लोकसभा में मंगलवार को विपक्ष स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाया। 50 से ज्यादा सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। इसके बाद पीठासीन ने प्रस्ताव पेश करने की परमिशन दे दी। विपक्ष ने ओम बिरला पर सदन की कार्यवाही में पक्षपात करने का आरोप लगाया है।बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने की। उन्होंने कहा कि बजट सत्र के दौरान 20 बार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को रोका-टोका गया। उन्हें बार बार रूलिंग बुक दिखाई गई।उन्होंने अपनी स्पीच में एक आर्टिकल का हवाला दिया। इस पर उन्हें मना किया गया, लेकिन सत्ता पक्ष के सांसदों ने भारत में बैन किताबें सदन में दिखाईं। उनसे कुछ नहीं कहा गया। इस तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं है।
गोगोई बोले- बिरला बोलने नहीं देते, माइक बंद किया
2 फरवरी को नेता विपक्ष राहुल गांधी जब बोल रहे थे, तब उन्हें बार-बार रोका गया। स्पीकर सर ने उनके तर्क पर सबूत देने का कहा।
9 फरवरी को शशि थरूर जब बोल रहे थे, तब उनका माइक बंद कर दिया गया। सरकार ने कहा कि बोलिए, लेकिन हम कैसे बोल सकते हैं जब माइक ऑफ किया गया हो। संसद में ऐसी नई-नई चीजें हो रही हैं।
आज महिला सांसदों के उद्देश्य पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ओम बिरला जी ने पीएम मोदी के समय कहा था कि महिला सांसदों ने पीएम की चेयर घेर ली है। उनके साथ कुछ भी हो सकता था। ये बहुत ही शर्मनाक बात है। बिरला ने किस आधार पर महिला सांसदों पर ये आरोप लगाए।
रिजिजू ने कहा- सेशन के दौरान राहुल विदेश चले जाते हैं
संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने कहा- इन लोगों ने पहले आरोप लगाया कि LoP को बोलने नहीं दिया जाता है। मैं कहता हूं 15वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष केवल 2 बार बोले। जब सेशन चलता है, तो विदेश चले जाते हैं। नेता प्रतिपक्ष अपनी बात बोल के सदन से भाग जाते हैं। किसी और की बात नहीं सुनते हैं। फिर कहते हैं कि मुझे बोलने नहीं दिया जाता है।पहली बार मैंने ऐसा दृश्य देखा कि नेता प्रतिपक्ष पीएम को गले लगा रहा है। अपनी सीट पर बैठकर अपने सांसद को आंख मारता है। जैसा लीडर है तो बाकी के सांसद भी वैसे ही होंगे। मेंबर चेयर को यार कहते हैं। फिर कहतें हैं कि इसमें गलत क्या है (वेणुगोपाल ने चेयर को यार कहा था।प्रियंका को LoP बनाते तो कुछ अच्छा होता। देखिए प्रियंका हंस रही हैं। जो अच्छा व्यवहार करे तो उसकी सराहना करनी चाहिए। विपक्ष ने हंगामा किया। रिजिजू बोले- मैंने अच्छा बोला है। कांग्रेस क्यों नाराज हो रही है।
प्रियंका ने कहा- राहुल की सच्चाई इनसे पचती ही नहीं है
प्रियंका गांधी ने कहा कि एक ही व्यक्ति है इस देश में जो इन 12 सालों में इनके सामने झुका नहीं। वह नेता प्रतिपक्ष है। और वो नेता प्रतिपक्ष इस सदन में खड़े होके इनके सामने सच बोल देते हैं। सच्चाई वो जो बोलते हैं वह इनसे पचती नहीं है।
महुआ मोइत्रा ने कहा- बिरला ने विपक्षी सांसदों का सबसे बड़ा सस्पेंशन किया था
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि दिसंबर 2023 में स्पीकर ओम बिरला ने भारतीय पार्लियमेंट के इतिहास का सबसे बड़ा सस्पेंशन दिया, जिसमें विपक्ष के 100 सांसदों को सस्पेंड किया गया था। ये 2004 से हुए सस्पेंशन का 40% था। पिछले 20 साल में इस एक दिन में सदन के 40% सांसद सस्पेंड किए गए थे। ऐसा क्यों किया गया था क्योंकि संसद में घुसपैठ पर विपक्ष सरकार से जबाव मांग रहा था। क्या ये जरूरी मुद्दा नहीं था।
