नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उत्तराखंड राज्य चुनाव आयोग की उस चुनौती को खारिज कर दिया, जो उसने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की थी। हाई कोर्ट ने आयोग के उस स्पष्टीकरण वाले सर्कुलर पर रोक लगाई थी, जिसमें कहा गया था कि जिन उम्मीदवारों के नाम कई मतदाता सूचियों में दर्ज हैं, वे पंचायत चुनाव लड़ सकते हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश पारित किया और SEC पर 2 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। जस्टिस नाथ ने आयोग के वकील से सवाल किया कि आप कैसे वैधानिक प्रावधान के विपरीत निर्णय ले सकते हैं? हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में बताया गया था कि कई मामलों में ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने की अनुमति दी जा रही थी, जिनके नाम एक से अधिक मतदाता सूचियों में शामिल थे।SEC के स्पष्टीकरण में कहा गया था कि किसी उम्मीदवार का नाम एक से अधिक ग्राम पंचायत/क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र/नगर निकाय की मतदाता सूची में दर्ज होने के आधार पर उसका नामांकन पत्र निरस्त नहीं किया जाएगा। हाई कोर्ट ने उपलब्ध सामग्री का अध्ययन करने के बाद यह पाया कि यह स्पष्टीकरण उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 का उल्लंघन प्रतीत होता है। अदालत ने कहा कि यह अधिनियम की धारा 9(6) और 9(7) के विपरीत है।हाई कोर्ट का कहना था कि जब क़ानून स्पष्ट रूप से यह रोक लगाता है कि किसी मतदाता का नाम एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों या मतदाता सूचियों में दर्ज नहीं हो सकता और यह वैधानिक प्रतिबंध है, तो राज्य चुनाव आयोग द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण इस प्रतिबंध के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होता है। इसलिए हाई कोर्ट ने उस परिपत्र पर रोक लगाई और निर्देश दिया कि उस पर कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी। इसी आदेश के खिलाफSEC ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।
आयोग ने हाई कोर्ट के इस साल जुलाई में दिए आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि स्पष्टीकरण प्रथम ²ष्ट्या उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 के विपरीत है। याचिकाकर्ता आयोग ने हाई कोर्ट में कहा था कि ऐसे अनगिनत मामले हैं, जिसमें प्रत्याशियों के नाम कई मतदाता सूचियों में पाए गए और उनको चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई।चुनाव निकाय ने स्पष्टीकरण दिया था कि किसी प्रत्याशी का नामांकन केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जाएगा कि उसका नाम एक से ज्यादा ग्राम पंचायतों, प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र या नगर पालिका निकाय में दर्ज है। इसमें 2016 के अधिनियम की धारा 9 और उप-धारा (6) और (7) को आधार भी बनाया गया था।उप-धारा (6) कहती है कि कोई भी व्यक्ति एक से अधिक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के लिए मतदाता सूची में या एक ही प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के लिए मतदाता सूची में एक से अधिक बार पंजीकृत होने का हकदार नहीं होगा।उप-धारा (7) में लिखा है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत या छावनी के संबंधित किसी भी मतदाता सूची में दर्ज है, तो उसे किसी भी प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के लिए मतदाता सूची में शामिल होने का हक नहीं होगा, जब तक कि वह ये न दिखा दे कि उसका नाम ऐसी वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है।उच्च न्यायालय ने कहा कि जब कानून में एक से अधिक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र या एक से अधिक मतदाता सूची में मतदाता के पंजीकरण पर स्पष्ट रूप से रोक लगाई गई है और यह एक वैधानिक रोक है। ऐसे में आयोग का दिया गया स्पष्टीकरण धारा 9 की उपधारा (6) और (7) के तहत रोक के उलट नजर आता है।
