नई दिल्ली ( मनोज वर्मा )। सौ साल पहले जब 27 सितंबर 1925 को जब डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस की स्थापना की थी तब शायद ही किसी ने ऐसा सोचा होगा कि सौ वर्षों में यह संगठन भारत के सामाजिक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न अंग बन जाएगा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्षों की यात्रा का यह एक अहम पड़ाव है।बीते दस दशकों में आरएसएस ने भारत की सामाजिक , सांस्कृतिक, आध्यात्मिक राष्ट्रीय चेतना की बुनियाद को मजबूत किया है। वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सेवा का जीवंत प्रतीक बन गया है। पिछली एक सदी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक समरसता, देशभक्ति, हिन्दुत्व के साथ साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और आपदा राहत में अहम भूमिका निभाई है। आरएसएस के स्वयंसेवकों ने बाढ़ भूकंप और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं में राहत और पुनर्वास कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लिया है इसके अलावा आरएसएस से जुड़े विभिन्न संगठनों ने युवाओं,महिलाओं और किसानों को सशक्त बनाने जनभागीदारी को बढ़ावा देने और स्थानीय समुदायों को मजबूत करने में योगदान दिया है। 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान आरएसएस ने अहम रोल निभाया था। ऐसे में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आरएसएस से 26 जनवरी की परेड में हिस्सा लेने का अनुरोध किया था और 26 जनवरी 1963 को राजपथ अब कर्तव्य पथ पर संघ के कार्यकर्ताओं की ऐतिहासिक परेड देखने को मिली थी। समय समय पर संघ के स्वयंसेवकों द्वारा चलाए गए कार्यक्रम अनुशासन आत्मबल और भारतीय संस्कृति पर गर्व करने की प्रेरणा देते हैं जिससे श्रेष्ठ भारत के निर्माण का मार्ग सुगम होता हैं। संघ की सौ वर्षीय यह यात्रा. अनुशासन, सेवा, राष्ट्रनिष्ठा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की अनवरत गाथा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने आदर्शों कार्यकर्ताओं और संस्कारों के माध्यम से समाज को राष्ट्रहित की प्रेरणा दी है एवं भारत की अखंडता, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक चेतना को अक्षुण्ण बनाए रखा है। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण यही संघ का पथ रहा है और इस पथ पर चलते हुए ही संघ के स्वयंसेवकों ने भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाई है। आरएसएस व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की पाठशाला है। समाज सेवा और देशभक्ति की एक शताब्दी की अनवरत यात्रा का जीवंत उदाहरण है। यही राष्ट्र की शक्ति और यही विकसित भारत का संकल्प
जब कोई संगठन अपनी स्थापना यात्रा के सौ वर्ष पूरे कर रहा हो तो यह कोई साधारण बात नहीं है। व्यक्ति समाज और राष्ट्र निर्माण का ध्येय लेकर चले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अनेक उतार चढ़ाव का सामना करते हुएअपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। संसार के सबसे विशाल और अनूठे संगठन की यह यात्रा त्याग तपस्या सेवा और अनुशासन का प्रतीक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यह यात्रा कई चुनौतियों और विषम परिस्थितियों में सेवा समर्पण और संकल्प के ध्येय पथ पर आगे बढ़ी है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना देश की असाधारण परिस्थितियों में हुई। भारत और भारत के स्वत्व के लिये जितना संकट अंग्रेजी राज से था उससे कहीं अधिक भारत विरोधी वे शक्तियां सक्रिय थीं जो भारत के पूर्ण रूपांतरण का कुचक्र रच रहीं थीं। इसे मालाबार चटगांव कराची और ढाका की हिंसा से समझा जा सकता है। हिन्दुओं