विपक्ष ने डिप्टी स्पीकर को नियुक्त न करने पर सवाल उठाया
कार्यवाही के दौरान कांग्रेस ने स्पीकर की गैर-मौजूदगी में डिप्टी स्पीकर नियुक्त न करने पर सवाल उठाए। कहा कि चेयर पर बैठे जगदंबिका पाल कैसे इस दौरान कार्यवाही चला सकते हैं। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि देश का नेतृत्व कमकोर और बुजदिल है।डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष को देने की परंपरा रही है। 16वीं लोकसभा में NDA में शामिल रहे अन्नाद्रमुक के थंबीदुरई को यह पद दिया गया था, जबकि, 17वीं और 18वीं लोकसभा में किसी को भी डिप्टी स्पीकर नहीं बनाया गया।
सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने नियमों का हवाला देते हुए पॉइंट ऑफ ऑर्डर उठाया और कहा कि जब स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा हो रही हो, तब स्पीकर को कार्यवाही की अध्यक्षता करने का अधिकार नहीं होता। उन्होंने कहा कि अभी तक डिप्टी स्पीकर नियुक्त नहीं किया गया है और जो व्यक्ति चेयर पर बैठे हैं, वे भी स्पीकर की मंजूरी से ही आए हैं, इसलिए वे इस प्रस्ताव पर कार्यवाही नहीं चला सकते। उन्होंने मांग की कि बहस शुरू करने से पहले सदन की सहमति से तय किया जाए कि कार्यवाही की अध्यक्षता कौन करेगा।निशिकांत दुबे ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि नियमों के अनुसार चेयर पर बैठा कोई भी व्यक्ति स्पीकर जैसी शक्तियां रखता है और वह कार्यवाही की अध्यक्षता कर सकता है। किरेन रिजिजू ने भी इस बात का समर्थन किया।केसी वेणुगोपाल ने सरकार पर डिप्टी स्पीकर नियुक्त न करने को लेकर हमला बोला और कहा कि बहस शुरू होने से पहले सदन की सहमति ली जानी चाहिए। इसके बाद रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि चेयर पर बैठे व्यक्ति को कार्यवाही चलाने का पूरा अधिकार है।आखिर में चेयर पर बैठे जगदंबिका पाल ने कहा कि स्पीकर का पद खाली नहीं है, इसलिए उन्हें कार्यवाही चलाने का अधिकार है। कई सदस्यों ने पॉइंट ऑफ ऑर्डर उठाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें बाद में मौका दिया जाएगा।
किरेन रिजिजू ने कहा- हमें गर्व है कि स्पीकर ओम बिरला हैं
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि कुछ लोग खुद को संविधान के ऊपर समझते हैं। खुद को ज्यादा ज्ञानी समझते हैं। राहुल गांधी ने कहा था कि मुझे इस सदन में बोलने नहीं दिया जाता। कांग्रेस में कई सीनियर लीडर हैं। उन्होंने राहुल को क्यों नहीं समझाया है। सदन में बोलने के लिए स्पीकर की परमिशन की जरूरत है। उसके बिना नहीं बोल सकते हैं। आप अपने आपको स्पीकर से बड़ा समझेंगे तो ये गलत है। हमें गर्व है कि हम उस लोकसभा के सदस्य हैं, जिसके स्पीकर ओम बिरला हैं। 64 देशों का फ्रेंडशिप ग्रुप बनाया है, इसकी अध्यक्षा ओम बिरला कर रहे हैं। पीएम मोदी का मार्गदर्शन है। विपक्ष ने निजी टिप्पणी की है। 18वीं लोकसभा में 93% से ज्यादा प्रोडक्टिविटी है। 321 सवाल पूछने का मौका सत्ता पक्ष को दिए हैं। 362 सवाल पूछने का मौका विपक्ष को दिया है स्पीकर सर ने।
अविश्वास प्रस्ताव के बीच गर्माया डिप्टी स्पीकर नियुक्त न करने का मुद्दा
लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान एक बार फिर डिप्टी स्पीकर नियुक्त न किए जाने का मुद्दा गर्मा गया।दो साल पहले भी यह मामला उठा था, जब ओम बिरला को लगातार दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष चुना गया था।सरकार डिप्टी स्पीकर चुनाव क्यों नहीं करा रही इसको लेकर दावा किया जा रहा है कि 17वीं लोकसभा (2019-2024) में केंद्र की भाजपा सरकार के पास 303 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत था, जिसके कारण सरकार को विपक्ष के साथ समझौता करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। विपक्षी नेताओं के मुताबिक सरकार ने जानबूझकर यह पद खाली रखा। क्योंकि इसे विपक्ष को देना पड़ता, विशेष रूप से कांग्रेस को जो सरकार की प्राथमिकता नहीं थी।18वीं लोकसभा (2024-वर्तमान) में भी यही स्थिति बनी। भाजपा के पास 240 सीटें हैं। NDA गठबंधन के पास 293 सीटें हैं, जो बहुमत से अधिक हैं। इसके बावजूद सरकार ने विपक्ष की मांग को नहीं स्वीकारा।लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बन पाई थी। क्योंकि विपक्ष ने स्पीकर के लिए NDA उम्मीदवार को समर्थन देने की शर्त में डिप्टी स्पीकर का पद मांगा था।
जगदंबिका पाल ने गोगोई से कहा- प्रस्ताव कुछ और आरोप कुछ ओर लगा रहे
जगदंबिका पाल ने बहस के दौरान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई को टोका। कहा कि देश ये भी देख रहा है कि प्रस्ताव कुछ और है। आरोप कुछ और हैं, जो विषय उससे नहीं जुड़ा है आप लगातार उस पर बोल रहे हैं। हमारे पीएम एक बिजनेसमैन के खिलाफ एक केस चल रहा है उसे लेकर दवाब में थे, या फिर एपस्टीन फाइल में आए नामों को लेकर दवाब में थे।जगदंबिका पाल: देश ये भी देख रहा है कि प्रस्ताव कुछ और है। आरोप कुछ और हैं, जो विषय उससे नहीं जुड़ा है आप लगातार उस पर बोल रहे हैं।गौरव गोगोई: ऐसा तब भी हुआ जब राहुल गांधी बोल रहे थे। स्पीकर ने आधिकारिक दस्तावेज मांगे। वे मान गए। जैसे ही वो आगे आए ट्रेजरी बेंच से सारे मंत्री खड़े हो गए। उन्हें लगातार टोका गया। क्या वो नहीं चाहते कि वो सेना के बारे में जो कहें वो रिकॉर्ड में जाए।एक पूर्व आर्मी चीफ की बात को रख रहे हैं तो गंभीरता से रख रहे होंगे। क्या उनकी किताब पब्लिश नहीं हुई तो उनकी आवाज झूठी है। गलत है। जगदंबिका पाल: आप आज क्या कह रहे हैं। जो सदन का सदस्य नहीं उसका रिफरेंस दे रहे हैं। स्पीकर पर आरोप लगाए हैं उस पर क्यों नहीं बोलते। गौरव गोगोई: जब राहुल गांधी यह बात उठा रहे थे। सत्ता पक्ष से विरोध हो रहा था। उस वक्त संचालन स्पीकर कर रहे थे। इसलिए यह मोशन जब हम ला रहे हैं कि नेता विपक्ष को मौका नहीं मिलता, उसी बात को हम उठा रहे हैं। जगदंबिका पाल: आप खुद कह रहे हैं किताब पब्लिश नहीं है। यानी वह पब्लिक डोमेन में नहीं है। इसके बाद पीठासीन पाल ने लोकसभा की कार्यवाही 2 बजे तक स्थगित कर दी।
गौरव गोगोई ने कहा- जब LOP खड़े हुए बोलने नहीं दिया गया
गौरव गोगोई ने कहा, हमने देखा जब LOP खड़े हुए बोलने के लिए तब 20 बार उन्हें टोका गया। गृह मंत्री, संसदीय मंत्री, रक्षा मंत्री बार बार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान बोलने से रोका गया। वे केवल यह कहना चाहते थे कि जब सेना को देश के नेता की जरूरत थी तब उन्होंने कहा था कि जो करना है कर लो। उन्होंने कहा कि जो हम कह रहे हैं कि स्पीकर ने नेता विपक्ष को बोलने नहीं दिया। उन्हें बार बार टोका गया। वे कहते रहे कि जब देश की सीमा पर खतरा था, जब सेना