबी वेल्किन ने बताया कि, कुछ लोग जिनके पास अभी भी प्रोजेक्ट था, उन्हें गलत तरीके से ‘बेंच’ पर डाल दिया गया. बाद में जब उन्होंने नया प्रोजेक्ट ढूंढा, तो उन्हें RMG और HR ने उसमें भी नहीं जाने दिया.
नई पॉलिसी से और बढ़ा डर
जून 2025 में TCS ने एक नई नीति लागू की जिसमें कहा गया कि हर कर्मचारी को साल में कम से कम 225 दिन ‘बिलेबल’ यानी प्रोजेक्ट में एक्टिव रहना होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो नौकरी पर असर पड़ेगा. इसके अलावा, अब कोई कर्मचारी 35 दिन से ज्यादा बेंच पर नहीं रह सकता. पहले RMG प्रोजेक्ट अलॉट करती थी, अब कर्मचारियों को खुद दौड़ लगानी पड़ती है.