के सामूहिक नरसंहार स्त्रियों के अपहरण पर भी देश में चुप्पी रही। एक ओर समाज संस्कृति और राष्ट्र के दमन का कुचक्र चल रहा था दूसरी ओर भारतीय समाज अनेक आंतरिक विसंगतियों में उलझ गया था। जहां समाज विखंडन और अस्पृश्यता जैसा लोक व्यवहार प्रभावी था वहीं भारतीय समाज में आत्मगौरव कहीं खो रहा था। दासत्व की जंजीरों को ही अपनी नियति समझ लेने वाला विचार भी प्रभावी होने लगा था। बालपन से ही राष्ट्र और सांस्कृतिक गौरव के प्रति समर्पित विशिष्ट प्रतिभा के धनी डॉक्टर जी के मन को यह सभी घटनाएं उद्वेलित कर रही थीं। डॉ हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी थे। वे असहयोग आंदोलन में जेल यात्रा भी गये थे। भारत को दासत्व से मुक्ति संघर्ष में सहभागिता के साथ उन्होंने भारत में सांस्कृतिक और राष्ट्रभाव जागरण अभियान चलाने का भी संकल्प लिया। उन्होंने अनुभव किया कि जब तक प्रत्येक भारतीय के हृदय में स्वत्व का भाव जागृत नहीं होगा तब तक भारत अपने गौरव को प्राप्त नहीं कर सकता। डॉ हेडगेवार ने तत्कालीन सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पित विभूतियों से चर्चा की और संघ की स्थापना के लिए विजयदशमी की तिथि का चयन किया। वर्ष 1925 में विजयादशमी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अस्तित्व में आया। इस तिथि के निर्धारण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का ध्येय स्पष्ट है। विजयादशमी की तिथि और यह उत्सव स्वार्थ रहित संघर्य सत्य की स्थापना धर्म की रक्षा और मानवीय मूल्यों के पुनर्जागरण का संदेश देती है। यही संदेश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पूरी शताब्दी यात्रा में निहित है।
संघ की इस शताब्दी यात्रा की दो बड़ी विशेषताएं रहीं। एक तो संघ की ध्येय निष्ठा संसार में केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एकमात्र ऐसा संगठन है जो अपने ध्येय पर अडिग है और निरंतर विस्तार पा रहा है। दूसरी विशेषता संघ पर होने वाले आक्रमणों की है। संघ पर वैचारिक राजनीतिक हमलों के साथ स्वयंसेवकों पर प्राणघातक हमले हुए। लेकिन संघ की ध्येय यात्रा पर कोई बाधा नहीं डाल पाया। स्वतंत्रता के बाद तीन बार तो संघ पर प्रतिबंध लगे। गांधी जी की हत्या में झूठा फंसा कर स्वयं सेवकों को प्रताड़ित किया गया। आपातकाल में प्रतिबंध और प्रताड़ना भी संघ के स्वयंसेवकों ने झेली। वर्ष 1992 में अयोध्या घटना के बाद भी संघ पर प्रतिबंध लगा। कश्मीर केरल पश्चिम बंगाल आदि प्रांतों में आज भी संघ प्रचारकों पर हमले हो रहे हैं। लेकिन संघ कभी रुका नहीं थका नहीं और न कोई स्वयंसेवक विचलित हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस शताब्दी यात्रा में मध्यप्रदेश की गौरव नगरी उज्जैन का भी अपना योगदान है। मध्यप्रदेश में संघ कार्य का विस्तार दो दिशाओं से हुआ। एक नागपुर से महाकौशल की ओर तथा दूसरा नागपुर से मालवा की ओर। मालवा क्षेत्र की गौरव नगरी उज्जैन वह स्थान है जहां संघ कार्य 1930 से 1940 के दशक में ही अंकुरित हो गया था। भोपाल से लेकर नीमच तक और इंदौर से लेकर मध्य भारत तक के विस्तार में उज्जैन की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इसे वर्ष 1936 में डॉक्टर जी के आह्वान पर हैदराबाद आंदोलन में उज्जैन के स्वयंसेवकों की सहभागिता और बाद में जूनागढ़ दादरा नगर हवेली और गोवा मुक्ति आंदोलन में उज्जैन नगर की सहभागिता इतिहास के पन्नों में है। दादरा नगर हवेली और गोवा मुक्ति आंदोलन में उज्जैन के स्वयंसेवकों का बलिदान भी हुआ। यह हम सभी के लिए गौरव की बात है कि संघ के स्वयंसेवकों ने स्वाधीनता आंदोलन विभाजन की पीड़ा में शरणार्थियों की सेवा आंतरिक अशांति और प्रत्येक युद्ध में राष्ट्र रक्षा के लिए पूर्ण समर्पण के