को रक्षामंत्री और पीएम की जरूरत थी। तब उन्होंने तत्परता नहीं दिखाई। उन्हें घंटों रुकना पड़ा। हमारी सेना अनुशासित है, वह राजनैतिक लीडरशिप को देखती है। टैंक आ रहे थे। सेना गुहार लगा रही थी कि हमें बताएं क्या करना है। लीडरशिप कहती है जो करना है कर लो। मैं कहूंगा कि देश का नेतृत्व कमजोर है। बुजदिल है। जगदंबिका पाल ने कहा- यह मोशन स्पीकर के खिलाफ है आप वहीं तक सीमित रहेंगे। किरेन रिजिजू- मेरा अनुरोध है कि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है। लेकिन आप उससे ऊपर नेतृत्व तक चले गए हैं। इसलिए जब हम बोलेंगे तो आपको सुनना पड़ेगा। गौरव ने कहा-जब भविष्य में यह देखा जाएगा कि संसद में सबसे ज्यादा व्यवधान किरेन रिजिजू ने ही किया।
गौरव गोगोई ने पाल से कहा- आप चेयर पर बैठेंगे यह किसने तय किया
गौरव गोगोई ने कहा ने कहा, रेबिया केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो स्पीकर और उसकी चेयर पर बैठने वाला पक्षपात नहीं करेगा। चर्चा की शुरुआत में आर्टिकल 96 से हुई। इसमें लिखा है कि अविश्वास प्रस्ताव के दौरान स्पीकर चेयर पर नहीं बैठ सकता। मैं पूछना चाहता हूं कि स्पीकर ने एक पैनल बनाया उसमें से कौन कौन चेयर पर बैठेगा, यह कैसे तय होगा। इसमें आपका नाम भी है कि आप स्पीकर की गैरमौजूदगी में स्पीकर की चेयर पर बैठेंगे यह किसने तय किया।
जगदंबिका पाल ने कहा कि स्पीकर के ऑफिस को यह पावर है कि वे तय कर सकते हैं कि चेयरपर्सन पैनल में कौन होगा।अमित शाह ने बीच में टोका और कहा- सदन जब चुनाव में जाता है तब भी स्पीकर का ऑफिस चालू रहता है। यह पद खाली नहीं रहता है। गोगोई जो गलत मतलब निकाल रहे हैं मैं उसका खंडन करने के लिए खड़ा हुआ हूं।जगदंबिका पाल ने कहा कि अगर हाउस डिसॉल्व भी हो जाता है तब भी स्पीकर का ऑफिस चालू रहता है। गौरव ने कहा- सदन के अंदर पहले भी तीन बार अविश्वास प्रस्ताव आया है। जब यह हुआ तब डिप्टी स्पीकर चेयर पर थे। आज विपक्ष के 200 सांसद होने के बावजूद यहां डिप्टी स्पीकर नहीं है। देश को पता चलना चाहिए कि सदन कैसे चल रहा है। माइक भी अस्त्र बन गया है। यह सुविधा के अनुसार सत्ता पक्ष को दिया जाता है। जबकि विपक्ष के नेता को बोलने ही नहीं दिया जाता।
संसद के नियमों का उल्लंघन हो रहा है। यह रेजोलयूशन किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। हमें खुशी नहीं है कि हम इसे लाए। क्योंकि ओम बिरला का हर किसी के साथ निजी तौर पर बहुत अच्छा है। लेकिन हम मजबूर हैं कि हमें यह प्रस्ताव लाना पड़ रहा है। लेकिन हमारा धर्म है संसद की मर्यादा को बचाना। क्योंकि हर सदस्य का कर्तव्य है कि संसद की गरिमा मर्यादा कानून को बचाए। यह निजी हमला नहीं है। देश के लोगों का विश्वास लोकतंत्र में कायम रहे इसलिए हम अविश्वास प्रस्ताव लाए हैं। पीएम खुद कहते हैं कि यह लोकतंत्र का मंदिर है। इसका दरवाजा हर तबके के सदस्य के लिए खुला है। यहां बाबा साहेब ने लोकसभा स्पीकर के दायरे के बारे में कहा है कि संवैधानिक नैतिकता की मांग है कि पक्षपात रहित होना चाहिए।
लोकसभा स्पीकर के खिलाफ जो प्रस्ताव लाया जाता है, उसे सामान्य भाषा में अविश्वास प्रस्ताव कहा जाता है, लेकिन तकनीकी रूप से यह ‘हटाने का प्रस्ताव’ होता है. यह प्रस्ताव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत लाया जाता है. इसका मतलब यह है कि यदि लोकसभा के सदस्य मानते हैं कि स्पीकर अपने पद की जिम्मेदारियों को निष्पक्षता से नहीं निभा रहे हैं, तो वे उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव ला सकते हैं. यह प्रक्रिया सरकार के खिलाफ लाए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव से पूरी तरह अलग होती है.भारतीय संविधान का अनुच्छेद 94 लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद से हटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है. इसके अनुसार लोकसभा स्पीकर को तीन परिस्थितियों में पद छोड़ना पड़ सकता है. पहला यदि वह लोकसभा के सदस्य नहीं रहते हैं. दूसरा यदि वे स्वयं इस्तीफा दे दें. तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण यदि लोकसभा के वर्तमान सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा उन्हें पद से हटा दिया जाए. यही वह संवैधानिक प्रावधान है जिसके आधार पर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव लाया जाता है.स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव लाने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया तय है. सबसे पहले कम से कम 14 दिन पहले लिखित नोटिस देना अनिवार्य होता है. इस नोटिस पर कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए. नोटिस मिलने के बाद जब सदन में इस प्रस्ताव को पेश किया जाता है तो चेयर पूछता है कि कितने सदस्य इसके समर्थन में हैं. यदि उस समय कम से कम 50 सांसद खड़े हो जाते हैं, तो प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है और उस पर चर्चा शुरू होती है. इसके बाद मतदान की प्रक्रिया होती है.कर को हटाने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती. इसके लिए साधारण बहुमत ही पर्याप्त होता है. यानी उस समय सदन में जितने सांसद मौजूद हों और मतदान कर रहे हों, उनमें से आधे से एक अधिक सांसदों का समर्थन मिलना जरूरी है. उदाहरण के तौर पर यदि उस समय 500 सांसद मौजूद हैं और मतदान कर रहे हैं, तो प्रस्ताव पास होने के लिए कम से कम 251 सांसदों का समर्थन चाहिए.जब स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा होनी होती है, तब स्पीकर खुद सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते. उस दिन सदन की कार्यवाही डिप्टी स्पीकर या किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा संचालित की जाती है. यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से पूरी हो सके और स्पीकर स्वयं उस प्रक्रिया का हिस्सा न बनें जिसमें उनके पद पर सवाल उठाए जा रहे हों.
कैसे हटाए जा सकते हैं स्पीकर
नियमों के अनुसार, नोटिस मिलने की तारीख से कम त्ते कम 14 दिन बाद किसी दिन सदन की कार्यसूची में शामिल किया जाता है। इसके बाद सदन में प्रस्ताव रखा जाता है और इसके समर्थन में कम से कम 50 सांसदों का खड़े होना जरूरी होता है। आवश्यक समर्थन मिल जाता है, तो प्रस्ताव पर सदन में बहस होती है और इसके बाद वोटिंग कराई जाती है। बहुमत से प्रस्ताव पारित होने की स्थिति में ही स्पीकर को पद से हटाया जा सकता है।
1947 में आजादी मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव बहुत कम बार लाया गया है. अब तक तीन स्पीकर जीवी मावलंकर, सरदार हुकुम सिंह और बलराम जाखड़ के खिलाफ विपक्ष ने प्रस्ताव पेश किया था. हालांकि हर बार विपक्ष को सफलता नहीं मिली और प्रस्ताव गिर गया. मौजूदा प्रस्ताव को मिलाकर यह चौथा मौका है जब स्पीकर के खिलाफ ऐसा कदम उठाया गया है.