साथ कार्य किया है। कई बार मैं सोचकर गर्व अनुभव करता हूं कि मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से एक ऐसी संकल्प यात्रा का सहभागी बना जो भारत राष्ट्र के परम वैभव का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस शताब्दी यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रचारकों के रूप में असंख्य विभूतियां आगे आईं लेकिन किसी ने भी न अपने नाम की चिंता की न अस्तित्व और न ही जीवन की। वे सब राष्ट्र निर्माण कार्य की नींव में समा गये। संघ ने अपनी इस शताब्दी वर्ष यात्रा में समाज और राष्ट्र जीवन के आयाम को स्पर्श किया है। इस कार्य में शाखा से लेकर द्वार तक और फिर खेत पर जाकर भी संपर्क किया है। इसीलिए संघ कार्य आज इतना व्यापक हो पाया है। संघ कार्य केवल संगठनात्मक विस्तार नहीं हैए यह साधना है. व्यक्तित्व निर्माण समाज निर्माण और राष्ट्र निर्माण की। इसीलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी शताब्दी समारोह को उत्सव के रूप में नहीं मना रहा। यह आयोजन राष्ट्र के परम वैभव और विश्व में भारत की सांस्कृतिक पुनर्प्रतिष्ठा के लिए संकल्प दिवस के रूप में है। भारतीय समाज में सकारात्मक परिवर्तन को गति देने और समाज में अनुशासन तथा देशभक्ति के भाव को बढ़ाने के उद्देश्य से माननीय सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने समाज में पंच परिवर्तन का आह्वान किया है। इस पंच परिवर्तन में पांच आयाम स्व का बोध अर्थात स्वदेशी नागरिक कर्तव्य पर्यावरण सामाजिक समरसता और कुटुम्ब प्रबोधन शामिल हैं। इसमें स्व के बोध से नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होंगे। नागरिक कर्तव्य बोध अर्थात कानून के पालन से राष्ट्र समृद्ध व उन्नत होगा। सामाजिक समरसता व सद्भाव से ऊंच.नीच जाति भेद समाप्त होंगे। पर्यावरण से सृष्टि का संरक्षण होगा तथा कुटुम्ब प्रबोधन से परिवार समृद्ध होंगे और बच्चों में संस्कार बढ़ेंगे। पंच परिवर्तन को समाज में लागू करने के लिए हम सभी भारतीय नागरिकों को मिलकर प्रयास करने होंगे।
इसी संदेश की झलक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में भी देखने को मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघ के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम के उपलक्ष्य में 1 अक्टूबर 2025 को दिल्ली के डॉ अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा पर विशेष डाक टिकट और सिक्का जारी किया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार भारतीय मुद्रा पर भारत माता की छवि अंकित की गई है जो एक अत्यंत गौरवशाली और ऐतिहासिक क्षण है। इस सिक्के के ऊपर संघ का बोध वाक्य भी अंकित किया गया। सौ रुपये के सिक्के पर एक ओर राष्ट्रीय चिह्न है और दूसरी ओर सिंह के साथ वरद मुद्रा में भारत माता की भव्य छवि और समर्पण भाव से उसे नमन करते स्वयंसेवक दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सौ वर्ष से बिना थके बिना रुके राष्ट्र सेवा के कार्य में लगा हुआ है। यह समर्पित यात्रा हमें राष्ट्र कार्य के लिए प्रेरित करती है। बात भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की हो या देश के विभाजन की। बात चाहे आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की हो या आपाताल के विरोध और लोकतंत्र की रक्षा की या बात अयोध्या में राम जन्मभूमि पर रामलला के मंदिर निर्माण का हो या बात भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की हो। भारत की संप्रभुता की रक्षा की है और भारतीय सभ्यता के मूल्यों को संजोए रखा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्षो की यह यात्रा हर भारतवासी को देशभक्ति की प्रेरणा देती है और भविष्य के भारत को भी देती रहेगी।