कब-कब लाया गया अविश्वास प्रस्ताव?
इससे पहले तीन ऐसे मौके आए जब लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाया गया. सबसे पहले पहली लोकसभा के दौरान देश के पहले लोकसभा अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर के खिलाफ़ प्रस्ताव लाया गया. 18 दिसंबर 1954 को गया उत्तर लोकसभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के सांसद विज्ञेश्वर मिश्र ने प्रस्ताव पेश किया. प्रस्ताव पर बहस के लिए दो घंटे का समय आवंटित किया गया था, हालांकि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने और समय दिए जाने की वकालत की थी. बहस में नेहरू के अलावा आचार्य कृपलानी , ए के गोपालन , सरदार हुकुम सिंह और एस एस मोरे जैसे नेताओं ने हिस्सा लिया. बहस के बाद प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज़ कर दिया गया. बहस में लोकसभा अध्यक्ष मावलंकर ने हिस्सा नहीं लिया था.
सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ लाया गया था अविश्वास प्रस्ताव
दूसरा मौक़ा आया 24 नवंबर 1966 को जब बिहार के ही मुंगेर लोकसभा क्षेत्र से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सांसद मधु लिमये ने लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव पेश किया. हालांकि लोकसभा में प्रस्ताव पेश करने के लिए आवश्यक 50 वोटों की कमी के चलते उन्हें अनुमति नहीं मिल सकी और प्रस्ताव पेश ही नहीं हो सका था. प्रस्ताव के समर्थन में केवल 22 सांसदों ने ही अपने हाथ खड़े किए. प्रस्ताव को राम मनोहर लोहिया जैसे दिग्गज समाजवादी सांसद ने भी समर्थन दिया था.
बलराम जाखड़ के खिलाफ लाया गया था अविश्वास प्रस्ताव
तीसरी बार 15 अप्रैल 1987 को तबके लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ़ प्रस्ताव लाया गया. पश्चिम बंगाल के बोलपुर लोकसभा क्षेत्र से सीपीएम के सांसद सोमनाथ चटर्जी ने प्रस्ताव पेश किया था. प्रस्ताव पर दो घंटे से थोड़ी ज़्यादा बहस की गई लेकिन संख्या बल की कमी के चलते ये प्रस्ताव भी पारित नहीं हो पाया. इस बहस में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अलावा सोमनाथ चटर्जी , पी चिदंबरम , मधु दंडवते और के सुरेश जैसे नेताओं ने हिस्सा लिया. इनमें के सुरेश आज भी कांग्रेस के लोकसभा सांसद हैं जबकि पी चिदंबरम राज्यसभा सांसद. बहस में लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ ने हिस्सा नहीं लिया था.
ओम बिरला से पहले राज्यसभा में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ विपक्ष लेकर आई थी अविश्वास प्रस्ताव
संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में हंगामा जारी है। सदन की कार्यवाही 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। विपक्षी पार्टियां लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने न देने के मामले के मुद्दे पर स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। विपक्षी नेता आज लोकसभा सचिवालय को 118 सांसदों द्वारा हस्ताक्षर किया गया नोटिस सौंपा गया। एक साल पहले उच्च सदन यानी राज्यसभा में विपक्षी नेता तत्कालीन सभापति व पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे। लेकिन, प्रस्ताव को उप सभापति हरिवंश ने खारिज कर दिया गया था।
विपक्ष क्यों लेकर आई थी अविश्वास प्रस्ताव
साल 2024 में संसद के शीताकालीन सत्र के दौरान विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। प्रस्ताव को लेकर विपक्षी नेताओं ने राज्यसभा के जनरल सेक्रेटरी पीसी मोदी को धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस भी दिया था। उन्होंने धनखड़ पर आरोप लगाया था कि वह उच्च सदन में विपक्षी सांसदों के साथ स्कूल के प्रिंसिपल के जैसा व्यवहार करते हैं। कई बार विपक्षी सांसदों के साथ उनका बर्ताव बेहद बुरा होता है। वह सांसदों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हैं।प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विपक्षी नेताओं ने कहा कि अगर विपक्ष का सांसद 5 मिनट भाषण दे तो सभापति उस पर 10 मिनट तक टिप्पणी करते हैं। धनखड़ सदन के भीतर विपक्ष के नेताओं को चेयर के विरोधी के तौर पर देखते हैं। इसलिए हम उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने को मजूबर हुए। इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने कहा कि आमतौर पर विपक्ष उच्च सदन के सभापति से प्रोटेक्शन मांगता है, यदि सभापति ही प्रधानमंत्री और सत्ता पक्षा का गुणगान करेंगे तो विपक्ष की कौन सुनेगा।
ओम बिरला के मामले में क्या हुआ?
संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) के तहत विपक्ष लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई है। विपक्ष के कुल 118 सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। ओम बिरला को लेकर प्रियंका गांधी ने कहा कि स्पीकर साहब का खुद निरादर किया गया है। स्पीकर साहब पर दबाव है कि उनको खुद बयान देना पड़ रहा है जो सही नहीं है। सवाल ही नहीं उठता कि पीएम पर कोई हमला करे। सरकार द्वारा उन पर दबाव डाला गया है इसलिए उन्होंने ये कहा है क्योंकि उस दिन पीएम मोदी की हिम्मत नहीं हुई सदन में आने की। इसलिए स्पीकर सफाई दे रहे हैं, ये गलत बात है।
जब स्पीकर के खिलाफ पहली बार आया था अविश्वास प्रस्ताव, कांग्रेस सांसदों से नेहरू ने कही थी ये बात
सर्दी से देश की राजधानी भले ठिठुर रही हो लेकिन संसद में चल रहे शीतकालीन सत्र की वजह से रायसीना हिल्स का पारा चढ़ा हुआ है. चर्चा करने के लिए बनी देश की सर्वोच्च विधायी निकाय हंगामे की वजह से खुद चर्चा में है. कई मामले हैं, जिसने संसद के ताप को बढ़ा दिया है. उसमें से एक विपक्षी पार्टियों के द्वारा राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस जारी करना है. ये भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहला मौका है जब राज्यसभा के अध्यक्ष के खिलाफ महाभियोग लाने का नोटिस दिया गया है. इसका सरकार विरोध कर रही है. आज आपको बताते हैं कि जब जवाहर लाल नेहरू के पीएम रहते स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था, तब उन्होंने संसद में क्या बात कही थी. हालांकि, तब राज्यसभा के स्पीकर को नहीं बल्कि लोकसभा के स्पीकर को हटाने के लिए तत्कालीन विपक्ष महाभियोग लेकर आया था.
‘देश की गरिमा का सवाल’
बिहार के सोशलिस्ट पार्टी के नेता और सांसद विग्नेश्वर मिसिर, लोकसभा के पहले स्पीकर जी वी मावलंकर के खिलाफ सदन में साल 1954 अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए, जिस पर दो घंटे तक चर्चा हुई थी. लेकिन बहस के बाद उसे खारिज कर दिया गया था. इसपर चर्चा के दौरान, नेहरू ने संसद में कहा था कि पार्टी के किसी भी नेता को व्हिप या किसी तरह का निर्देश नहीं दिया गया है. वो अपनी इच्छानुसार वोट करेंग… क्योंकि ये किसी पार्टी का नहीं बल्कि सदन की उच्च गरिमा का मामला है. उन्होंने आगे कहा था कि हम इसे एक पार्टी के मुद्दे के रूप में नहीं बल्कि इससे ऊपर उठकर सोचने का प्रयास करें. इस मुद्दे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने बहस के लिए विपक्ष को अधिक समय देने का भी आग्रह किया था ताकि वे अपनी बात ठीक से रख सकें.
